41 साल पहले नागपुर में छोड़ा गया नवजात, आज यूरोप के Dutch शहर का बना मेयर ! जैविक मां की तलाश में भारत लौटे फाल्गुन बिनेनडिज्क !
41 साल बाद जड़ों की तलाश में भारत पहुंचे नीदरलैंड के मेयर फाल्गुन बिनेनडिज्क
यह कहानी सिर्फ राजनीति या प्रशासन की नहीं है, बल्कि पहचान, संवेदना, सामाजिक दबाव और मां-बेटे के बिछड़े रिश्ते की है। नीदरलैंड के हीमस्टेड शहर के मेयर फाल्गुन बिनेनडिज्क इन दिनों भारत, खासकर नागपुर से अपने गहरे जुड़ाव के कारण चर्चा में हैं। वजह है 41 साल पहले नागपुर में जन्म के महज तीन दिन बाद छोड़े गए उस बच्चे की कहानी, जिसने समय, सीमाएं और परिस्थितियों को पार करते हुए आज यूरोप में एक सम्मानित जनप्रतिनिधि के रूप में पहचान बनाई है।
तीन दिन का शिशु और नागपुर का एक आश्रम
फरवरी 1985। महाराष्ट्र का नागपुर शहर! एक अविवाहित युवती, सामाजिक दबाव और परिस्थितियों से जूझते हुए अपने नवजात बेटे को मातृ सेवा संघ (Matru Seva Sangh) नामक संस्था में छोड़ने को मजबूर हुई। बच्चा मात्र तीन दिन का था। न मां का पता, न कोई स्थायी पहचान।आश्रम की एक नर्स ने उस शिशु को एक नाम दिया – ‘फाल्गुन’। यह नाम हिंदू पंचांग के अंतिम महीने से लिया गया था। तब किसी को अंदाजा नहीं था कि यही नाम एक दिन अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आएगा।
भारत से नीदरलैंड तक: नई पहचान, लेकिन अधूरी कहानी
कुछ ही समय बाद, गोद लेने की प्रक्रिया के तहत उस बच्चे को मुंबई ले जाया गया, जहां से एक डच दंपत्ति ने उसे कानूनी रूप से गोद लिया। सभी अंतरराष्ट्रीय नियमों और दस्तावेज़ी प्रक्रियाओं के बाद वह बच्चा नीदरलैंड पहुंचा। यहीं से शुरू हुई फाल्गुन की नई जिंदगी – एक सुरक्षित घर, प्यार करने वाले माता-पिता, अच्छी शिक्षा और खुला समाज ! नीदरलैंड में पलते-बढ़ते फाल्गुन से कभी यह बात छिपाई नहीं गई कि वे गोद लिए गए हैं। यह सच उनके जीवन का हिस्सा था। हालांकि, उनके मन में हमेशा एक सवाल रहा- “मैं कहां से आया हूं?” यही सवाल समय के साथ अपनी जड़ों की तलाश में बदल गया।
2006 में पहली बार भारत की धरती पर कदम
18 वर्ष की उम्र में फाल्गुन पहली बार भारत आए। यह यात्रा केवल पर्यटन नहीं थी, यह एक भावनात्मक जुड़ाव था। भारतीय संस्कृति, लोग, भाषा और माहौल ने उनके भीतर एक अलग ही एहसास जगाया। हालांकि, उस समय उनके पास अपने जन्म से जुड़ी जानकारी बहुत सीमित थी।
राजनीति में कदम और प्रशासनिक पहचान
नीदरलैंड में फाल्गुन ने शिक्षा पूरी करने के बाद सार्वजनिक सेवा और स्थानीय राजनीति में रुचि दिखाई। धीरे-धीरे उन्होंने प्रशासनिक अनुभव हासिल किया और समाज से जुड़ते गए। 16 अप्रैल 2024 को उन्हें नीदरलैंड के हीमस्टेड शहर का मेयर नियुक्त किया गया। यह क्षण केवल उनके लिए नहीं, बल्कि उस बच्चे के लिए भी ऐतिहासिक था, जिसे कभी पहचान के बिना छोड़ दिया गया था। मेयर बनने के बाद फाल्गुन ने अपनी जड़ों की खोज को एक बार फिर प्राथमिकता दी। उन्होंने नागपुर स्थित मातृ सेवा संघ से संपर्क किया, पुराने रिकॉर्ड खंगाले और प्रशासन से सहयोग मांगा। हालांकि, चार दशक पुराने रिकॉर्ड्स अधूरे थे, लेकिन कुछ अहम सुराग मिले।
नागपुर प्रशासन की मदद
नागपुर जिला प्रशासन, नगर निगम और समाजसेवी संस्थाओं ने फाल्गुन की मदद की। पुराने दस्तावेज़, अस्पताल के रजिस्टर और आश्रम की फाइलें खंगाली गईं। इस दौरान उन्हें यह भी पता चला कि उनकी मां उस समय केवल 21 साल की थीं और सामाजिक हालात बेहद कठिन थे। फाल्गुन की भारत यात्रा का सबसे भावुक पल तब आया, जब उनकी मुलाकात उस सेवानिवृत्त नर्स से हुई, जिसने उन्हें नवजात अवस्था में देखा था और नाम दिया था। यह मुलाकात भावनाओं से भरी थी- एक तरफ बीते वक्त की यादें, दूसरी तरफ वर्तमान की सच्चाई।
‘हर कर्ण को अपनी कुंती से मिलने का अधिकार’
फाल्गुन अक्सर अपनी कहानी की तुलना महाभारत के कर्ण से करते हैं। उनका कहना है, “हर कर्ण को अपनी कुंती से मिलने का अधिकार होता है।” उनकी यह बात केवल एक भावनात्मक वक्तव्य नहीं, बल्कि जन्मदाता से मिलने के मानवीय अधिकार की ओर इशारा करती है। फाल्गुन आज एक खुशहाल पारिवारिक जीवन जी रहे हैं। उनकी पत्नी डच हैं और उनके चार बच्चे हैं। खास बात यह है कि उन्होंने अपने बच्चों के नामों में भारतीय और डच संस्कृतियों का संतुलन रखा है। उन्होंने अपनी एक बेटी का नाम अपनी जैविक मां के नाम पर रखने का फैसला किया, भले ही वह मां अभी तक उनसे मिली नहीं है।
मां से मिलने की उम्मीद अब भी जिंदा
फाल्गुन मानते हैं कि समय भले ही बीत गया हो, लेकिन उम्मीद अब भी बाकी है। वे बार-बार भारत आने को तैयार हैं और अपनी खोज जारी रखना चाहते हैं। उनका कहना है कि यदि उनकी मां मिलती हैं, तो वे कोई सवाल या शिकायत नहीं करेंगे, बस उन्हें देखना और धन्यवाद कहना चाहते हैं।
सामाजिक संदेश और बड़ी तस्वीर
फाल्गुन बिनेनडिज्क की कहानी सिर्फ व्यक्तिगत नहीं है। यह कहानी कई सामाजिक मुद्दों पर सवाल उठाती है-
• अविवाहित माताओं पर सामाजिक दबाव,
• गोद लेने की प्रक्रिया और पहचान का अधिकार,
• समय के साथ बदलता समाज,
• मानवीय संवेदनाओं की सार्वभौमिकता !
फाल्गुन बिनेनडिज्क- जड़ें हमेशा वापस बुलाती हैं !
नागपुर की एक गुमनाम शुरुआत से लेकर नीदरलैंड के मेयर पद तक का सफर- फाल्गुन बिनेनडिज्क की कहानी यह साबित करती है कि परिस्थितियां इंसान को रोक नहीं सकतीं। यह कहानी बताती है कि पहचान की तलाश कभी खत्म नहीं होती, मां-बेटे का रिश्ता सीमाओं से परे होता है और इंसान जहां भी पहुंचे, उसकी जड़ें उसे वापस बुलाती हैं। आज फाल्गुन एक मेयर हैं, लेकिन दिल से अब भी वही बच्चा हैं, जो नागपुर की गलियों में अपनी मां की परछाई तलाश रहा है।
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