चीनी की मिठास में घुली नीतिगत कड़वाहट: खड़गे का मोदी सरकार पर तीखा हमला

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चीनी की मिठास में छिपी सरकारी नीतियों की कड़वाहट: खड़गे का सरकार पर हमला

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने चीनी की बढ़ती कीमतों और देश में घटते स्टॉक को लेकर केंद्र की मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है और पूछा है कि यह कैसा ‘आत्मनिर्भर भारत’ है। त्योहारों के सीजन से ठीक पहले देश के फुटकर बाजारों में चीनी के दाम तेजी से उछले हैं, जिसने विपक्ष को सरकार की आर्थिक और कृषि नीतियों के खिलाफ एक बड़ा हथियार दे दिया है। मल्लिकार्जुन खड़गे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर एक विस्तृत पोस्ट साझा कर सरकार के सामने तीन सीधे सवाल दागे और देश की एथेनॉल नीति पर पुनर्विचार करने की मांग की है। दूसरी तरफ, उपभोक्ता मामले मंत्रालय ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए बढ़ती कीमतों के लिए घरेलू उत्पादन में कमी और मौसम की मार को जिम्मेदार ठहराया है।

त्योहारों से पहले आसमान छूते दामों पर कांग्रेस का चौतरफा वार

देश में त्योहारों का सीजन शुरू होते ही आम जनता की रसोई पर महंगाई की एक और कड़वी मार पड़ी है। देश के कई हिस्सों में चीनी के खुदरा दाम तेजी से बढ़ रहे हैं। इस गंभीर मुद्दे को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोला है। खड़गे ने आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गलत नीतियों के कारण आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश भारत खुद चीनी के अभूतपूर्व संकट से जूझ रहा है। उन्होंने तंज कसते हुए पूछा कि “यह कैसा आत्मनिर्भर भारत है” जहाँ देश की अपनी जनता को मीठा खाने के लिए विदेशों से शुल्क-मुक्त चीनी आयात करनी पड़ रही है। मल्लिकार्जुन खड़गे के इन तीखे सवालों के बाद देश की सियासत में ‘चीनी और एथेनॉल’ को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। कांग्रेस जहां इसे सरकारी कुप्रबंधन और एथेनॉल सम्मिश्रण (E20) नीति की विफलता बता रही है, वहीं केंद्र सरकार और उपभोक्ता मामले मंत्रालय ने इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों, कम उत्पादन और जमाखोरी को मुख्य कारण बताया है।

खड़गे के सरकार से तीन सीधे और कड़े सवाल

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने शनिवार सुबह अपने सोशल मीडिया हैंडल से सरकार को घेरते हुए तीन प्रमुख सवाल देश के सामने रखे।

स्टॉक 9 साल के निचले स्तर पर क्यों?

खड़गे ने पहला सवाल दागते हुए कहा कि भारत दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादकों और निर्यातकों में से एक रहा है। इसके बावजूद, आज देश में चीनी का घरेलू स्टॉक पिछले 9 वर्षों के सबसे निचले स्तर पर क्यों पहुंच गया है? सरकार को यह स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

निर्यात रोकने और आयात करने की नौबत क्यों आई?

उन्होंने पूछा कि आखिर देश में ऐसी क्या परिस्थितियां बनीं कि सरकार को पहले तो चीनी के निर्यात पर पूरी तरह पाबंदी लगानी पड़ी और अब घरेलू कमी को पूरा करने के लिए 10 लाख टन चीनी ड्यूटी-फ्री (शुल्क-मुक्त) आयात करने का फैसला लेना पड़ रहा है?

तीन महीने में 40% महंगी हुई चीनी का जिम्मेदार कौन?

तीसरे सवाल में खड़गे ने सीधे जनता की जेब पर पड़े असर का जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि पिछले तीन महीनों के भीतर देश में चीनी की कीमतों में करीब 40% तक की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। त्योहारों के ठीक पहले भारतीय परिवारों पर लादे गए इस अतिरिक्त आर्थिक बोझ का जिम्मेदार कौन है?

मल्लिकार्जुन खड़गे का मुख्य बयान

“त्योहारों से पहले चीनी की मिठास में मोदी सरकार की नीतियों की कड़वाहट घुल गई है… एक तरफ देश में चीनी की भारी किल्लत है और सरकार विदेशी आयात पर निर्भर हो रही है, तो दूसरी तरफ गन्ने और अनाज को E20 नीति के तहत एथेनॉल बनाने में लगातार झोंका जा रहा है। सरकार इस जनविरोधी नीति की समीक्षा क्यों नहीं कर रही?”

बाजार का हाल: 96 घंटों में बेकाबू हुईं कीमतें

देश के खुदरा बाजारों से आ रही रिपोर्ट कांग्रेस के दावों को बल दे रही हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार और दिल्ली-NCR के कई जिलों में पिछले कुछ दिनों में चीनी की कीमतों में अभूतपूर्व उछाल देखा गया है।
दामों में अचानक उछाल: कई स्थानीय बाजारों में फुटकर भाव जो कुछ दिन पहले तक ₹44 से ₹48 प्रति किलो के बीच थे, वे अब बढ़कर ₹55 से ₹65 प्रति किलो तक पहुंच गए हैं।
त्योहारों पर सीधा असर: अगस्त से नवंबर के बीच रक्षाबंधन, गणेशोत्सव, दुर्गा पूजा, दिवाली और छठ जैसे बड़े त्योहार आते हैं। हलवाइयों, बेकरी उद्योग और आम परिवारों के लिए चीनी सबसे आवश्यक सामग्री है। दामों में इस तेजी से त्योहारी मिठाइयों का बजट पूरी तरह बिगड़ गया है।

क्या है विवाद की जड़? एथेनॉल नीति (E20) पर रार

विपक्ष के हमले का सबसे बड़ा केंद्र सरकार की E20 (पेट्रोल में 20% एथेनॉल सम्मिश्रण) नीति है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार पेट्रोल आयात बिल को कम करने की अपनी ‘जिद’ में देश की खाद्य सुरक्षा को दांव पर लगा रही है। विशेषज्ञों और विपक्षी नेताओं का मानना है कि गन्ने के रस और शीरे (Molasses) का एक बहुत बड़ा हिस्सा चीनी उत्पादन के बजाय एथेनॉल बनाने वाली भट्टियों (Distilleries) में डायवर्ट कर दिया गया। इसके कारण मिलों में चीनी का वास्तविक उत्पादन उम्मीद से काफी कम हुआ, जिसका खामियाजा अब देश की आम जनता भुगत रही है। खड़गे ने मांग की है कि जब तक घरेलू बाजार सामान्य नहीं होता, तब तक एथेनॉल के लिए गन्ने के इस्तेमाल की नीति को तुरंत रोका जाए या इसकी गहन समीक्षा की जाए।

सरकार और उपभोक्ता मंत्रालय का पलटवार: एथेनॉल से इनकार

मल्लिकार्जुन खड़गे के हमले के बाद केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय तुरंत बचाव में उतरा। मंत्रालय ने विपक्ष के इन आरोपों को पूरी तरह भ्रामक और राजनीति से प्रेरित करार दिया है कि एथेनॉल उत्पादन की वजह से चीनी महंगी हुई है।

कीमत मे गिरावट के मुख्य कारण

उत्पादन में भारी गिरावट: चालू सीजन में देश के भीतर चीनी का कुल उत्पादन 306 लाख मीट्रिक टन (LMT) रहने का अनुमान है। जबकि सीजन की शुरुआत में इसके 343 LMT रहने का अनुमान लगाया गया था। यानी उत्पादन में करीब 37 लाख मीट्रिक टन की सीधी कमी आई है।
फसलों को प्राकृतिक बीमारी और मौसम की मार: मंत्रालय के अनुसार, इस साल अत्यधिक बारिश के कारण खेतों में जलभराव हो गया। इसके साथ ही गन्ने की फसल में ‘रेड रॉट’ (Red Rot) और ‘टॉप बोरर’ (Top Borer) जैसी गंभीर बीमारियों के फैलने से गन्ने की रिकवरी और उत्पादन दोनों बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।
एथेनॉल का बदला हुआ पैटर्न: सरकार ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के डायवर्जन को 12% (2022-23) से घटाकर लगभग 9% (2025-26) कर दिया गया है। अब देश में बनने वाले कुल एथेनॉल का लगभग तीन-चौथाई (75%) हिस्सा अनाज, विशेषकर मक्के (Maize) से आ रहा है, न कि गन्ने से। इसलिए चीनी की कमी के लिए एथेनॉल नीति को दोष देना गलत है।

वैश्विक संकट और अंतरराष्ट्रीय कीमतें भी जिम्मेदार

भारत के उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने इस संकट के अंतर्राष्ट्रीय आयामों पर भी प्रकाश डाला है। वैश्विक स्तर पर भी मौसम की प्रतिकूलताओं के कारण चीनी उत्पादन में बड़ी गिरावट देखी जा रही है।
वैश्विक घाटा: वर्ष 2026-27 के दौरान दुनिया भर में चीनी की कुल कमी करीब 33 लाख मीट्रिक टन (LMT) रहने की आशंका है।
अंतरराष्ट्रीय दामों में तेजी: इस वैश्विक कमी के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चीनी के दाम महज दो महीनों के भीतर 16% से ज्यादा उछल गए हैं। बीती 30 जून को जो चीनी अंतरराष्ट्रीय बाजार में 474 डॉलर प्रति टन थी, वह 20 अगस्त तक बढ़कर 552 डॉलर प्रति टन पर पहुंच चुकी है। वैश्विक स्तर पर महंगी चीनी के कारण घरेलू बाजार में भी सट्टेबाजी और कीमतों पर दबाव बढ़ा है।

कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार के आपात कदम

हालांकि सरकार का दावा है कि अक्टूबर में नया पेराई सीजन शुरू होने तक देश में घरेलू मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है, फिर भी बढ़ती कीमतों और विपक्षी हमलों के दबाव के बीच केंद्र सरकार ने कुछ सख्त और आपातकालीन कदम उठाए हैं।
डीलरों पर स्टॉक लिमिट (30 नवंबर तक): देश भर के चीनी डीलरों के लिए किसी एक स्थान पर अधिकतम 400 टन (4000 क्विंटल) स्टॉक रखने की सीमा तय की गई है। यह नियम 30 नवंबर 2026 तक सख्ती से लागू रहेगा ताकि कृत्रिम कमी न पैदा की जा सके।
थोक उपभोक्ताओं के लिए नया 15-दिनी नियम (1 सितंबर से): सरकार ने थोक खरीदारों और बड़े औद्योगिक उपभोक्ताओं (जो प्रति माह 10 मीट्रिक टन से अधिक चीनी का उपयोग करते हैं) के लिए होल्डिंग सीमा को 30 दिन से घटाकर केवल 15 दिन कर दिया है। यह नया नियम 1 सितंबर से प्रभावी होगा, जिससे इन बड़े उपभोक्ताओं को बाजार से बार-बार माल उठाना होगा और मिलें स्टॉक डंप नहीं कर पाएंगी।
मिलों का भौतिक सत्यापन: कालाबाजारी और जमाखोरी पर अंकुश लगाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की संयुक्त टीमें देश की विभिन्न चीनी मिलों का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) कर रही हैं।
शुल्क-मुक्त आयात पर विचार: कीमतों को पूरी तरह काबू में रखने के लिए सरकार सीमित मात्रा में (लगभग 10 लाख टन) शुल्क-मुक्त चीनी के आयात को हरी झंडी देने की प्रक्रिया पर अंतिम विचार कर रही है ताकि त्योहारों के दौरान बाजार में तरलता बनी रहे।

आम चुनाव के बाद महंगाई पर नया रण

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चीनी का यह मुद्दा केवल रसोई के बजट तक सीमित नहीं रहने वाला है। हालिया चुनावों के बाद विपक्ष इस ताक में था कि वह सरकार को नीतिगत मोर्चे पर घेरे। चीनी एक ऐसी आवश्यक वस्तु है जो सीधे देश के करोड़ों गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों से जुड़ी है।विपक्ष इस मुद्दे के जरिए ग्रामीण और शहरी दोनों ही मतदाताओं को साधने की कोशिश कर रहा है। ग्रामीण इलाकों में वह किसानों को गन्ने के सही दाम न मिलने और मिलों की मनमानी का मुद्दा उठा रहा है, तो शहरी क्षेत्रों में आम उपभोक्ताओं की बढ़ती लागत को ढाल बना रहा है। दूसरी ओर, सरकार के लिए चुनौती यह है कि वह एक तरफ कच्चे तेल के आयात को कम करने के अपने दीर्घकालिक ‘एथेनॉल ब्लेंडिंग’ के लक्ष्य को भी बनाए रखे और दूसरी तरफ त्योहारों के इस संवेदनशील समय में देश के भीतर आवश्यक खाद्य पदार्थों की कीमतों को नियंत्रण से बाहर न जाने दे।

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