वैश्विक बाजार में चीनी की कीमतों के उतार-चढ़ाव से बचने के लिए आय के नए स्रोत जरूरी, कृषि अवशेषों को ईंधन में बदलने पर जोर
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने देश की चीनी मिलों को केवल चीनी उत्पादन पर निर्भर रहने के बजाय इथेनॉल, कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG), जैविक खाद, सतत विमान ईंधन और अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों की दिशा में तेजी से बढ़ने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि वैश्विक बाजार में चीनी की कीमतें मांग और आपूर्ति के आधार पर बदलती रहती हैं। दुनिया के बड़े उत्पादक देशों में उत्पादन बढ़ने पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों पर दबाव आ सकता है और इसका असर भारतीय चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ता है। ऐसे में मिलों के लिए आय के कई स्रोत विकसित करना जरूरी है। गडकरी ने 22 सितंबर को National Federation of Cooperative Sugar Factories के National Efficiency Awards समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि केवल चीनी उत्पादन पर आधारित मॉडल लंबे समय तक पर्याप्त नहीं होगा। उनके अनुसार, कृषि को आर्थिक रूप से अधिक सक्षम बनाने के लिए गन्ने और उससे निकलने वाले प्रत्येक उप-उत्पाद का अधिकतम आर्थिक उपयोग करना होगा। उन्होंने कृषि क्षेत्र में तकनीक और ज्ञान को संपत्ति में बदलने तथा कचरे को आर्थिक संसाधन में बदलने की जरूरत पर जोर दिया।
चीनी की कीमतें वैश्विक बाजार से प्रभावित
गडकरी ने कहा कि चीनी ऐसी वस्तु है जिसकी कीमत केवल भारत के घरेलू बाजार से तय नहीं होती। वैश्विक स्तर पर उत्पादन, मांग, निर्यात और बड़े उत्पादक देशों की लागत का सीधा असर कीमतों पर पड़ता है। उन्होंने ब्राजील का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां बड़े पैमाने पर मशीनीकृत गन्ना खेती और उत्पादन लागत का अंतर अंतरराष्ट्रीय बाजार को प्रभावित कर सकता है। इसलिए भारतीय चीनी उद्योग को केवल चीनी बेचकर अपनी पूरी अर्थव्यवस्था चलाने के बजाय सह-उत्पादों और ऊर्जा क्षेत्र से अतिरिक्त आमदनी पैदा करनी चाहिए। यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत का चीनी उद्योग बहुत बड़े कृषि और ग्रामीण अर्थतंत्र से जुड़ा हुआ है। सरकार के अगस्त 2026 के आंकड़ों के अनुसार, देश में 2025-26 के दौरान गन्ने का उत्पादन लगभग 500 मिलियन टन रहने का अनुमान है। गन्ना क्षेत्र करीब पांच करोड़ किसानों और लगभग पांच लाख चीनी मिल एवं संबद्ध उद्योगों के कर्मचारियों की आजीविका से जुड़ा है। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य हैं।
इथेनॉल से बढ़ेगा चीनी मिलों का कारोबार
गडकरी ने इथेनॉल को चीनी उद्योग के लिए महत्वपूर्ण वैकल्पिक आय स्रोतों में शामिल किया। गन्ने के रस, शीरे और अन्य उपयुक्त कच्चे माल से इथेनॉल तैयार किया जा सकता है। इससे चीनी मिलों को अपने उत्पादन पोर्टफोलियो में विविधता लाने का अवसर मिलता है। इथेनॉल का इस्तेमाल पेट्रोल में मिश्रण के लिए किया जाता है, जिससे परिवहन क्षेत्र में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने का लक्ष्य भी जुड़ा हुआ है। सरकार के अनुसार, 2025-26 में चीनी उत्पादन का करीब 9 प्रतिशत हिस्सा इथेनॉल की ओर मोड़ा गया, जबकि 2022-23 में यह अनुपात करीब 12 प्रतिशत था। साथ ही देश में बनने वाले इथेनॉल का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, विशेष रूप से मक्का, से आता है। सरकार का कहना है कि अतिरिक्त चीनी को इथेनॉल में बदलने से अधिशेष उत्पादन के समय मिलों के पास फंसी पूंजी कम करने और किसानों के भुगतान की स्थिति सुधारने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इथेनॉल और चीनी के बीच संतुलन भी महत्वपूर्ण है। अगस्त 2026 में देश में चीनी की कीमतों में तेज वृद्धि के बीच गन्ने से इथेनॉल उत्पादन को लेकर सरकारी स्तर पर बदलाव की संभावनाओं की रिपोर्ट सामने आई थी। Reuters के अनुसार, सरकार घरेलू चीनी उपलब्धता बनाए रखने के लिए गन्ने के रस और B-heavy molasses से इथेनॉल उत्पादन पर प्रतिबंध लगाने तथा C-heavy molasses, मक्का और चावल जैसे स्रोतों पर अधिक निर्भरता पर विचार कर रही थी। इससे स्पष्ट है कि चीनी और इथेनॉल के बीच कच्चे माल का संतुलन बाजार परिस्थितियों के अनुसार बदल सकता है।
धान के पुआल से CBG बनाने पर जोर
गडकरी ने चीनी मिलों के लिए CBG को भी एक बड़ा अवसर बताया। उन्होंने कहा कि गन्ने की खोई, धान का पुआल, बांस और नेपियर घास जैसे कृषि अवशेषों से CBG तैयार किया जा सकता है। इससे एक तरफ खेतों और मिलों से निकलने वाले जैविक अवशेषों का उपयोग होगा, वहीं दूसरी तरफ ईंधन के रूप में एक अतिरिक्त उत्पाद तैयार किया जा सकेगा। गडकरी ने पंजाब और हरियाणा में हर साल बड़ी मात्रा में जलाए जाने वाले धान के पुआल को ऊर्जा उत्पादन के लिए संभावित कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल करने की बात कही। कृषि अवशेषों को खुले में जलाने के बजाय उनसे गैस और अन्य जैव ईंधन बनाने से किसानों को अवशेषों के लिए आर्थिक मूल्य मिल सकता है। इससे पराली प्रबंधन की समस्या को कम करने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में नई आर्थिक गतिविधियां विकसित करने की संभावना भी बनती है। गडकरी के अनुसार, देश में 1,908 CBG संयंत्र पंजीकृत हैं, जिनमें से 132 परिचालन में बताए गए हैं। इसका अर्थ है कि इस क्षेत्र में बड़ी संभावित क्षमता मौजूद है, लेकिन पंजीकृत परियोजनाओं को वास्तविक उत्पादन में बदलने के लिए निवेश, कच्चे माल की नियमित उपलब्धता, परिवहन, तकनीक और बाजार की व्यवस्था महत्वपूर्ण होगी। (Jagran)
‘वेस्ट टू वेल्थ’ से किसानों की अतिरिक्त कमाई
गडकरी ने कृषि अवशेषों को बोझ के बजाय आर्थिक संसाधन के रूप में देखने की जरूरत बताई। गन्ने की खोई, शीरा, प्रेस मड और अन्य अवशेष चीनी उद्योग की सामान्य प्रक्रिया में निकलते हैं। इनमें से कई का इस्तेमाल ऊर्जा, जैव ईंधन, जैविक खाद और अन्य औद्योगिक उत्पादों में किया जा सकता है। इसी सोच को उन्होंने ‘वेस्ट टू वेल्थ’ यानी कचरे से संपदा बनाने की अवधारणा से जोड़ा। यदि मिलें किसानों से कृषि अवशेष खरीदती हैं और उन्हें ऊर्जा या औद्योगिक कच्चे माल में बदलती हैं, तो किसान की मुख्य फसल के अलावा अतिरिक्त आय का रास्ता बन सकता है। वहीं मिलों को भी अतिरिक्त कारोबार मिल सकता है। गन्ने की खेती और चीनी उत्पादन की पूरी श्रृंखला को इस तरह देखा जाए तो केवल चीनी ही अंतिम उत्पाद नहीं रह जाती। गन्ने के रस से चीनी और इथेनॉल, शीरे से इथेनॉल, खोई से ऊर्जा और अन्य उत्पाद, प्रेस मड से खाद तथा उससे प्राप्त मोम से उच्च मूल्य वाले उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, गन्ने के प्रसंस्करण से प्राप्त मोम में औद्योगिक, कृषि और औषधीय उपयोग की संभावनाएं हैं।
गन्ने के मोम से भी बन सकती है बड़ी कमाई
गडकरी ने महाराष्ट्र के सतारा क्षेत्र की चीनी मिलों का उदाहरण देते हुए कहा कि गन्ने की प्रोसेसिंग से मिलने वाले मोम को उच्च मूल्य वाले बाजारों में बेचा जा सकता है। उनके अनुसार, कुछ मामलों में यह मोम करीब 300 से 350 रुपये प्रति किलोग्राम तक की कीमत प्राप्त कर सकता है और इसका उपयोग कॉस्मेटिक क्षेत्र में किया जाता है। गन्ने के मोम का उपयोग केवल सौंदर्य प्रसाधनों तक सीमित नहीं है। शोध के अनुसार इससे प्राप्त विभिन्न यौगिकों का औद्योगिक, कृषि और औषधीय क्षेत्रों में इस्तेमाल संभव है। इसका अर्थ है कि चीनी मिलों में निकलने वाले छोटे समझे जाने वाले उप-उत्पाद भी प्रसंस्करण और तकनीक के जरिए उच्च मूल्य वाले उत्पादों में बदले जा सकते हैं।
सतत विमान ईंधन और जैव ईंधन पर भी नजर
गडकरी ने चीनी और कृषि क्षेत्र को केवल पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण तक सीमित न रखते हुए जैव ईंधन के व्यापक बाजार से जोड़ने की बात कही। उन्होंने Sustainable Aviation Fuel यानी SAF की संभावनाओं का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, कृषि अवशेषों से विमानन क्षेत्र के लिए ईंधन तैयार करने की दिशा में भी काम हो रहा है। उन्होंने पानीपत में Indian Oil की कृषि अवशेष आधारित SAF परियोजना और असम के Numaligarh में बांस से इथेनॉल उत्पादन का उल्लेख किया। इससे संकेत मिलता है कि कृषि अवशेषों का बाजार भविष्य में सड़क परिवहन के साथ-साथ विमानन और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों तक फैल सकता है।
फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों से इथेनॉल की मांग बढ़ने की संभावना
गडकरी ने फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को भी इथेनॉल आधारित अर्थव्यवस्था से जोड़ा। उन्होंने बताया कि Toyota की 100 प्रतिशत फ्लेक्स-फ्यूल Innova को अक्टूबर में लॉन्च किए जाने की उम्मीद है। ऐसे वाहन 100 प्रतिशत इथेनॉल तक के मिश्रण वाले ईंधन पर चलने में सक्षम होंगे। फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के विस्तार का सीधा संबंध इथेनॉल की संभावित मांग से है। यदि वाहन क्षेत्र में अधिक मात्रा में इथेनॉल का इस्तेमाल होता है तो गन्ने के साथ मक्का, क्षतिग्रस्त अनाज और टूटे चावल जैसे वैकल्पिक कच्चे माल के लिए भी बाजार विकसित हो सकता है।
मक्का किसानों को भी मिला इथेनॉल बाजार का लाभ
गडकरी ने मक्का आधारित इथेनॉल का उदाहरण देते हुए कहा कि इथेनॉल उत्पादन के लिए मक्का की मांग बढ़ने से बिहार और उत्तर प्रदेश में किसानों को बेहतर कीमत मिलने का अवसर बना। उन्होंने दावा किया कि मक्का की कीमत करीब 1,800 रुपये से बढ़कर 2,600 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंची और इससे किसानों के हाथों में करीब 45,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त पहुंचे। यह आंकड़ा गडकरी द्वारा कार्यक्रम में रखे गए दावे के रूप में सामने आया है। इसका व्यापक अर्थ यह है कि ऊर्जा क्षेत्र की मांग कृषि बाजार को प्रभावित कर सकती है। यदि पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण और जैव ईंधन की मांग बढ़ती है तो किसानों के लिए पारंपरिक खाद्य बाजार के अलावा ऊर्जा क्षेत्र भी खरीदार बन सकता है।
कृषि को केवल खाद्य नहीं, ऊर्जा क्षेत्र से जोड़ने की रणनीति
गडकरी ने कृषि को केवल खाद्य उत्पादन तक सीमित रखने के बजाय ऊर्जा और औद्योगिक कच्चे माल के क्षेत्र से जोड़ने की जरूरत बताई। उनके अनुसार, किसान केवल अनाज या गन्ना बेचने वाला उत्पादक न रहे, बल्कि कृषि अवशेषों के माध्यम से ऊर्जा और अन्य औद्योगिक उत्पादों की आपूर्ति करने वाला भागीदार भी बन सकता है। उन्होंने AI, ड्रोन आधारित छिड़काव, नैनो यूरिया और नैनो DAP जैसी तकनीकों का उल्लेख करते हुए कहा कि भविष्य में तकनीक कृषि लागत घटाने और उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। उन्होंने कार्बन डाइऑक्साइड से हाइड्रोजन, मेथनॉल और यूरिया जैसे मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करने की संभावनाओं का भी उल्लेख किया।
कच्चे माल से लेकर अंतिम उत्पाद तक बढ़ाना होगा मूल्य
चीनी उद्योग के सामने अब चुनौती केवल अधिक चीनी उत्पादन की नहीं, बल्कि एक ही गन्ने से अधिकतम आर्थिक मूल्य हासिल करने की है। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक भारत 2025-26 में करीब 500 मिलियन टन गन्ने का उत्पादन कर रहा है और यह क्षेत्र करोड़ों किसानों की आजीविका से जुड़ा है। ऐसे में गन्ने की पूरी मूल्य श्रृंखला में छोटे-छोटे उप-उत्पादों का बेहतर इस्तेमाल भी बड़े आर्थिक प्रभाव में बदल सकता है। गडकरी का जोर इसी बदलाव पर है—चीनी मिल को केवल चीनी बनाने वाली इकाई के बजाय चीनी, इथेनॉल, CBG, बिजली, जैविक खाद, SAF और अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों का एकीकृत केंद्र बनाया जाए। इससे वैश्विक चीनी बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव का जोखिम अलग-अलग उत्पादों में बांटा जा सकता है। हालांकि, इस मॉडल को जमीन पर लागू करने के लिए तकनीक, पूंजी निवेश, कच्चे माल की लगातार आपूर्ति, परिवहन व्यवस्था, उत्पादों के लिए बाजार और नीतिगत स्थिरता जरूरी होगी। CBG या SAF संयंत्र स्थापित करना केवल कृषि अवशेष उपलब्ध होने से संभव नहीं है; इसके लिए प्रसंस्करण तकनीक, संग्रहण, लॉजिस्टिक्स और खरीद व्यवस्था भी विकसित करनी होगी।
चीनी मिलों के लिए उत्पादन मॉडल में बदलाव
कुल मिलाकर, गडकरी का संदेश चीनी मिलों के लिए उत्पादन मॉडल में बदलाव से जुड़ा है। उनका जोर है कि गन्ने से केवल चीनी नहीं, बल्कि ऊर्जा और उच्च मूल्य वाले औद्योगिक उत्पाद भी तैयार किए जाएं। इससे एक तरफ मिलों की आय के स्रोत बढ़ाने की कोशिश होगी, तो दूसरी तरफ किसानों को फसल और कृषि अवशेषों से अतिरिक्त कमाई के अवसर मिल सकते हैं। कृषि अवशेषों को ईंधन में बदलने से आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई गतिविधियां पैदा करने की संभावना भी है।
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