कर्नाटक हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “कानून का डर खत्म, अपराध करना हुआ आसान”

The CSR Journal Magazine
कर्नाटक हाई कोर्ट ने हाल ही में एक रेप आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए कानून व व्यवस्था पर गहरा सवाल उठाया है। जस्टिस आर. नटराज ने कहा कि अगर किसी का हाथ या पैर काटा जाए, तब शायद लोग कानून का पालन करने की अहमियत समझेंगे। उनका यह बयान इस बात की ओर इंगित करता है कि अपराधियों में कानून का डर खत्म हो गया है।

अपराधियों के प्रति सख्त रवैया जरूरी

कोर्ट ने कहा कि अपराधियों के साथ सख्ती से न निपटने के कारण समाज में अपराध बढ़ रहे हैं। उन्होंने बताया कि लोगों में अपराध करने की प्रवृत्ति इसलिए बढ़ गई है क्योंकि उन्हें इसके गंभीर परिणाम का कोई डर नहीं है। कोर्ट ने कहा, “यदि हम सच में कठोर सजा का प्रावधान नहीं करते, तो अपराध करना आसान हो जाता है।”

जमानत याचिका पर सुनवाई

यह टिप्पणी मणिपाल के छात्र गोपी रेड्डी कार्तिक रेड्डी की जमानत याचिका पर हुई है, जो 5 अप्रैल से न्यायिक हिरासत में हैं। सुनवाई के दौरान जस्टिस नटराज ने प्रकट किया कि जब तक समाज में कानून के प्रति सख्त रवैया नहीं होगा, तब तक अपराधों में कमी लाना मुश्किल होगा। उन्होंने कहा, “अगर नमक खाया है, तो पानी भी पीना पड़ेगा।”

आपराधिक घटनाएं बढ़ती जा रही हैं

जज ने यह भी कहा कि आपराधिक घटनाएं अब आम होती जा रही हैं। उनके अनुसार, अपराधी यह सोचते हैं कि सिस्टम में कोई ताकत नहीं है। उन्होंने कहा, “कानून के दांत टूट गए हैं, जिससे अपराध को बढ़ावा मिल रहा है।” यह स्थिति न केवल कर्नाटक के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए चिंताजनक है।

कानूनी सख्ती पर ध्यान देने की जरूरत

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किसी अपराधी को सख्त सजा नहीं दी जाती, तो वह फिर से अपराध करने की हिम्मत कर सकता है। जस्टिस नटराज ने ये बातें उस समय कहीं जब उन्होंने जमानत याचिका को खारिज करने का फैसला लिया। उन्हें यह संज्ञान था कि कानून की सख्ती ही समाज को सुरक्षित रख सकती है।

समाज में कानून का सम्मान बहाल करना

कोर्ट की यह टिप्पणी कई सवाल खड़े करती है कि क्या समाज में वास्तव में कानून का सम्मान है? क्या हमें सख्त सजा के प्रावधान लागू करने की जरूरत है ताकि अपराधों में कमी लाई जा सके? न केवल अदालतें, बल्कि समाज के हर वर्ग को इस पर विचार करने की आवश्यकता है।

कर्नाटक में हालात गंभीर

कर्नाटक हाई कोर्ट की यह टिप्पणी इस बात का संकेत है कि समाज में अपराध और सजा के बीच का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है। अगर न्यायपालिका को यह महसूस हो रहा है कि कानून के प्रति धारणा कमजोर हो गई है, तो यह समय है कि हम एक साथ मिलकर इस पर विचार करें और इसे सुधारें।

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