मानसून की बेरुखी, देश में सामान्य से कम बरसा पानी, खरीफ फसलों पर संकट, महंगाई का खतरा

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भारत में 17 साल में सबसे सूखा मानसून: बिहार में 37% कम बारिश, राजस्थान में 21%; अल नीनो का असर

अल नीनो के घातक प्रभाव के कारण देश में इस वर्ष मानसून सत्रह साल में सबसे सूखा रहा है, जिसमें कुल वर्षा सामान्य से 15% कम दर्ज की गई है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, वर्ष 2009 के बाद (जब 18.3% की कमी देखी गई थी) यह देश का सबसे कमजोर मानसून सीजन साबित हुआ है। 1 जून से 21 सितम्बर 2026 तक की अवधि में जहाँ देश में सामान्य रूप से 827.2 मिलीमीटर वर्षा होनी चाहिए थी, वहीं वास्तविक आँकड़ा केवल 703.7 मिलीमीटर पर सिमट कर रह गया है। 123.5 मिलीमीटर की इस भारी गिरावट ने न केवल चालू खरीफ फसलों के उत्पादन पर संकट खड़ा कर दिया है, बल्कि आगामी रबी सीजन की बुआई और देश के प्रमुख जलाशयों के जलस्तर को भी गंभीर खतरे में डाल दिया है।

अल नीनो ने बिगाड़ा खेल: जून से सितम्बर तक का सफर

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, इस वर्ष मानसून के ऐतिहासिक रूप से कमजोर रहने की मुख्य वजह प्रशांत महासागर में तेजी से सक्रिय हुआ ‘सुपर अल नीनो’ प्रभाव है। अल नीनो की स्थिति के कारण समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से बढ़ गया, जिसने वैश्विक पवन प्रणालियों को बाधित किया और भारतीय उपमहाद्वीप की ओर बढ़ने वाली मानसूनी हवाओं को कमजोर कर दिया। इस सीजन में बारिश का वितरण न केवल कम रहा, बल्कि समय और स्थान के लिहाज से भी बेहद असंतुलित था। जून के महीने में मानसून की शुरुआत बेहद निराशाजनक रही और पूरे देश में सामान्य से 35% कम पानी गिरा। जुलाई के पहले और दूसरे सप्ताह में बंगाल की खाड़ी में बने एक गहरे अवदाब (डिप्रेशन) के चलते मानसून ने रफ्तार पकड़ी और जुलाई का महीना मामूली बढ़त के साथ बंद हुआ, जिससे किसानों को कुछ राहत की उम्मीद जगी थी। लेकिन अगस्त आते ही अल नीनो का असर फिर से हावी हो गया और यह महीना 16% की भारी कमी के साथ बीता। सितम्बर में भी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ और देश के कई हिस्सों में सामान्य से 50% तक कम बारिश दर्ज की गई। अब जब पश्चिमी राजस्थान, पंजाब और हरियाणा के कुछ हिस्सों से मानसून की आधिकारिक विदाई शुरू हो चुकी है, इस कमी की भरपाई होना पूरी तरह नामुमकिन है।

राज्यवार विश्लेषण: कहाँ कितनी कम हुई बारिश?

मौसम विभाग के उपखंड-वार आँकड़ों पर नजर डालें तो देश के 14 से अधिक राज्यों में वर्षा का घाटा 20% से लेकर 60% के बीच रहा है, जिसे मौसम विज्ञान की भाषा में ‘सूखे की स्थिति’ माना जाता है।
दक्षिण भारत (पेनिनसुला रीजन): सबसे भीषण मारइस साल मानसून की सबसे भीषण मार दक्षिण भारतीय प्रायद्वीप पर पड़ी है, जहाँ कुल मिलाकर 28% बारिश की कमी रही।
आंध्र प्रदेश: यहाँ हालात सबसे बदतर हैं, जहाँ सामान्य से 43% कम बारिश हुई है।
कर्नाटक: राज्य के अधिकांश कृषि क्षेत्रों में सूखा मंडरा रहा है, यहाँ बारिश में 31% की गिरावट आई है।
केरल: अमूमन भारी बारिश के लिए जाने जाने वाले इस तटीय राज्य में भी 28% कम पानी बरसा है।
तमिलनाडु और तेलंगाना: तमिलनाडु में 22% और तेलंगाना में 21% कम बारिश दर्ज की गई है, जिससे यहाँ के सिंचाई नेटवर्क पर दबाव बढ़ गया है।

पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत: बादलों ने फेरा मुँह

पूर्वी और उत्तर-पूर्वी हिस्सों में इस साल सामूहिक रूप से 26% बारिश की कमी रही है, जिसने चाय बागानों से लेकर धान के खेतों तक को प्रभावित किया है।
बिहार: उत्तर भारत के इस प्रमुख कृषि प्रधान राज्य में रिकॉर्ड 37% कम बारिश दर्ज की गई है। सावन और भादों के महीनों में सूखी पड़ी नदियों और खेतों ने यहाँ किसानों की कमर तोड़ दी है।
मेघालय: दुनिया के सबसे गीले स्थानों (मासिनराम और चेरापूंजी) को समेटने वाले मेघालय में इस बार ऐतिहासिक 59% की कमी दर्ज की गई है। पूर्वी खासी हिल्स और वेस्ट जयंतिया हिल्स जैसे इलाकों में पानी के प्राकृतिक झरने और जलस्रोत सूखने की कगार पर हैं।
अरुणाचल प्रदेश और असम: अरुणाचल में 41% और असम तथा मणिपुर जैसे अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों में औसतन 37% कम वर्षा हुई है।

उत्तर और पश्चिम भारत: विदाई के साथ गहराया संकट

उत्तर-पश्चिम भारत के राज्यों में भी मानसूनी हवाएँ उम्मीद के मुताबिक नहीं बरस सकीं।
पंजाब: देश के अन्न भंडार कहे जाने वाले पंजाब में 39% कम बारिश हुई है।
पश्चिमी राजस्थान: यहाँ बारिश में 31% (समग्र राजस्थान में 21%) की कमी रही। हालांकि, 19 सितम्बर को मानसून की विदाई रेखा यहाँ के रामगढ़ और फलोदी से गुजर चुकी है, जिससे अब बारिश की कोई उम्मीद नहीं बची है।
हरियाणा: यहाँ भी सामान्य के मुकाबले 21% कम बारिश का आँकड़ा सामने आया है।
इसके विपरीत, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड के कुछ हिस्सों में अगस्त के आखिरी सप्ताह और सितम्बर की शुरुआत में हुई चक्रवाती मानसूनी बारिश के कारण स्थिति नियंत्रण में रही और ये क्षेत्र सामान्य श्रेणी के करीब बने रहे।

कृषि क्षेत्र पर संकट: घटने लगा फसलों का रकबा, उत्पादन में बड़ी गिरावट के आसार

भारतीय कृषि मुख्य रूप से मानसून की बारिश पर निर्भर करती है। देश के करोड़ों किसान जून से सितम्बर के बीच होने वाली इस वर्षा के आधार पर ही अपनी फसलों की योजना बनाते हैं। इस साल बारिश के बेरुखेपन के कारण खरीफ फसलों विशेषकर धान, गन्ना, मक्का और कपास की बुआई पिछले सीजन की तुलना में 3.73% पिछड़ गई है। कृषि विशेषज्ञों और कमोडिटी विश्लेषकों का अनुमान है कि इस सूखे मानसून के चलते अकेले चावल के उत्पादन में 10 मिलियन टन (1 करोड़ टन) तक की भारी कटौती हो सकती है। धान के खेतों में पर्याप्त पानी न होने के कारण पौधों का विकास रुक गया है, जिससे प्रति हेक्टेयर पैदावार घटने की पूरी आशंका है। इसके अलावा गन्ने की फसल को भी भारी नुकसान पहुँचा है, जिससे आने वाले महीनों में चीनी उत्पादन प्रभावित होना तय माना जा रहा है।

खाद्य मुद्रास्फीति का बढ़ता दबाव और सरकार के कदम

कम बारिश का सीधा असर अब देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता की जेब पर दिखने लगा है। अगस्त के महीने में खाद्य मुद्रास्फीति (फूड इन्फ्लेशन) लगातार सातवें महीने बढ़कर 5.95% के स्तर पर पहुँच गई, जो इस वर्ष का उच्चतम स्तर है। आर्थिक विश्लेषकों के मुताबिक, मानसून में होने वाली हर 1% की कमी खाद्य महंगाई को करीब 25 बेसिस पॉइंट तक बढ़ा देती है। बाजार में जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति बनाए रखने और कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने आपातकालीन कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। चीनी की घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के लिए शुल्क मुक्त आयात की अनुमति दी जा रही है। वहीं, प्याज और टमाटर जैसी सब्जियों की आसमान छूती कीमतों को रोकने के लिए कई राज्यों में रियायती दरों पर सरकारी आउटलेट्स के जरिए बिक्री की जा रही है। चावल के निर्यात पर पहले से लगे प्रतिबंधों को और कड़ा किए जाने की संभावना है।

जलाशयों का गिरता जलस्तर: रबी सीजन के लिए खतरे की घंटी

चिंता केवल खरीफ की मौजूदा फसलों तक सीमित नहीं है। देश के केंद्रीय जल आयोग के अंतर्गत आने वाले प्रमुख 150 से अधिक जलाशयों में लाइव स्टोरेज (उपयोगी जल भंडारण) पिछले साल की तुलना में लगभग 36% कम हो गया है। दक्षिण भारत के 54 प्रमुख बांधों में जलस्तर उनकी कुल क्षमता के 80% से भी नीचे चला गया है। जलाशयों में पानी की यह कमी आने वाले सर्दियों के महीनों में बिजली उत्पादन और शहरों में पेयजल आपूर्ति को तो प्रभावित करेगी ही, साथ ही यह रबी की फसलों (गेहूँ, सरसों, चना) के लिए भी बेहद खतरनाक साबित होगी। रबी फसलों की बुआई के समय मिट्टी में नमी की आवश्यकता होती है, और सिंचाई के लिए बांधों के पानी का इस्तेमाल किया जाता है। यदि बांध खाली रहे, तो आगामी सीजन में कृषि संकट दोगुना हो सकता है।

दीर्घकालिक जल प्रबंधन की आवश्यकता

मानसून 2026 के इन निराशाजनक आँकड़ों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जलवायु परिवर्तन और अल नीनो जैसी मौसमी परिघटनाएँ अब भारतीय कृषि के लिए एक स्थायी चुनौती बन चुकी हैं। मौसम विभाग का कहना है कि सितम्बर के अंत में बंगाल की खाड़ी में एक नया कम दबाव का क्षेत्र बन सकता है, जिससे ओडिशा और आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों में कुछ बारिश हो सकती है, लेकिन यह राष्ट्रीय स्तर पर हो चुके 15% के बड़े घाटे को पाटने में सक्षम नहीं होगा। इस अभूतपूर्व सूखे से निपटने के लिए तात्कालिक राहत उपायों के साथ-साथ दीर्घकालिक रणनीतियों की जरूरत है। सरकार को प्रभावित राज्यों में सूखा राहत पैकेज, किसानों के लिए फसल बीमा के त्वरित भुगतान और ग्रामीण रोजगार योजनाओं (मनरेगा) को मजबूत करने पर ध्यान देना होगा। आने वाले समय में जल संचयन, सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप इरिगेशन) और कम पानी में उगने वाली जलवायु-अनुकूल फसलों को बढ़ावा देना ही भारत की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने का एकमात्र विकल्प होगा।

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