भारत और ऑस्ट्रेलिया ने आतंकवाद, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर समझौते किए

The CSR Journal Magazine
भारत और ऑस्ट्रेलिया ने हाल ही में वार्षिक शिखर सम्मेलन में कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। पीएम मोदी और ऑस्ट्रेलियाई पीएम एंथनी अल्बानीज ने इस सम्मेलन में आतंकवाद, इकोनॉमी और कई अन्य मुद्दों पर सामंजस्य बिठाने पर सहमति जताई। पीएम मोदी ने ऑस्ट्रेलिया में गर्मजोशी भरे स्वागत के लिए अल्बानीज को धन्यवाद कहा। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच रिश्तों में एक नई ऊँचाई आई है, जिससे सहयोग में बढ़ोतरी हो रही है।

आतंकवाद पर साझा पहल

भारत और ऑस्ट्रेलिया ने आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने का फैसला किया है। दोनों देशों ने खुफिया जानकारी साझा करने, नई तकनीक का उपयोग और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने की दिशा में कदम उठाया है। इसके अलावा, अमेरिका और जापान के साथ त्रिपक्षीय सहयोग को भी महत्व दिया गया है। यह सभी समझौते आतंक वित्तपोषण और ऑनलाइन कट्टरपंथ को काबू करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

मानवीय सहायता और आपदा राहत

मानवीय सहायता एवं आपदा राहत प्रक्रिया पर भी बात हुई है। दोनों देशों ने इस पर जोर दिया कि संकट के समय में सहयोग बढ़ाना बेहद जरूरी है। इसमें निकासी अभियानों के दौरान बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने की आवश्यकता महसूस की गई। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति एवं सुरक्षा को बनाए रखने पर भी चर्चा हुई।

साझा प्रेस कांफ्रेंस का प्रयास

पीएम मोदी ने जॉइंट प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि हमारे रिश्ते गहरे होते जा रहे हैं। अल्बानीज ने भी इस बात पर जोर दिया कि दोनों देशों के बीच के संबंधों को और मज़बूत बनाना आवश्यक है। शिक्षा, विज्ञान और टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में भी नई परिकल्पनाएं करने की योजना है। यह मुकाबला एक मजबूत और विविध साझेदारी की दिशा में आगे बढ़ने का कार्य करेगा।

डिफेंस समझौते की अहमियत

दोनों देशों ने डिफेंस सहयोग को मजबूत करने और यूरेनियम सप्लाई के मामले में सहमति जताई है। यह समझौता एक दशक से चल रही वार्ता के बाद हुआ है। भारत के सिविलियन न्यूक्लियर पावर सेक्टर के लिए ये एक महत्वपूर्ण अवसर बनेगा, जिससे दोनों देशों के बीच के संबंध नई ऊंचाई पर पहुंचेंगे। पहले से ही 2014 में न्यूक्लियर सहयोग के लिए समझौता हो चुका है।

समुद्री सुरक्षा पर ध्यान

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच समुद्री सुरक्षा पर भी खास ध्यान दिया गया है। नियमों पर आधारित व्यवस्था की बात कही गई है, जिसमें हर देश की संप्रभुता का सम्मान किया जाएगा। इसके अलावा, सैन्य अभ्यासों की संख्या और उनकी जटिलता को बढ़ाना भी दोनों देशों के बीच सहमति से किया जाएगा। इसमें सूचना साझा करने और एक बेहतर तालमेल का निर्माण करना शामिल है।

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