अल नीनो का असर: फूड बिल में बढ़ोतरी, चावल और अरहर दाल की कीमतें चढ़ने को तैयार!
देश में एक बार फिर आम जनता की जेब और रसोई के बजट पर भारी दबाव दिखने लगा है। अल नीनो (El Niño) के बढ़ते प्रभाव और कमजोर मानसून की दोहरी मार के कारण भारत का खाद्य बिल (Food Bill) तेजी से बढ़ने की कगार पर पहुंच गया है। बाजार से मिल रहे ताजा संकेतों के अनुसार, देश में सबसे ज्यादा खपत वाले अनाजों और दलहन, विशेष रूप से चावल और अरहर दाल (तूर दाल) की कीमतों में जबरदस्त उछाल आने की पूरी संभावना बन गई है। त्यौहारों के इस सीजन में मांग बढ़ने और आपूर्ति में संभावित बाधाओं के कारण खुदरा और थोक बाजारों में कीमतों की रफ्तार तेज हो गई है। केंद्रीय वित्त मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट और मूल्य निगरानी आंकड़ों ने भी इस बात की पुष्टि की है कि आने वाले महीने देश के लिए खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) के लिहाज से काफी चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। सरकार ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कृषि उत्पादन के लक्ष्यों में भी कटौती शुरू कर दी है।
चावल की कीमतों में उछाल: थोक और खुदरा बाजारों में गर्मी
देश के बहुसंख्यक हिस्से के मुख्य भोजन चावल की कीमतों में लगातार तेजी का रुख देखा जा रहा है। सरकार के मूल्य निगरानी विभाग के हालिया आंकड़ों के मुताबिक:
• थोक कीमतें: 29 सितंबर तक थोक बाजार में चावल की औसत कीमत ₹4,185 प्रति क्विंटल दर्ज की गई है। यह पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 8.5 प्रतिशत अधिक है।
• कम बारिश की मार: अगस्त महीने में सामान्य से करीब 16 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई थी। इसके बाद सितंबर में भी मानसून की बेरुखी बनी रही। इसके कारण देश के प्रमुख धान उत्पादक राज्यों में फसल के प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।
• वैश्विक मांग का दबाव: अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी थाईलैंड और वियतनाम जैसे बड़े निर्यातक देशों में चावल की कीमतें मजबूत हैं। वहीं, फिलीपींस जैसे देश लगातार अपना आयात बढ़ा रहे हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर सप्लाई चेन पर दबाव है।
हालांकि, राहत की बात यह है कि भारतीय खाद्य निगम (FCI) के सरकारी गोदामों में फिलहाल चावल का बफर स्टॉक रिकॉर्ड स्तर पर मौजूद है। लेकिन इसके बावजूद खुले बाजार में कीमतों का चढ़ना आम उपभोक्ताओं के मासिक बजट को बिगाड़ रहा है।
अरहर और चने की दालों पर भी महंगाई का तड़का
अनाजों के साथ-साथ आम भारतीय थाली का अहम हिस्सा दालें भी अब आम आदमी की पहुंच से दूर होती दिख रही हैं। दलहन की फसलों पर अल नीनो का सबसे ज्यादा असर कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पड़ा है, जहां बड़े पैमाने पर सूखे की घोषणा की गई है।
दाल की किस्म वर्तमान स्थिति और मूल्य वृद्धि का रुझान
अरहर / तूर दाल सितंबर के अंत में खुदरा बाजार में ₹125 प्रति किलोग्राम के पार निकल चुकी है। इसमें सालाना आधार पर 8% और बीते एक महीने में करीब 6% से 8% की बढ़ोतरी हुई है।
चने की दाल त्योहारी सीजन की मांग के चलते पिछले एक महीने में इसकी कीमतों में करीब 11% की भारी वृद्धि देखी गई है।
उड़द और मूंग दाल उड़द की कीमतें भी लगातार ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं, जबकि मूंग दाल में पिछले महीने करीब 10% की तेजी आई है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि उत्पादन प्रभावित होने से दालों की कमी को पूरा करने के लिए भारत को आने वाले समय में आयात (Import) पर निर्भरता बढ़ानी पड़ सकती है, जिससे घरेलू बाजार में कीमतें और भड़क सकती हैं।
सरकार ने घटाया खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य
अल नीनो और मौसम के इस बदलते मिजाज का असर देश के कुल कृषि उत्पादन पर पड़ना तय माना जा रहा है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने पहले ही स्थिति को भांपते हुए फसल वर्ष 2026-27 के लिए कुल अनाज उत्पादन का लक्ष्य घटाकर 373.93 मिलियन टन कर दिया है। यह पिछले साल के अनुमानित 376.56 मिलियन टन से काफी कम है। कृषि सचिव ने भी हाल ही में सचेत किया है कि जलवायु परिवर्तन और अल नीनो पैटर्न के कारण बारिश पर निर्भर इलाकों के लिए आने वाला रबी (सर्दियों की फसल) का सीजन भी बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।
खाद्य तेलों को नियंत्रित करने के लिए आयात शुल्क में कटौती
महंगाई के इस चौतरफा हमले के बीच सरकार ने खाद्य तेलों (Edible Oils) की कीमतों को काबू में रखने के लिए कुछ बड़े कदम उठाए हैं। वैश्विक बाजार में बायोफ्यूल के उत्पादन में खाद्य तेलों के बढ़ते इस्तेमाल के कारण कीमतें बढ़ रही थीं। सरकार ने आम उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए निम्नलिखित बदलाव किए हैं:
1. कच्चा सूरजमुखी तेल: इस पर लगने वाले आयात शुल्क (Duty) को पूरी तरह से शून्य कर दिया गया है।
2. रिफाइंड सोयाबीन और पाम ऑयल: इन पर ड्यूटी को 32.5% से घटाकर 27.5% किया गया है।
3. रिफाइंड सूरजमुखी तेल: इसके आयात शुल्क को भी घटाकर 22.5% के स्तर पर लाया गया है।
वित्त मंत्रालय को उम्मीद है कि इस कदम से खाद्य तेलों की लैंडेड कॉस्ट कम होगी और त्यौहारों के दौरान घरों में इस्तेमाल होने वाले तेल की कीमतों में नरमी आएगी।
आम उपभोक्ताओं के बजट पर क्या होगा असर?
अर्थशास्त्रियों और बाजार विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि खाद्य वस्तुओं की कीमतों में होने वाली यह वृद्धि सीधे तौर पर देश की खुदरा मुद्रास्फीति (Retail Inflation) को 6 से 7 प्रतिशत के पार ले जा सकती है। सरकार की मासिक आर्थिक रिपोर्ट के अनुसार, जब खाद्य पदार्थों पर लोगों का खर्च बढ़ता है, तो उनके पास गैर-खाद्य वस्तुओं (जैसे कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स, मनोरंजन और अन्य सेवाएं) पर खर्च करने के लिए डिस्पोजेबल इनकम (बचत राशि) कम बचती है। इसका सीधा असर देश की समग्र आर्थिक रिकवरी और त्योहारी सीजन के दौरान होने वाले अन्य व्यापारों पर भी देखने को मिल सकता है। आने वाले कुछ हफ्तों में खरीफ फसलों के अंतिम उत्पादन के आंकड़े और रबी सीजन की बुआई का पैटर्न ही यह तय करेगा कि भारत इस अल नीनो जनित खाद्य संकट से कितनी मजबूती से निपट पाता है।
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