सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर CJP का विरोध: सौरभ दास बोले- ‘हमें फैसला मंजूर नहीं’, गंभीर मामलों के आरोपियों की रिहाई की मांग पर छिड़ी बहस
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के हालिया आंदोलन और उससे जुड़े मामलों को लेकर देश में राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हो गई है। CJP के प्रवक्ता सौरभ दास ने सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश पर आपत्ति जताई है, जिसमें कथित तौर पर यह कहा गया कि जिन गिरफ्तार व्यक्तियों के खिलाफ पहले से गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं, उन्हें स्वतः रिहा नहीं किया जाना चाहिए और उनके मामलों पर कानून के अनुसार कार्रवाई जारी रहे। सौरभ दास ने मीडिया से बातचीत में कहा कि “सुप्रीम कोर्ट का फैसला हमें मंजूर नहीं है। सुप्रीम कोर्ट कह रही है कि जिन पर पहले से FIR हैं, उन्हें मत छोड़िए, तो हमें यह मंजूर नहीं है। सरकार हमारी मांगों को बिना किसी ‘किंतु-परंतु’ के पूरा करे।” उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया, राजनीतिक गलियारों और कानूनी विशेषज्ञों के बीच नई बहस शुरू हो गई है।
हालांकि, इस पूरे विवाद में यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी भी मामले में अंतिम सत्य न्यायालय के आदेश, पुलिस रिकॉर्ड और आधिकारिक दस्तावेजों से ही तय होता है। सार्वजनिक दावों और आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक होती है।
क्या है पूरा मामला?
हाल के दिनों में CJP द्वारा विभिन्न मांगों को लेकर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए गए। इन प्रदर्शनों के दौरान कई स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की घटनाएं सामने आईं। दिल्ली पुलिस ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया और कई गिरफ्तारियां भी कीं। इसके बाद CJP की ओर से गिरफ्तार सभी लोगों की रिहाई की मांग उठाई गई। संगठन का कहना है कि आंदोलन में शामिल लोगों के खिलाफ की गई कार्रवाई राजनीतिक और दमनात्मक है तथा सरकार को सभी प्रदर्शनकारियों को बिना शर्त रिहा करना चाहिए। दूसरी ओर, पुलिस का कहना है कि गिरफ्तार किए गए सभी लोगों की स्थिति समान नहीं है। कुछ व्यक्तियों के खिलाफ पहले से भी विभिन्न आपराधिक मामले दर्ज होने का दावा किया गया है। इन्हीं मामलों को लेकर न्यायालय में सुनवाई हुई।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर विवाद
विवाद उस समय और बढ़ गया जब यह दावा सामने आया कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन व्यक्तियों के खिलाफ पहले से गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं, उन्हें सामान्य प्रदर्शनकारियों की श्रेणी में रखकर स्वतः रिहा नहीं किया जा सकता और प्रत्येक मामले का निर्णय उसके तथ्यों तथा कानून के अनुसार किया जाएगा। इसी कथित रुख पर प्रतिक्रिया देते हुए सौरभ दास ने कहा कि उनकी पार्टी इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं है और सरकार को सभी गिरफ्तार लोगों को बिना किसी शर्त के रिहा करना चाहिए। हालांकि, न्यायालय के आदेश की व्याख्या केवल अधिकृत आदेश-पत्र के आधार पर ही की जानी चाहिए।
किन आरोपों की हो रही है चर्चा?
विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और सार्वजनिक दावों में यह कहा गया है कि गिरफ्तार व्यक्तियों में कुछ ऐसे लोग भी शामिल हैं जिनके खिलाफ पहले से गंभीर आपराधिक मामले, जैसे हत्या, लैंगिक अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम तथा अन्य संगीन धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज होने का दावा किया गया है। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज होना या आरोपित होना, उसे स्वतः दोषी सिद्ध नहीं करता। भारतीय कानून के अनुसार दोष सिद्ध होने तक प्रत्येक आरोपी निर्दोष माना जाता है और अंतिम निर्णय न्यायालय द्वारा साक्ष्यों के आधार पर दिया जाता है।
कानूनी विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
संवैधानिक और आपराधिक कानून के जानकारों का कहना है कि किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन नागरिकों का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार आपराधिक मामलों की जांच या न्यायिक प्रक्रिया को स्वतः समाप्त नहीं कर सकता। यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ पहले से गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं, तो उसकी गिरफ्तारी, जमानत या रिहाई का निर्णय न्यायालय संबंधित तथ्यों, साक्ष्यों और कानून के आधार पर करता है। केवल किसी आंदोलन में भाग लेने से पूर्व दर्ज मामलों का स्वतः निरस्तीकरण नहीं हो जाता। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यदि किसी आरोपी को लगता है कि उसके खिलाफ कार्रवाई अनुचित है, तो उसके पास जमानत, याचिका और अन्य कानूनी उपाय उपलब्ध हैं।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
सौरभ दास के बयान के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दी हैं। कुछ विपक्षी नेताओं ने प्रदर्शनकारियों के अधिकारों की रक्षा की बात कही, जबकि अन्य दलों ने कहा कि कानून सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होना चाहिए और किसी भी व्यक्ति के मामले का निर्णय न्यायालय ही करेगा। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर व्यापक चर्चा चल रही है। एक पक्ष का कहना है कि आंदोलनकारियों के साथ नरमी बरती जानी चाहिए, जबकि दूसरा पक्ष यह तर्क दे रहा है कि यदि किसी के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं तो उसकी कानूनी प्रक्रिया स्वतंत्र रूप से चलनी चाहिए।
आंदोलन और कानून के बीच संतुलन
भारतीय संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है। वहीं संविधान और आपराधिक न्याय प्रणाली यह भी सुनिश्चित करती है कि किसी भी अपराध की जांच निष्पक्ष रूप से हो और कानून का शासन बना रहे। इसी कारण न्यायालय प्रत्येक आरोपी की परिस्थितियों, आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अलग-अलग निर्णय देता है। किसी सामूहिक आंदोलन में शामिल होना अपने-आप में लंबित आपराधिक मामलों के निस्तारण का आधार नहीं माना जाता। यदि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट या संबंधित न्यायालय कोई विस्तृत आदेश जारी करता है, तो उसी के आधार पर आगे की कानूनी प्रक्रिया तय होगी। गिरफ्तार व्यक्तियों के मामलों में जमानत, जांच और मुकदमे की कार्यवाही कानून के अनुसार आगे बढ़ेगी।
CJP, सुप्रीम कोर्ट और कानून के बीच बढ़ा टकराव
CJP प्रवक्ता सौरभ दास के बयान ने आंदोलन, न्यायपालिका और कानून के शासन को लेकर नई बहस को जन्म दिया है। एक ओर संगठन सभी गिरफ्तार लोगों की बिना शर्त रिहाई की मांग कर रहा है, वहीं दूसरी ओर न्यायिक प्रक्रिया इस सिद्धांत पर आधारित है कि प्रत्येक मामले का मूल्यांकन उसके तथ्यों और लागू कानून के अनुसार किया जाएगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध प्रदर्शन का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन साथ ही न्यायपालिका की स्वतंत्रता और विधि के शासन का सम्मान भी संवैधानिक व्यवस्था का मूल आधार माना जाता है।
Long or Short, get news the way you like. No ads. No redirections.
Download Newspin and Stay Alert, The CSR Journal Mobile app, for fast,
crisp, clean updates!
Google Play Store –

