विले पार्ले की गलियों में कभी सुबह-शाम बिस्कुट की सौंधी खुशबू तैरती थी, जो लोकल ट्रेन से उतरते हर मुसाफ़िर को घर-सा एहसास कराती थी। दशकों तक यह फैक्ट्री सिर्फ़ उत्पादन का केंद्र नहीं, बल्कि शहर की स्मृतियों, मेहनत और भरोसे की पहचान रही। अब वही जगह बदलते समय की गवाही देते हुए कांच और कंक्रीट के टावरों में ढलने जा रही है, और वह महक हमेशा के लिए यादों में कैद हो जाएगी।
मुंबई के पश्चिमी उपनगर विले पार्ले में स्थित वह ऐतिहासिक पारले-जी फैक्ट्री, जिसकी सौंधी खुशबू दशकों तक पूरे इलाके को महकाती रही, अब जल्द ही अतीत का हिस्सा बनने जा रही है। 1929 में चौहान परिवार द्वारा स्थापित इस फैक्ट्री को गिराने की मंज़ूरी मिल चुकी है और अब इसकी 13.45 एकड़ (54,438.80 वर्ग मीटर) की प्राइम ज़मीन पर लगभग ₹3,961 करोड़ की लागत से एक विशाल कमर्शियल कॉम्प्लेक्सविकसित किया जाएगा। यह सिर्फ़ एक इमारत के टूटने की कहानी नहीं है, बल्कि यह मुंबई के उस बदलाव का प्रतीक है, जहां औद्योगिक पहचान धीरे-धीरे रियल एस्टेट और कॉर्पोरेट हब में तब्दील हो रही है।
1929 से शुरू हुआ सफ़र
पारले-जी की कहानी भारत के औद्योगिक इतिहास की अहम कहानियों में से एक है। 1929 में जब चौहान परिवार ने विले पार्ले में पारले प्रोडक्ट्स की नींव रखी, तब शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि यह फैक्ट्री आने वाले दशकों में भारत का सबसे लोकप्रिय बिस्कुट ब्रांड तैयार करेगी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कच्चे माल की कमी के बावजूद फैक्ट्री का संचालन जारी रहा। आज़ादी से पहले और बाद के दौर में पारले-जी बिस्कुट ने सस्ता, टिकाऊ और भरोसेमंद खाद्य विकल्प देकर आम भारतीय परिवारों में अपनी स्थायी जगह बना ली। 1950 से 1980 के दशक तक यह फैक्ट्री पूरी क्षमता से चलती रही। उस समय विले पार्ले स्टेशन से गुजरने वाले यात्रियों के लिए फैक्ट्री से उठती बिस्कुट की खुशबू रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुकी थी। स्थानीय लोग बताते हैं कि सुबह और शाम के समय पूरा इलाका मीठी सुगंध से भर जाता था।
बदलता समय, बदलती ज़रूरतें
1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण के बाद प्रतिस्पर्धा बढ़ी। पारले समूह ने देश के अन्य हिस्सों में अधिक आधुनिक और बड़े प्लांट स्थापित किए। इसके साथ ही मुंबई जैसे महानगर में ज़मीन की कीमतें तेज़ी से बढ़ने लगीं। पुरानी मशीनरी, ट्रांसपोर्ट की दिक्कतें और बढ़ती लागत के कारण विले पार्ले की इस यूनिट की व्यावसायिक उपयोगिता धीरे-धीरे कम होती चली गई। आख़िरकार 2016 में यहां बिस्कुट उत्पादन पूरी तरह बंद कर दिया गया। इसके बाद यह परिसर लंबे समय तक लगभग निष्क्रिय रहा, लेकिन लोगों की यादों में इसकी मौजूदगी बनी रही।
पुनर्विकास की तैयारी और मंज़ूरी
उत्पादन बंद होने के बाद कंपनी ने इस ज़मीन के पुनर्विकास की योजना बनानी शुरू की। चूंकि यह इलाका मुंबई एयरपोर्ट के नज़दीक है, इसलिए Airports Authority of India (AAI) से ऊंचाई संबंधी मंज़ूरियां लेना एक लंबी प्रक्रिया रही।
इसके साथ ही पर्यावरण प्रभाव आंकलन (EIA) रिपोर्ट, ट्रैफिक स्टडी और हरित क्षेत्र से जुड़े प्रस्ताव तैयार किए गए। जनवरी 2026 में State Environment Impact Assessment Authority (SEIAA) ने इस ऐतिहासिक फैक्ट्री की 21 पुरानी इमारतों को गिराने और यहां कमर्शियल परियोजना विकसित करने को हरी झंडी दे दी। योजना के तहत यहां चार भव्य ऑफिस टावर, अलग-अलग पार्किंग कॉम्प्लेक्स, रिटेल स्पेस और अन्य व्यावसायिक सुविधाएं विकसित की जाएंगी।
पर्यावरण और नियामकीय पहलू
परियोजना स्थल पर कुल 508 पेड़ दर्ज किए गए हैं। योजना के अनुसार-
• 311 पेड़ों को संरक्षित रखा जाएगा,
• 129 पेड़ हटाए जाएंगे,
• 68 पेड़ों का ट्रांसप्लांटेशन किया जाएगा।
इसके अतिरिक्त, कंपनी ने मियावाकी पद्धति से लगभग 1,200 से अधिक नए पेड़ लगाने का वादा किया है। हालांकि पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि पुराने, बड़े पेड़ों की भरपाई नए पौधों से तुरंत संभव नहीं होती।
स्थानीय लोगों की भावनाएं और यादें
इस फैसले के बाद विले पार्ले और आसपास के इलाकों में भावनात्मक प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। 68 वर्षीय रमेश कुलकर्णी, जो बचपन से इस इलाके में रहे हैं, कहते हैं, “यह सिर्फ़ फैक्ट्री नहीं थी, यह हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा थी। आज ऐसा लग रहा है जैसे बचपन की एक खुशबू हमेशा के लिए चली गई।” वहीं, कुछ स्थानीय दुकानदार इसे अवसर के रूप में देख रहे हैं। स्टेशन के पास दुकान चलाने वाले शंकर पाटिल बताते हैं, “फैक्ट्री बंद होने के बाद इलाका सूना-सा लगने लगा था। अब दफ़्तर और लोग आएंगे, तो कारोबार बढ़ेगा।” युवा पीढ़ी के विचार अपेक्षाकृत व्यावहारिक हैं। कॉलेज छात्रा साक्षी देशमुख कहती हैं, “हमने फैक्ट्री चलते हुए नहीं देखी, लेकिन इसके किस्से सुने हैं। दुख तो है, लेकिन मुंबई जैसे शहर में बदलाव ज़रूरी है।” हालांकि ट्रैफिक और भीड़ को लेकर चिंताएं भी हैं। सामाजिक कार्यकर्ता अनिल सावंत के अनुसार, “ऑफिस टावरों से ट्रैफिक का दबाव बढ़ेगा। पर्यावरणीय वादों पर सख़्ती से अमल ज़रूरी है।”
औद्योगिक पहचान से रियल एस्टेट हब तक
विले पार्ले की पारले-जी फैक्ट्री का अंत मुंबई के उस बड़े बदलाव को दर्शाता है, जहां कपड़ा मिलों, फैक्ट्रियों और गोदामों की जगह अब कॉर्पोरेट टावर और कमर्शियल कॉम्प्लेक्स ले रहे हैं। यह बदलाव आर्थिक विकास का संकेत भी है, लेकिन इसके साथ शहर अपनी औद्योगिक विरासत का एक हिस्सा भी खोता जा रहा है। लगभग एक सदी तक विले पार्ले की पारले-जी फैक्ट्री ने न सिर्फ़ बिस्कुट बनाए, बल्कि यादें, पहचान और भावनाएं भी गढ़ीं। अब जब इसकी जगह कांच और कंक्रीट के टावर खड़े होंगे, तो वह सौंधी खुशबू सिर्फ़ लोगों की स्मृतियों में रह जाएगी।
महानगर के रियल एस्टेट की बदलती स्काईलाइन
विले पार्ले की पारले-जी फैक्ट्री का पुनर्विकास न केवल शहर की रियल एस्टेट क्षितिज को बदल देगा, बल्कि यह बीते कल के औद्योगिक इतिहास को यादों में बदलते हुए भविष्य की आर्थिक आकांक्षाओं को भी प्रतिबिंबित करेगा। यह स्मरणीय बदलाव मुंबई और भारत के बदलते चेहरों का एक जीवंत उदाहरण है, जहां यादें गहरी हों, वहीं बदलाव के कदम भी मजबूर और अपरिहार्य दिखते हैं। यह कहानी विकास और विरासत के बीच उस संतुलन की याद दिलाती है, जिसे महानगर अक्सर तलाशते हैं, और कभी-कभी खो भी देते हैं।
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