काशी विश्वनाथ में पीएम मोदी ने देखी विक्रमादित्य वैदिक घड़ी, जानें इसकी खास बातें

The CSR Journal Magazine
काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित विक्रमादित्य वैदिक घड़ी ने काफी ध्यान खींचा है। यह घड़ी पहले उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में स्थापित की गई थी। इसकी विशेषता यह है कि यह ना केवल समय बताती है, बल्कि सूर्योदय, ग्रहों की स्थिति, और पंचांग की जानकारियाँ भी देती है। यह अभूतपूर्व घड़ी उज्जैन के महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ के विद्वानों द्वारा विकसित की गई है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इसे योगी आदित्यनाथ को भेंट दिया था। पीएम मोदी ने हाल ही में इस घड़ी का अवलोकन किया, जिससे यह घड़ी अब व्यापक दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बन गई है।

पीएम मोदी का विशेष अवलोकन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 29 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के दौरे के दौरान काशी विश्वनाथ परिसर में विक्रमादित्य वैदिक घड़ी का अवलोकन किया। उन्होंने घड़ी का न केवल पास से निरीक्षण किया, बल्कि इसकी कार्यप्रणाली की भी पूरी जानकारी ली। यह घड़ी इस महीने की 3 तारीख को यूपी के मुख्यमंत्री से काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित की गई थी।

विशेष समय गणना प्रणाली

इस घड़ी की टाइम-क्लॉकिंग पूरी तरह अलग है। यह समय को घंटे-मिनट के बजाय सूर्योदय से अगले सूर्योदय के आधार पर मापती है। इसका अर्थ है कि यह मानव गतिविधियों को प्राकृतिक रोशनी के अनुसार प्रबंधित करती है, जो कि एक पारंपरिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण को दिखाती है। पीएम मोदी ने इसे वर्ष 2024 में उज्जैन में लोकार्पित किया था, जिससे इसे और अधिक अहमियत मिल गई है।

महत्वपूर्ण वैज्ञानिक दृष्टिकोण

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने उज्जैन को प्राइम मेरिडियन के रूप में स्थापित करने का जोर दिया है। उन्होंने कहा कि ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) पश्चिमी संस्कृति का एक प्रभाव है। यह आधी रात को दिन की शुरुआत मानता है, जोकि वैज्ञानिक और खगोलीय दृष्टिकोण से सही नहीं है। उज्जैन में कर्क रेखा की स्थिति इसे सटीक बनाती है, और वैदिक घड़ी इस बात को प्रमाणित करती है।

सांस्कृतिक महत्व और आकर्षण

विक्रमादित्य वैदिक घड़ी केवल एक कलात्मक निर्माण नहीं है, बल्कि यह भारत के प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर को भी दर्शाती है। यह घड़ी न केवल सटीकता से समय मापती है, बल्कि यह हमारे वैदिक गणना के तरीकों को भी जीवित करती है। जैसे-जैसे लोग इस घड़ी की विशेषताओं के बारे में जान रहे हैं, उनका इस पर आकर्षण बढ़ रहा है। यह घड़ी अब काशी विश्वनाथ के परिसर में केवल एक घटक नहीं, बल्कि स्थानीय परंपराओं और संस्कृति के एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन गई है।

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