‘शमशेर’ रहेगा तैयार: GE इंजन की देरी के बीच ब्रिटेन ने भारतीय वायुसेना को सौंपे 9 रिटायर्ड जगुआर

The CSR Journal Magazine
भारत दुनिया का एकलौता राष्ट्र है, जो जगुआर लड़ाकू विमान का संचालन कर रहा है। ये विमान अब पुराने हो चुके हैं और उनके स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। इस समस्या से निपटने के लिए भारतीय वायुसेना ने पिछले कुछ वर्षों में फ्रांस, ओमान और अब ब्रिटेन से retired जगुआर विमान हासिल किए हैं ताकि उनके पुर्जों का उपयोग कर सकें। ऐसे समय में, जब GE F404 इंजन की आपूर्ति में देरी ने तेजस Mk1A लड़ाकू विमानों की डिलीवरी पर प्रभाव डाला है, ब्रिटेन ने भारत को एक बड़ी राहत प्रदान की है।

ब्रिटेन से आई राहत

ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने 9 सेवानिवृत्त SEPECAT Jaguar विमान भारतीय वायुसेना को सौंपे हैं। इनमें 5 Jaguar GR1 और 4 Jaguar T2 ट्रेनर विमान शामिल हैं। इन विमानों का मुख्य उपयोग भारतीय वायुसेना के सक्रिय जगुआर बेड़े के रखरखाव में किया जाएगा। यह राहत ऐसे समय में मिली है जब भारतीय वायुसेना को अपने पायलटों के लिए नए और सुरक्षित विमानों की जरूरत है।

लड़ाकू विमानों की संख्या में कमी

इस समय भारतीय वायुसेना के पास लगभग 29 फाइटर स्क्वाड्रन हैं, जबकि स्वीकृत संख्या 42 है। ऐसे में हालात और गंभीर हो गए हैं क्योंकि GE F404 इंजनों की आपूर्ति में देरी के कारण HAL को तेजस Mk1A की समय पर डिलीवरी करने में कठिनाई हो रही है। इसलिए पुराने और विश्वसनीय जगुआर विमानों को सक्रिय रख पाना भारतीय वायुसेना के लिए बेहद जरूरी हो गया है।

स्पेयर पार्ट्स की चुनौती

भारत ने अभी तक जगुआर लड़ाकू विमानों का संचालन जारी रखा है। लेकिन उनकी उत्पादन प्रक्रिया बंद हो जाने के बाद स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता की समस्या बढ़ गई है। इसी कारण भारतीय वायुसेना ने रिटायर्ड जगुआर विमानों को खरीदना शुरू किया है। इन 9 ब्रिटिश विमानों को उड़ाया नहीं जाएगा, बल्कि इनके महत्वपूर्ण पुर्जों को निकालकर सक्रिय बेड़े के रखरखाव में इस्तेमाल किया जाएगा।

भविष्य की रणनीति

जब तक तेजस Mk1A, तेजस Mk2 और AMCA जैसे नए स्वदेशी लड़ाकू विमान पर्याप्त संख्या में सेवा में नहीं आ जाते, तब तक जगुआर बेड़े का संचालन भारतीय वायुसेना के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहेगा। ब्रिटेन के पास अभी भी 42 रिटायर्ड जगुआर एयरफ्रेम मौजूद हैं, जो आगे चलकर भारत के लिए स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी सहयोग का आधार बन सकते हैं। यह भारतीय वायुसेना के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक रिजर्व साबित होगा।

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