क्या है EVM वोटों की गिनती का टोटलाइजर मेथड? जानें सब कुछ!

The CSR Journal Magazine
भारत में EVM (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) द्वारा वोटों की गिनती के तरीके पर अब एक बार फिर बहस छिड़ गई है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से पूछा कि टोटलाइजर मेथड को लागू करने में क्या परेशानी है? इस विवाद के पीछे कई वजहें हैं, जो राजनीतिक दलों और चुनाव आयोग के बीच मतभेद उत्पन्न कर रही हैं।

टोटलाइजर मेथड क्या है?

टोटलाइजर मेथड एक ऐसा तरीका है जिसके अंतर्गत चुनावी वोटों की गिनती का परिणाम केवल समूह स्तर पर दिखाया जाएगा, न कि बूथ-विशेष। इसका मतलब है कि अगर किसी विधानसभा क्षेत्र में 14 बूथ हैं, तो मात्र यह बताया जाएगा कि कौन-से उम्मीदवार को कितने वोट मिले, लेकिन यह नहीं पता चलेगा कि किस बूथ पर किस उम्मीदवार को कितने वोट मिले। यह प्रक्रिया चुनाव आयोग द्वारा 2008 में सुझाई गई थी।

वर्तमान वोटिंग प्रक्रिया की स्थिति, टोटलाइजर मेथड की जरूरत क्यों है?

फिलहाल, वोटों की गिनती बूथ के अनुसार होती है, जिससे राजनीतिक दलों को यह जानने में मदद मिलती है कि किस बूथ पर उनका प्रदर्शन कैसा रहा। वर्तमान व्यवस्था में Form 17C के माध्यम से EVM में दर्ज वोटों का मिलान भी होता है। इससे चुनावी पारदर्शिता बनी रहती है। समर्थकों का कहना है कि टोटलाइजर मेथड वोटरों की गोपनीयता को सुरक्षित रखने में मददगार है। अगर किसी क्षेत्र में किसी पार्टी को कम वोट मिलते हैं, तो बूथवार आंकड़े मानसिक दबाव और धमकी का कारण बन सकते हैं। टोटलाइजर के समर्थन में तर्क है कि इससे चुनाव के बाद मतदाताओं की पहचान को सुरक्षित रखा जा सकता है।

प्रस्ताव का विरोध क्यों?

हालांकि, टोटलाइजर प्रक्रिया का विरोध करने वाले राजनीतिक दलों का तर्क है कि बूथवार आंकड़े चुनावी पारदर्शिता का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। अगर EVM के कई आंकड़ों को एक साथ जोड़ दिया गया, तो किसी खास बूथ की गड़बड़ी को पहचानना मुश्किल हो जाएगा। 1 सितंबर 2026 को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि बूथवार गिनती के बजाय टोटलाइजर का उपयोग क्यों नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी पूछा कि मौजूदा चुनाव नियमों में बदलाव कर टोटलाइजर को कैसे लागू किया जा सकता है।

क्या टोटलाइजर मेथड लागू होगा?

कोर्ट ने माना कि सिद्धांत के स्तर पर टोटलाइजर वोटर की पसंद को गोपनीय रखने का उपाय हो सकता है, लेकिन इसे लागू करने के लिए कानूनी बदलाव की जरूरत होगी। अब देखना यह है कि क्या चुनाव आयोग इस दिशा में कोई कदम उठाएगा या नहीं।
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