टॉप 50 गानों में बमुश्किल 7 महिला सिंगर्स-श्रेया घोषाल ने खोली बॉलीवुड म्यूजिक इंडस्ट्री के पुरुष-प्रधान रवैये की पोल

The CSR Journal Magazine

म्यूजिक चार्ट्स पर पुरुषों का कब्जा, कहां खो गईं महिला आवाजें? श्रेया घोषाल ने बॉलीवुड म्यूजिक इंडस्ट्री के पितृसत्तात्मक ढर्रे पर उठाए तीखे सवाल

अपनी मखमली और जादुई आवाज से देश-दुनिया के करोड़ों दिलों पर राज करने वाली मशहूर पार्श्व गायिका श्रेया घोषाल ने बॉलीवुड संगीत जगत की एक कड़वी और परेशान करने वाली सच्चाई को उजागर किया है। एक हालिया बेबाक इंटरव्यू में श्रेया ने बॉलीवुड की वर्तमान म्यूजिक इंडस्ट्री को पूरी तरह ‘पुरुष-प्रधान’ (मेल-हैवी) बताते हुए इसके भीतर गहरे तक समाई पितृसत्तात्मक सोच पर तीखे सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि आज के समय में फिल्म संगीत का ताना-बाना इस तरह बुना जा रहा है जहां महिला गायिकाओं के लिए अवसर लगातार सिमटते जा रहे हैं।

म्यूजिक चार्ट्स पर असमानता का बड़ा खेल

श्रेया घोषाल ने वैश्विक म्यूजिक इंडस्ट्री का उदाहरण देते हुए भारतीय संगीत जगत के असंतुलन को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि एक तरफ जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टेलर स्विफ्ट और रिहाना जैसी महिला कलाकार म्यूजिक चार्ट्स और पूरी इंडस्ट्री पर राज कर रही हैं, वहीं भारत की स्थिति इसके बिल्कुल उलट है। श्रेया ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि अगर आज आप देश के टॉप 50 गानों की लिस्ट उठाकर देखें, तो उनमें से बमुश्किल 6 या 7 गाने ही ऐसे होंगे जिन्हें किसी महिला सिंगर ने गाया हो। उन्होंने कहा, “यह असंतुलन बहुत ज्यादा है। हमारा देश पहले ऐसा नहीं था। यह एक नया चलन बन गया है जो हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ा है।”

लता और आशा के सुनहरे दौर को किया याद

इंडस्ट्री के इस बदलते और निराशाजनक ढर्रे की तुलना करते हुए श्रेया ने दिग्गज गायिका लता मंगेशकर और आशा भोसले के सुनहरे दौर को याद किया। उन्होंने कहा कि एक जमाना था जब इन महान महिला गायिकाओं का इंडस्ट्री में दबदबा था। वे उस दौर के कई पुरुष गायकों से भी बड़ी स्टार थीं और हर साल सबसे ज्यादा हिट गाने उनके खाते में आते थे। लेकिन पिछले एक दशक में ट्रेंड्स और इंडस्ट्री के ढांचे में ऐसा बदलाव आया है जिसने महिला कलाकारों को किनारे धकेल दिया है। फिल्मों में अब अधिकांश गाने पुरुषों के नजरिए से लिखे जा रहे हैं, और महिला गायिकाओं को केवल कुछ चुनिंदा रोमांटिक ड्युएट्स या फिर विशिष्ट प्रकार के गानों तक ही सीमित कर दिया गया है।\

आपत्तिजनक बोल और गानों को ठुकराने पर बेबाक राय

इंटरव्यू के दौरान जब श्रेया से महिलाओं को वस्तु की तरह पेश करने वाले (ऑब्जेक्टिफाई करने वाले) और फूहड़ बोल वाले गानों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने चौंकाने वाला खुलासा किया। श्रेया ने बताया कि उन्होंने अपने करियर में कई ऐसे गानों को गाने से साफ मना कर दिया जिनके बोल महिलाओं के सम्मान के खिलाफ या आपत्तिजनक थे। दिलचस्प बात यह है कि उनके मना करने के बाद वे गाने दूसरे सिंगर्स से गवाए गए और बेहद लोकप्रिय भी हुए, लेकिन श्रेया को अपने फैसले पर कोई पछतावा नहीं है। अपने पुराने गानों (जैसे ‘चिकनी चमेली’) का जिक्र करते हुए उन्होंने स्वीकार किया कि करियर के शुरुआती दौर में अनजाने में उन्होंने कुछ ऐसे गाने गाए थे, लेकिन आज वे ऐसे गानों से पूरी तरह दूरी बना चुकी हैं। उन्होंने कहा, “एक शालीन या आकर्षक गाने और महिलाओं को पूरी तरह से वस्तु बनाकर पेश करने वाले गाने के बीच एक बहुत पतली लकीर होती है। जब मैं छोटी बच्चियों को इन गानों के अश्लील मतलब समझे बिना गाते हुए देखती हूं, तो मुझे बहुत असहजता होती है।”

आपत्तिजनक बोल और ऑब्जेक्टिफिकेशन वाले गाने

श्रेया घोषाल ने जिन गानों में महिलाओं को वस्तु की तरह पेश करने (ऑब्जेक्टिफाई करने) की बात की, उनमें बॉलीवुड के कई प्रसिद्ध ‘आइटम नंबर्स’ शामिल हैं। इन गानों की धुनें तो बहुत कैची (आकर्षक) होती हैं, लेकिन इनके बोलों पर अक्सर सवाल उठते हैं।
“मुन्नी बदनाम हुई” (दबंग) और “शीला की जवानी” (तीस मार खां): इन गानों ने एक दौर में खूब लोकप्रियता बटोरी, लेकिन इनके बोल पूरी तरह से महिला पात्रों को स्क्रीन पर एक वस्तु के रूप में पेश करने वाले थे।
“फेविकोल से” (दबंग 2): इस गाने की कुछ लाइनें (जैसे महिलाओं की तुलना तंदूरी चिकन से करना) आज भी बॉलीवुड संगीत में पितृसत्तात्मक और फूहड़ सोच का बड़ा उदाहरण मानी जाती हैं।
“चिकनी चमेली” (अग्निपथ): यह गाना खुद श्रेया घोषाल ने गाया था। उन्होंने अपने हालिया इंटरव्यू में स्वीकार किया कि करियर के उस पड़ाव पर उन्होंने इसे गा तो दिया, लेकिन आज वे ऐसे गानों के बोलों से असहज महसूस करती हैं और अब इनसे पूरी तरह दूरी बना चुकी हैं।

महिला सशक्तिकरण और बराबरी के सकारात्मक उदाहरण

ऐसा नहीं है कि इंडस्ट्री में केवल नकारात्मक बदलाव ही आए हैं। जब महिला गायिकाओं को सही अवसर और अच्छे बोल मिलते हैं, तो वे ऐतिहासिक गाने भी देती हैं। इसके कुछ बेहतरीन उदाहरण हैं-
“घूमर” (पद्मावत): श्रेया घोषाल द्वारा गाया गया यह गाना पूरी तरह से महिला संस्कृति, नृत्य और आवाज को केंद्र में रखता है।
“परम सुंदरी” (मीमी): ए.आर. रहमान के संगीत में श्रेया घोषाल का गाया यह गाना एक महिला के इर्द-गिर्द बुना गया है, जो काफी हिट रहा।
“दिलबरो” (राज़ी): हर्षदीप कौर और विभा सराफ की आवाज में गाया यह गाना एक बेटी के नजरिए और उसकी भावनाओं को बेहद खूबसूरती और शालीनता से बयां करता है।

इंडिपेंडेंट म्यूजिक से जागी उम्मीद की किरण

हालांकि, इस पुरुष-प्रधान माहौल के बीच श्रेया को ‘इंडिपेंडेंट म्यूजिक’ (स्वतंत्र संगीत) के बढ़ते चलन से एक बड़ी उम्मीद नजर आती है। उनका मानना है कि गैर-फिल्मी और स्वतंत्र संगीत ने कलाकारों को फिल्मों की बंधी-बंधाई रूढ़ियों से बाहर निकलने का मौका दिया है। इसकी वजह से महिला कलाकारों, गीतकारों और संगीतकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने के नए मंच मिल रहे हैं। श्रेया खुद भी महिला संगीतकारों, गीतकारों और साउंड इंजीनियरों के साथ काम करने को प्राथमिकता दे रही हैं ताकि इस खाई को पाटा जा सके।अंत में उन्होंने उम्मीद जताई कि वर्तमान समय एक बदलाव का दौर है और आने वाले वक्त में फिल्म मेकर्स और संगीत प्रेमी एक बार फिर महिला आवाजों को वही सम्मानजनक और बराबरी का स्थान देंगे, जिसकी वे हकदार हैं।

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