47 मिनट की पहेली और अभेद्य iPhone 17: साहिल वाकोडे केस में तकनीकी दीवार के पीछे उलझी क्राइम ब्रांच

The CSR Journal Magazine

क्या पुलिस आपके फोन का लॉक तोड़ सकती है? IIT बॉम्बे के छात्र साहिल का iPhone बना चुनौती

डिजिटल युग में सुरक्षा और निजता (प्राइवेसी) के बीच की बहस एक बार फिर देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान आईआईटी बॉम्बे (IIT Bombay) से उठकर देश की फॉरेंसिक लैब तक पहुंच गई है। एनर्जी साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग के द्वितीय वर्ष के 22 वर्षीय छात्र साहिल रविंद्र वाकोडे की संदिग्ध आत्महत्या के मामले में मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच के सामने एक अभूतपूर्व तकनीकी दीवार खड़ी हो गई है। यह दीवार किसी और ने नहीं, बल्कि साहिल के पास मौजूद आधुनिक iPhone 17 ने खड़ी की है। इस हाई-प्रोफाइल मामले ने एक बड़ा कानूनी और तकनीकी सवाल देश के सामने रख दिया है-क्या पुलिस किसी भी नागरिक के फोन का लॉक कानूनी और तकनीकी रूप से तोड़ सकती है?

47 मिनट की अनसुलझी पहेली

घटना 18 सितंबर 2026 की है। आईआईटी बॉम्बे में मिड-सेमेस्टर की परीक्षाएं चल रही थीं। परीक्षा हॉल के भीतर लगे CCTV फुटेज और शुरुआती जानकारियों के मुताबिक, साहिल वाकोडे पर परीक्षा के दौरान मोबाइल फोन का उपयोग करने और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) प्लेटफॉर्म ChatGPT की मदद से प्रश्नों के उत्तर खोजने का आरोप लगा। परीक्षा हॉल में मौजूद इनविजिलेटर प्रोफेसर सूर्यनारायण दूल्ला ने कथित तौर पर साहिल को पकड़ा और उसे हॉल से बाहर जाने को कहा। सीसीटीवी के मुताबिक साहिल दुपहर 12:38 बजे परीक्षा हॉल से बाहर निकला और दोपहर 1:25 बजे वह अपने हॉस्टल के कमरे में पहुंचा। इस बीच 47 मिनट का एक लंबा फासला है। इस समय अंतराल के दौरान साहिल कहां गया, उसने किससे बात की, या अपने फोन पर क्या सर्च किया—यही इस पूरे मामले की सबसे बड़ी गुत्थी है। उसी शाम लगभग 7:00 बजे जब उसका कमरा नहीं खुला, तो दरवाजा तोड़ने पर साहिल का शव फंदे से लटका मिला। इस घटना के बाद IIT बॉम्बे में भारी छात्र विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। साहिल के माता-पिता ने संस्थान के प्रोफेसरों पर जातिगत भेदभाव और मानसिक प्रताड़ना का गंभीर आरोप लगाते हुए आजाद मैदान में भूख हड़ताल शुरू कर दी। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए मुंबई पुलिस ने जांच पवई पुलिस स्टेशन से हटाकर क्राइम ब्रांच (DCB CID) को सौंप दी। पुलिस ने मामले में आत्महत्या के लिए उकसाने और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज की है।

जांच की राह में ‘iPhone 17’ की दीवार

क्राइम ब्रांच की टीम इस मामले की तह तक पहुंचने के लिए साहिल के डिजिटल फुटप्रिंट्स खंगालना चाहती है। पुलिस यह जानना चाहती है कि परीक्षा हॉल से निकलने के बाद साहिल ने अपनी ChatGPT हिस्ट्री में क्या सर्च किया था, उसने किन लोगों को कॉल किया या किसे अंतिम संदेश भेजे। लेकिन सबसे बड़ी बाधा यह है कि साहिल का iPhone 17 एक मजबूत पैटर्न लॉक और उन्नत एन्क्रिप्शन (Encryption) से पूरी तरह सुरक्षित है। साहिल के दोस्तों, सहपाठियों या परिवार में से किसी को भी इस पासवर्ड या पैटर्न की जानकारी नहीं है। फोन की स्क्रीन पर लगातार कई ‘मिस्ड कॉल्स’ के नोटिफिकेशन चमक रहे हैं, लेकिन अंदर का डेटा पूरी तरह लॉक है। मुंबई क्राइम ब्रांच के पास पुराने आईफोन मॉडल से डेटा निकालने के फॉरेंसिक टूल्स तो मौजूद हैं, लेकिन ऐपल (Apple) के नवीनतम ऑपरेटिंग सिस्टम और हार्डवेयर सुरक्षा के सामने पुलिस के पारंपरिक सॉफ्टवेयर और फॉरेंसिक गैजेट्स पूरी तरह बेअसर साबित हो रहे हैं।

तकनीकी विश्लेषण: क्या पुलिस वाकई फोन का लॉक तोड़ सकती है?

इस मामले ने इस बुनियादी सवाल को जन्म दिया है कि भारत में कानून प्रवर्तन एजेंसियां (पुलिस, CBI, ED) किसी लॉक्ड फोन को कैसे एक्सेस करती हैं। तकनीकी और कानूनी रूप से इसकी प्रक्रिया तीन मुख्य पहलुओं पर टिकी है-

 Apple का एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन और चिप-लेवल सिक्योरिटी

Apple अपने iPhone में सुरक्षा के लिए ‘सिक्योर एनक्लेव’ (Secure Enclave) नाम का एक अलग हार्डवेयर कॉप प्रोसेसर इस्तेमाल करता है। इसका काम यूजर के पासकोड और बायोमेट्रिक डेटा (Face ID/Touch ID) को सुरक्षित रखना है। जब कोई फोन लॉक होता है, तो उसका पूरा डेटा (फोटोज, चैट्स, फाइल्स) एक जटिल गणितीय कोड (एन्क्रिप्शन) में बदल जाता है। इसे खोलने की एकमात्र चाबी वह पासकोड या पैटर्न होता है जो यूजर ने सेट किया है। यदि कोई गलत पासवर्ड बार-बार डालता है, तो आईफोन का सिस्टम हर बार नए प्रयास के लिए समय बढ़ा देता है (जैसे 1 मिनट, 5 मिनट, 1 घंटा) और अंततः फोन का डेटा हमेशा के लिए लॉक या डिलीट (Wipe) हो सकता है। यही कारण है कि पुलिस सीधे तौर पर ‘हिट एंड ट्रायल’ यानी बार-बार गलत पासवर्ड डालने का जोखिम नहीं ले सकती।

फॉरेंसिक टूल्स और थर्ड-पार्टी एजेंसियां (जैसे Cellebrite और GrayKey)

क्या पुलिस के पास कोई जादुई सॉफ्टवेयर होता है? दुनिया भर की पुलिस और जांच एजेंसियां इजरायली कंपनी सेलिब्राइट (Cellebrite) या ग्रेकी (GrayKey) जैसे विशेष फॉरेंसिक उपकरणों का उपयोग करती हैं। ये उपकरण स्मार्टफोन के ऑपरेटिंग सिस्टम में मौजूद अज्ञात सुरक्षा खामियों (जिन्हें ‘ज़ीरो-डे वल्नरेबिलिटी’ कहा जाता है) का फायदा उठाकर लॉक को बाईपास करने या डेटा निकालने का प्रयास करते हैं।

पुरानी तकनीक बनाम नई तकनीक

जांच एजेंसियों के लिए पुराने आईफोन मॉडल्स (जैसे आईफोन 11, 12 या 13) का लॉक तोड़ना अपेक्षाकृत आसान होता है, क्योंकि उनकी सुरक्षा खामियां दुनिया के सामने आ चुकी होती हैं। लेकिन जब बात iPhone 17 जैसे बिल्कुल नए मॉडल्स की आती है, तो ऐपल हर नए सॉफ्टवेयर अपडेट के साथ उन कमियों को ठीक कर देता है। यही वजह है कि मुंबई क्राइम ब्रांच अब भारत की केंद्रीय फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (CFSL) और गांधीनगर की राष्ट्रीय फॉरेंसिक विज्ञान विश्वविद्यालय (NFSU) जैसे विशिष्ट विशेषज्ञों से तकनीकी सहायता मांग रही है।

क्या ऐपल खुद पुलिस की मदद कर सकता है?

अक्सर लोग सोचते हैं कि पुलिस ऐपल कंपनी को पत्र लिखकर फोन अनलॉक करवा सकती है। लेकिन हकीकत इसके उलट है। ऐपल का आधिकारिक रुख यह है कि उन्होंने अपने फोन का सुरक्षा ढांचा इस तरह तैयार किया है कि स्वयं ऐपल के इंजीनियर भी किसी उपभोक्ता का पासवर्ड जाने बिना फोन का लॉक नहीं खोल सकते। अमेरिकी जांच एजेंसी FBI और ऐपल के बीच 2016 के सैन बर्नार्डिनो शूटर मामले में ऐसा ही विवाद हुआ था, जहां ऐपल ने अमेरिकी सरकार के दबाव के बावजूद आईफोन को अनलॉक करने के लिए कोई ‘बैकडोर’ (गुप्त रास्ता) बनाने से साफ इनकार कर दिया था। हालांकि, ऐपल कानूनी वारंट होने पर यूजर के iCloud (क्लाउड बैकअप) पर स्टोर डेटा को सरकार के साथ साझा कर सकता है, बशर्ते यूजर ने क्लाउड पर ‘एडवांस्ड डेटा प्रोटेक्शन’ ऑन न किया हो।

कानूनी पहलू: क्या आपको अपना पासवर्ड बताने के लिए मजबूर किया जा सकता है?

आत्म-दोषारोपण के खिलाफ अधिकार (Right against Self-Incrimination): भारतीय संविधान का अनुच्छेद 20(3) यह कहता है कि किसी भी आरोपी व्यक्ति को अपने ही खिलाफ गवाह बनने या सबूत देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों के अनुसार, पुलिस किसी आरोपी को उसके फोन का पासवर्ड बताने या फिंगरप्रिंट देने के लिए शारीरिक या मानसिक रूप से बाध्य नहीं कर सकती, क्योंकि इसे आत्म-दोषारोपण माना जा सकता है।
जांच में सहयोग का नियम: हालांकि, नए आपराधिक कानूनों (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के तहत, अदालतों के पास जांच के दायरे को बढ़ाने के लिए विशिष्ट मामलों में डिजिटल डिवाइस को जब्त करने और उनके तकनीकी विश्लेषण के आदेश देने की शक्तियां हैं। चूंकि साहिल के मामले में वह स्वयं पीड़ित है और मामला आत्महत्या का है, इसलिए पुलिस परिवार की सहमति से डेटा निकालने की पूरी कोशिश कर रही है, लेकिन तकनीकी सीमाएं कानून से बड़ी बाधा बन चुकी हैं।

आगे क्या करेगी मुंबई क्राइम ब्रांच?

साहिल वाकोडे मामले में मुंबई क्राइम ब्रांच अब बहुस्तरीय रणनीति पर काम कर रही है-
लैपटॉप और क्लाउड एनालिसिस: पुलिस ने साहिल का लैपटॉप भी जब्त किया है, जिसे फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है। आईफोन की तुलना में लैपटॉप (यदि वह विंडोज या पुराना मैक है) से डेटा रिकवर करना थोड़ा आसान हो सकता है। पुलिस साहिल के गूगल अकाउंट, चैट जीपीटी लॉग-इन क्रेडेंशियल्स और सोशल मीडिया अकाउंट्स को अन्य डिवाइस के जरिए एक्सेस करने की कोशिश कर रही है।
कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDR): फोन लॉक होने के बावजूद सिम कार्ड ऑपरेटर के जरिए पुलिस को साहिल के कॉल रिकॉर्ड्स और लोकेशन टावर डेटा मिल चुके हैं, जिससे यह साफ हो रहा है कि उसने किन नंबरों पर बात की थी।
गहन फॉरेंसिक जांच: आईफोन को अत्याधुनिक फॉरेंसिक लैब में भेजा गया है, जहां ‘मिररिंग’ (Mirroring) तकनीक या चिप-ऑफ तकनीक (बेहद जटिल मामलों में) के इस्तेमाल पर विचार किया जा सकता है, हालांकि आईफोन 17 में चिप-ऑफ से डेटा नष्ट होने का खतरा शत-प्रतिशत होता है।

iPhone की स्मार्ट तकनीक बनी अभेद्य दीवार

IIT बॉम्बे के छात्र साहिल वाकोडे का मामला यह साबित करता है कि वर्तमान तकनीकी युग में पुलिस हर फोन का लॉक चुटकियों में नहीं तोड़ सकती। आधुनिक स्मार्टफोन कंपनियों की एन्क्रिप्शन तकनीक इतनी मजबूत हो चुकी है कि वह दुनिया की सर्वश्रेष्ठ जांच एजेंसियों के लिए भी एक अभेद्य किला बन जाती है। जब तक डिजिटल फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स को इस नए आईफोन मॉडल को भेदने का कोई रास्ता नहीं मिलता, तब तक साहिल की मौत के आखिरी 47 मिनट का सच उसी के फोन में दफन रहेगा।

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