राजस्थान की 46 डिग्री गर्मी में ‘देशी फ्रिज’ बनी मटकी, ठंडा पानी ही नहीं सेहत और पर्यावरण की भी रखवाली

The CSR Journal Magazine
राजस्थान में तापमान 46 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने के साथ भीषण गर्मी ने जनजीवन को प्रभावित कर दिया है। ऐसे में मिट्टी की मटकी एक बार फिर लोगों के लिए राहत का सबसे भरोसेमंद साधन बनकर उभरी है। गांवों से लेकर शहरों तक मटकी का पानी न सिर्फ प्राकृतिक रूप से ठंडा रहता है, बल्कि यह सेहत, पर्यावरण और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी बेहद फायदेमंद माना जा रहा है।

भीषण गर्मी में मटकी बनी सबसे बड़ी राहत

राजस्थान में गर्मी अपने चरम पर है और कई जिलों में पारा 46 डिग्री तक पहुंच गया है। ऐसे मौसम में लोगों के लिए ठंडा और सुरक्षित पानी सबसे बड़ी जरूरत बन जाता है। मिट्टी की मटकी इस जरूरत को प्राकृतिक तरीके से पूरा करती है। इसकी महीन छिद्रयुक्त सतह से पानी धीरे-धीरे वाष्पित होता है, जिससे अंदर का पानी स्वाभाविक रूप से ठंडा बना रहता है। यही वजह है कि गांवों में आज भी इसे ‘देशी फ्रिज’ कहा जाता है। ग्रामीण इलाकों में घरों के बाहर, चौपालों और रास्तों के किनारे मटकी या पानी के प्याऊ रखे जाते हैं, जहां राहगीर गर्मी में ठंडा पानी पीकर राहत महसूस करते हैं।

सेहत के लिए फ्रिज और प्लास्टिक बोतल से बेहतर

विशेषज्ञों के अनुसार, मटकी का पानी फ्रिज के अत्यधिक ठंडे पानी की तुलना में शरीर के लिए ज्यादा अनुकूल होता है। बहुत ठंडा पानी गले, पाचन तंत्र और शरीर के तापमान संतुलन पर असर डाल सकता है, जबकि मटकी का पानी हल्का ठंडा और प्राकृतिक तापमान वाला होता है। मिट्टी के बर्तन में रखा पानी कई बार हल्की क्षारीय (alkaline) प्रकृति का हो जाता है, जो पाचन के लिए लाभकारी माना जाता है। यह शरीर को हाइड्रेट रखने के साथ लू और डिहाइड्रेशन से बचाने में भी मदद करता है।
इसके विपरीत प्लास्टिक की बोतलों में लंबे समय तक रखा पानी स्वास्थ्य के लिए जोखिम भरा हो सकता है। गर्मी में प्लास्टिक से माइक्रोप्लास्टिक और हानिकारक रसायन पानी में मिल सकते हैं, जो शरीर के लिए नुकसानदायक माने जाते हैं।

पर्यावरण और जलवायु के लिए भी फायदेमंद

मटकी सिर्फ ठंडा पानी देने का साधन नहीं, बल्कि यह पर्यावरण के लिए भी एक बेहतरीन विकल्प है। फ्रिज बिजली पर निर्भर होता है, जिससे ऊर्जा की खपत बढ़ती है, जबकि मटकी बिना बिजली के प्राकृतिक तरीके से पानी ठंडा रखती है। इससे बिजली की बचत होती है और कार्बन उत्सर्जन भी कम होता है। साथ ही यह पूरी तरह प्लास्टिक-फ्री और क्लाइमेट-फ्रेंडली विकल्प है। एक मिट्टी की मटकी उपयोग के बाद पर्यावरण में आसानी से मिल जाती है, जबकि प्लास्टिक की बोतलें लंबे समय तक कचरे के रूप में बनी रहती हैं।

कुम्हारों की आजीविका को मिल रहा सहारा

गर्मियों के मौसम में मटकी की मांग बढ़ने से कुम्हार समुदाय को भी रोजगार और आय का बड़ा सहारा मिलता है। राजस्थान के गांवों और कस्बों में कुम्हार परिवार इस मौसम में बड़ी संख्या में मटकी, सुराही और घड़े बनाते हैं। इससे उनकी पारंपरिक कला को बढ़ावा मिलता है और स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। एक ओर जहां लोग ठंडा और स्वास्थ्यवर्धक पानी पा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय कारीगरों को आजीविका मिल रही है। इस तरह मटकी का उपयोग स्वास्थ्य, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था तीनों के लिए लाभकारी साबित हो रहा है।
भीषण गर्मी के इस दौर में मिट्टी की मटकी एक बार फिर साबित कर रही है कि पारंपरिक भारतीय उपाय आज भी आधुनिक विकल्पों से कहीं बेहतर और टिकाऊ हो सकते हैं। गाँवों की यह पुरानी परंपरा अब शहरों में भी तेजी से लौटती दिखाई दे रही है।

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