हूती हमलों के खिलाफ सऊदी अरब की मदद में पाकिस्तान की चुप्पी: जानें 5 प्रमुख कारण

The CSR Journal Magazine

पाकिस्तान की चुप्पी के पीछे की वजहें

इस्लामाबाद: यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर प्रभावशाली हमले किए हैं, जिसने उनकी सुरक्षा को चुनौती दी है। ये हमले सऊदी अरब के महत्वपूर्ण ऊर्जा Infrastruktur पर हुए हैं, जिसमें कई नागरिकों के घायल होने की भी सूचना है। जबकि पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ एक रक्षा समझौता किया है, यह सवाल उठता है कि वह हूती विद्रोहियों के खिलाफ सक्रिय क्यों नहीं हो रहा।

क्या मक्का समझौता अब प्रभावी रहेगा?

सऊदी अरब पर हुए हालिया हमलों के मद्देनजर, मक्का संयुक्त रक्षा समझौता की ताकत को एक बार फिर परखा जा रहा है। Pakistan ने इस समझौते का महत्व पहले समझा था, लेकिन अब उसकी कार्रवाई ना करने की स्थिति पर सवाल उठते हैं। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा है कि अगर स्थिति और बिगड़ी, तो समझौता सक्रिय हो सकता है।

पाकिस्तान का युद्ध से बचने का प्रयास

पाकिस्तान इस समय आर्थिक तंगी से जूझ रहा है। वह जानता है कि यदि वह सऊदी अरब के युद्ध में शामिल होता है, तो उसकी सैन्य शक्ति पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। इसलिए, रावलपिंडी के सैन्य सलाहकार सऊदी अरब में पाकिस्तान की भूमिका को सीमित रखना चाहते हैं।

पाकिस्तान का संसद में लिया गया फ़ैसला

2015 में जब सऊदी अरब ने पाकिस्तान की सैन्य मदद मांगी, तो पाकिस्तान की संसद ने तटस्थ रहकर एक विश्वसनीय कूटनीतिक मध्यस्थ बनने का निर्णय लिया। इस निर्णय ने उस समय यह स्पष्ट कर दिया था कि पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ तब ही खड़ा होगा जब उसकी क्षेत्रीय अखंडता को सीधा खतरा होगा।

ईरान के साथ संबंधों का ध्यान रखना

हूती विद्रोहियों को ईरान का समर्थन प्राप्त है, और पाकिस्तान इस परिस्थिति में ईरान की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहता। ईरान की नाराजगी से पाकिस्तान को आर्थिक नुकसान भी हो सकता है, क्योंकि ईरान से उसके तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।

घरेलू सांप्रदायिक स्थिति का ध्यान रखना

पाकिस्तान में बड़ी संख्या में शिया मुस्लिम आबादी है। यदि पाकिस्तानी सेना हूती विद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई करती है, तो उसे घरेलू स्तर पर शिया समुदाय के विरोध का सामना करना पड़ सकता है। इससे पाकिस्तान में अस्थिरता का खतरा बढ़ सकता है।

भारत और अफगानिस्तान की सीमा सुरक्षा

पाकिस्तान को यह डर है कि यमन में संघर्ष में शामिल होने से भारत और अफगानिस्तान की सीमाएं अधिक असुरक्षित हो सकती हैं। उसे अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता दी है, और वह इस रिस्क को लेने के लिए तैयार नहीं है। यदि पाकिस्तान सऊदी अरब में सैन्य हस्तक्षेप करता है, तो उसे उसके गंभीर परिणामों का भी सामना करना होगा।

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