साकीनाका में छात्रों के दस्तावेजों से खुलवाए 75 फर्जी बैंक खाते, नौकरी का झांसा देकर आधार-पैन, फोटो और अंगूठे के निशान लिए
महानगर में साइबर अपराध का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं के सामने खड़े एक नए खतरे को उजागर कर दिया है। साकीनाका पुलिस ने एक अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश करते हुए पांच लोगों को गिरफ्तार किया है, जिस पर कॉलेज छात्रों के पहचान संबंधी दस्तावेजों और जैविक पहचान का कथित दुरुपयोग कर फर्जी बैंक खाते खुलवाने और उन खातों के जरिए साइबर अपराध से हासिल रकम को घुमाने का आरोप है। पुलिस की जांच में कम से कम 75 ऐसे खाते सामने आए हैं और इनमें 10 जनवरी से 5 मार्च के बीच करीब 50 करोड़ रुपये की संदिग्ध साइबर अपराध राशिआने-जाने का पता चला है।
आधार कार्ड, पैन कार्ड, तस्वीरें और अंगूठे के निशान लिए
मामले की शुरुआत पांच कॉलेज छात्रों की शिकायत से हुई। इन छात्रों को कथित तौर पर अंशकालिक नौकरी दिलाने का लालच दिया गया था। उनसे नौकरी के लिए आधार कार्ड, पैन कार्ड, तस्वीरें और अंगूठे के निशान लिए गए। लेकिन नौकरी या वेतन मिलने के बजाय उन्हीं दस्तावेजों का इस्तेमाल उनके नाम पर बैंक खाते खोलने के लिए कर दिया गया। पुलिस को जांच के दौरान पता चला कि केवल इन पांच छात्रों के नाम पर ही एक राष्ट्रीयकृत बैंक में 11 खाते खोले गए थे। इन खातों में महज 15 दिनों में लगभग 9 करोड़ रुपये का संदिग्ध लेन-देन हुआ।
नौकरी का झांसा, फिर दस्तावेजों का खेल
पुलिस के अनुसार इस मामले में शिकायत करने वाले पांच छात्रों की उम्र करीब 19 से 21 वर्ष के बीच है। इनमें यश पराडकर, अनंत यादव, अभिषेक तिवारी, सक्षम भट्ट और हरदीप तिवारी शामिल हैं। उन्हें उनके एक सहपाठी के माध्यम से आरोपी साहिल जावेद कैप्टन से मिलवाया गया था। उन्हें बताया गया था कि उनके लिए अंशकालिक नौकरी की व्यवस्था की जा सकती है। पुलिस की जांच के मुताबिक 5 जनवरी को आरोपी ने छात्रों से मुलाकात की और उन्हें नया मोबाइल दूरभाष क्रमांक लेने में मदद की।
जाली हस्ताक्षर से खुले खाते
इसके बाद उन्हें साकीनाका के सफेद पुल इलाके में स्थित एक एजेंसी तक ले जाया गया। कथित तौर पर उन्हें बताया गया कि नौकरी का भुगतान प्राप्त करने के लिए बैंक खाते की जरूरत होगी। यहीं से पूरे मामले ने गंभीर रूप ले लिया। नौकरी का वादा करने के बावजूद छात्रों को न तो नियुक्ति-पत्र मिला और न ही नौकरी। दूसरी तरफ उनके पहचान संबंधी दस्तावेजों, तस्वीरों और अंगूठे के निशानों का कथित तौर पर बैंक खाते खोलने में इस्तेमाल कर लिया गया। पुलिस का आरोप है कि खाते खोलने के लिए आवश्यक दस्तावेजों पर छात्रों के हस्ताक्षर तक कथित रूप से जाली बनाए गए।
पांच छात्रों के नाम पर 11 खाते
मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू तब सामने आया जब छात्रों को अपने नाम पर खोले गए बैंक खातों की जानकारी मिली। कानून की पढ़ाई कर रहे यश पराडकर को संदेह हुआ कि उनके साथ धोखा हुआ है। उन्होंने सामाजिक माध्यमों पर फर्जी नौकरी के नाम पर युवाओं को साइबर अपराध के जाल में फंसाए जाने की चेतावनियां देखी थीं। इसके बाद छात्रों ने अलग-अलग बैंकों में अपने नाम से चल रहे खातों की जानकारी जुटानी शुरू की। जांच में उन्हें पता चला कि उनके नाम पर कई खाते खोले गए हैं। इनमें से दो खातों को दिल्ली और मध्य प्रदेश की साइबर पुलिस पहले ही साइबर अपराध से संबंधित शिकायतों के बाद रोक चुकी थी।
छात्रों की चिंता इसलिए भी बढ़ गई क्योंकि अगर उनके नाम से खुले खातों में अपराध की रकम का लेन-देन हुआ था तो भविष्य में जांच एजेंसियों की नजर उनके नाम पर भी जा सकती थी। यानी जिन युवाओं को नौकरी मिलने की उम्मीद थी, वे अनजाने में ऐसे बैंक खातों के कथित धारक बना दिए गए जिनका इस्तेमाल साइबर अपराध की रकम को आगे पहुंचाने में किया जा रहा था।
75 खातों तक पहुंची जांच
शुरुआत में पुलिस के सामने केवल पांच छात्रों और 11 खातों का मामला था। लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, कथित नेटवर्क का दायरा बढ़ता गया। पुलिस ने पाया कि मुंबई, कल्याण और नवी मुंबई के कॉलेज छात्रों के दस्तावेजों और जैविक पहचान का इस्तेमाल करके कम से कम 75 खाते खोले गए थे। पुलिस की चार सौ पन्नों की आरोप-पत्र रिपोर्ट के अनुसार, इन 75 खातों का संबंध राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग मंच पर दर्ज 101 शिकायतों से पाया गया है। इन खातों के माध्यम से कथित साइबर अपराध की रकम अलग-अलग खातों में भेजी जाती थी, जिससे रकम के वास्तविक स्रोत और अंतिम लाभार्थी तक पहुंचना मुश्किल हो जाता था।
केवल 15 दिन में 9 करोड़ का लेन-देन
पांच छात्रों के नाम पर खोले गए 11 खातों में से ही करीब 9 करोड़ रुपये की संदिग्ध राशि केवल 15 दिनों मेंघुमाई गई। यह आंकड़ा इस पूरे मामले की गंभीरता को समझने के लिए काफी है। पूरे नेटवर्क के स्तर पर पुलिस को करीब 50 करोड़ रुपये की संदिग्ध साइबर अपराध राशि के लेन-देन का पता चला। यह रकम 10 जनवरी से 5 मार्च के बीच इन खातों से होकर गुजरने की बात सामने आई है। पुलिस के लिए अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इन खातों से रकम किन-किन लोगों तक पहुंची, किन साइबर अपराधों से यह पैसा आया और इस नेटवर्क के पीछे असली संचालक कौन था।
बैंक का कर्मचारी भी गिरफ्तार
इस मामले में गिरफ्तार पांच आरोपियों में बैंक से जुड़े दो व्यक्ति भी शामिल हैं। पुलिस ने रूपेश ठाकुर, जो बैंक में कार्यालय सहायक के रूप में काम करता था, और योगेश वाडकर उर्फ पाटिल, जो बैंक का कारोबारी प्रतिनिधि था, को गिरफ्तार किया है। इसके अलावा साहिल जावेद कैप्टन, सोशल मीडिया से जुड़ा युवक; प्रसाद रायकर, जो वितरण कार्य करता था; और शिवम धुबे को भी गिरफ्तार किया गया है। पुलिस ने इन गिरफ्तारियों को 5 अप्रैल से 3 मई के बीच अंजाम दिया। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि बैंक खातों को खोलने की प्रक्रिया में किस स्तर पर नियमों को दरकिनार किया गया और छात्रों के दस्तावेज तथा जैविक पहचान आरोपियों तक कैसे पहुंची।
बैंक की किट भी भेजी जाती थी
जांच में कथित तौर पर एक और महत्वपूर्ण तरीका सामने आया है। पुलिस के अनुसार बैंक की किट आरोपियों द्वारा हासिल की जाती थी और फिर उसे अलग-अलग राज्यों में भेजा जाता था। इन किट में खाते को संचालित करने के लिए जरूरी बैंकिंग सामग्री शामिल हो सकती थी। पुलिस का आरोप है कि बैंक से जुड़ी सामग्री को महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान में अलग-अलग पतों पर भेजा जाता था। इस काम के लिए सामाजिक माध्यम के एक संदेश मंच पर मिले निर्देशों का इस्तेमाल किए जाने की बात भी जांच में सामने आई है। गिरोह के कथित मुख्य संचालक का अभी पता नहीं चल पाया है।
एक छात्र की सतर्कता से खुला बड़ा राज
इस पूरे मामले में यश पराडकर की सतर्कता महत्वपूर्ण साबित हुई। उन्हें जब नौकरी से जुड़ी कोई जानकारी नहीं मिली तो उन्हें संदेह हुआ। सामाजिक माध्यमों पर फर्जी नौकरी और साइबर अपराध से संबंधित चेतावनियां देखने के बाद उन्होंने अपने साथियों के साथ जांच शुरू की। बैंक में अपने नाम से खुले खातों की जानकारी मिलने के बाद छात्रों ने पुलिस से संपर्क करने की कोशिश की। रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने अलग-अलग स्थानीय पुलिस थानों से संपर्क किया, लेकिन शुरुआती स्तर पर शिकायत पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद पराडकर ने वकील की मदद से 25 मार्च को साकीनाका पुलिस थाने में लिखित शिकायत दी। इसी शिकायत के आधार पर मामले की जांच आगे बढ़ी।
छात्रों को क्यों बनाया गया निशाना?
साइबर अपराध में ऐसे खातों को आम तौर पर ‘मनी म्यूल’ खाते कहा जाता है। ऐसे खातों का इस्तेमाल अपराध से हासिल रकम को एक खाते से दूसरे खाते में भेजने के लिए किया जाता है। इससे साइबर अपराधियों के लिए रकम का वास्तविक स्रोत छिपाना आसान हो जाता है। कॉलेज छात्रों को निशाना बनाने की वजह उनकी अपेक्षाकृत कम उम्र, नौकरी की तलाश और अतिरिक्त आमदनी की जरूरत हो सकती है। अपराधी सामान्य तौर पर ऐसी स्थिति का फायदा उठाकर आकर्षक अंशकालिक नौकरी का प्रस्ताव देते हैं और फिर दस्तावेज या बैंकिंग जानकारी हासिल करने की कोशिश करते हैं। इस मामले में आरोप और जांच का केंद्र भी यही तरीका है—नौकरी का झांसा, पहचान संबंधी दस्तावेज हासिल करना और फिर उनका कथित दुरुपयोग।
छात्र खुद बन सकते थे आरोपी!
इस मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि जिन छात्रों के दस्तावेजों का कथित दुरुपयोग हुआ, उनके नाम बैंक खातों में दिखाई दे रहे थे। ऐसे में अगर वे समय रहते अपने नाम पर खुले खातों का पता नहीं लगाते, तो भविष्य में किसी साइबर अपराध की जांच में उनकी भूमिका संदिग्ध मानी जा सकती थी। साइबर कानून विशेषज्ञों ने भी ऐसे मामलों में लोगों को सलाह दी है कि यदि किसी व्यक्ति को अपने नाम पर अनधिकृत बैंक खाता खुलने की जानकारी मिले तो वह तुरंत बैंक को सूचित करे, सभी प्रमाण सुरक्षित रखे और साइबर अपराध अधिकारियों को इसकी सूचना दे। केवल किसी व्यक्ति के नाम का किसी बैंक खाते या रकम के लेन-देन में सामने आना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वही व्यक्ति साइबर अपराध में शामिल था; वास्तविक नियंत्रण और खाते के इस्तेमाल की जांच आवश्यक होती है।
नौकरी के नाम पर आने वाले संदेशों से सावधान
मुंबई पुलिस ने भी लोगों को आसान कमाई और नौकरी के आकर्षक प्रस्तावों से सावधान रहने की सलाह दी है। विशेष रूप से सामाजिक माध्यमों पर मिलने वाले ऐसे प्रस्तावों से बचना चाहिए जिनमें बिना उचित सत्यापन के आधार कार्ड, पैन कार्ड, बैंक खाते की जानकारी, तस्वीर, हस्ताक्षर या जैविक पहचान देने के लिए कहा जाए। किसी कंपनी या संस्था के नाम पर नौकरी का प्रस्ताव मिलने पर उसके आधिकारिक पते, दूरभाष क्रमांक, वेबसाइट और भर्ती प्रक्रिया की स्वतंत्र रूप से जांच करनी चाहिए। केवल सामाजिक माध्यम पर बने खाते या संदेश को कंपनी की वास्तविक पहचान का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
आधार-पैन की प्रति देना भी बन सकता है जोखिम
आज बैंक खाता, मोबाइल नंबर, ऋण, बीमा और अन्य वित्तीय सेवाओं में पहचान संबंधी दस्तावेजों की जरूरत पड़ती है। इसलिए आधार और पैन जैसे दस्तावेजों की प्रति साझा करते समय यह देखना बेहद जरूरी है कि वह किस व्यक्ति या संस्था को और किस उद्देश्य से दी जा रही है। यदि किसी नौकरी के लिए दस्तावेज देने पड़ें तो आवेदन की वैधता की जांच करें और जहां संभव हो वहां दस्तावेज पर किस उद्देश्य के लिए प्रति दी जा रही है, इसका स्पष्ट उल्लेख करें। अनजान व्यक्ति को मूल दस्तावेज या जैविक पहचान उपलब्ध कराने से बचना चाहिए।
साइबर अपराध का बदलता चेहरा
साकीनाका का यह मामला बताता है कि साइबर अपराध अब केवल किसी व्यक्ति को फोन करके या नकली इंटरनेट पृष्ठ भेजकर पैसे ठगने तक सीमित नहीं है। अपराधी पूरे वित्तीय ढांचे का इस्तेमाल करने के लिए फर्जी या किराए के बैंक खातों का नेटवर्क भी तैयार कर रहे हैं। ऐसे खातों में अपराध की रकम आती है, फिर उसे कई खातों में भेजा जाता है और अंततः नकद निकासी, अन्य बैंक खातों या अलग-अलग माध्यमों से आगे पहुंचाया जाता है। इससे जांच एजेंसियों के लिए धन के अंतिम लाभार्थी तक पहुंचना कठिन हो जाता है। साकीनाका पुलिस की कार्रवाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस मामले में केवल एक खाते या एक शिकायत की जांच नहीं हुई, बल्कि जांच बढ़ने पर कथित रूप से 75 खातों और 101 साइबर अपराध शिकायतों के बीच संबंध सामने आया।
मुंबई पुलिस की बड़ी कार्रवाई, लेकिन नेटवर्क अभी बाकी
पांच गिरफ्तारियां होने के बावजूद जांच पूरी नहीं मानी जा सकती। पुलिस के अनुसार कथित मुख्य संचालक अभी गिरफ्त से बाहर है और कई अन्य कड़ियों की जांच की जा रही है। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि 75 खातों का इस्तेमाल किन-किन साइबर अपराधों में हुआ और उन खातों से भेजी गई रकम आखिर कहां पहुंची। जांच में यदि अन्य राज्यों या विदेशों से जुड़े लोगों की भूमिका सामने आती है तो मामला और बड़ा रूप ले सकता है। फिलहाल पुलिस की कार्रवाई ने एक ऐसे नेटवर्क को सामने लाया है, जिसमें युवाओं को नौकरी का लालच देकर उनकी पहचान का कथित तौर पर इस्तेमाल किया गया।
सबक साफ है—नौकरी चाहिए, लेकिन दस्तावेजों की कीमत पर नहीं
साकीनाका का यह मामला युवाओं के लिए एक बड़ी चेतावनी है। अंशकालिक नौकरी, घर बैठे कमाई या बिना मेहनत के बड़ी आय का लालच देने वाले किसी भी प्रस्ताव को स्वीकार करने से पहले उसकी पूरी जांच जरूरी है। आधार, पैन, तस्वीर, हस्ताक्षर, अंगूठे का निशान, बैंक खाता या एक बार इस्तेमाल होने वाला गोपनीय संकेतांक किसी अनजान व्यक्ति को देना भारी पड़ सकता है।मुंबई में सामने आया यह मामला केवल 75 खातों या 50 करोड़ रुपये के संदिग्ध लेन-देन की कहानी नहीं है। यह उस बदलते साइबर अपराध की तस्वीर है, जिसमें अपराधी सीधे पीड़ित के पैसे पर ही नहीं, बल्कि उसकी पहचान और बैंकिंग पहचान पर भी कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं।
Long or Short, get news the way you like. No ads. No redirections. Download Newspin and Stay Alert, The CSR Journal Mobile app, for fast, crisp, clean updates!
App Store – https://apps.apple.com/in/ app/newspin/id6746449540
Google Play Store – https://play.google.com/

