प्राची चौधरी ने एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीतकर भारत की पदक संख्या 30 तक पहुंचाई है

The CSR Journal Magazine

छोटे गांव से अंतरराष्ट्रीय मंच तक का सफर

नई दिल्ली. सहारनपुर के एक छोटे से गांव झबीरण की पगडंडियों पर दौड़ने वाली एक साधारण लड़की ने जब पहली बार ओलंपिक का सपना देखा, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि उसकी मेहनत एक दिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का परचम लहराएगी। प्राची चौधरी ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और अथक परिश्रम के दम पर एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीतकर न केवल देश का मान बढ़ाया है, बल्कि अपने गांव और जिले का नाम भी इतिहास के पन्नों में दर्ज करा दिया है।

भारतीय एथलेटिक्स के लिए खास दिन

एशियाई खेलों में शनिवार का दिन भारतीय एथलेटिक्स के लिए बेहद खास और उपलब्धि भरा रहा। महिलाओं की 400 मीटर स्पर्धा के फाइनल में प्राची चौधरी (Prachi Choudhary) ने अपनी शानदार दौड़ से कांस्य पदक पर कब्जा जमाया। उन्होंने यह दौड़ 53.21 सेकंड में पूरी की, जबकि बहरीन की सलवा नासिर ने 49.20 सेकंड में नया एशियाई खेल रिकॉर्ड बनाते हुए स्वर्ण पदक जीता। ईरान की ज़हरा ज़ारेई मानूजान ने 52.38 सेकंड में दौड़ पूरी कर रजत पदक जीता। भारत की एक अन्य धाविका किरण पहल ने 53.41 सेकंड में दौड़ कर पांचवां स्थान हासिल किया।

प्राची की मेहनत का फल

प्राची के इस कांस्य पदक के साथ एशियाई खेलों में भारत की कुल पदक संख्या बढ़कर 30 हो गई है। भारतीय दल ने अब तक अपने बेहतरीन प्रदर्शन से 4 स्वर्ण, 12 रजत और 14 कांस्य पदक जीते हैं। यह जीत भारतीय खेल प्रेमियों के लिए एक उत्सव की तरह है।

किसान परिवार से निकली चैंपियन

सहारनपुर की धरती से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाली प्राची पहली महिला एथलीट बन गई हैं। उनकी ऐतिहासिक सफलता के पीछे एक लंबा संघर्ष और परिवार का अटूट विश्वास छिपा है। प्राची का जन्म झबीरण गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। उनके पिता खेती-किसानी करते हैं और मां गृहणी हैं। प्राची चार भाई-बहनों में तीसरे नंबर पर हैं।

गांव के स्कूल से शुरू हुआ सफर

प्राची की प्रारंभिक शिक्षा गांव के स्कूल से शुरू हुई। वह बचपन से पढ़ाई-लिखाई में होनहार थीं, लेकिन खेलों में भी उनकी गहरी रुचि थी। जब वह कक्षा 6 में पहुंचीं, तब से स्कूल में आयोजित खेल प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने लगीं। शिक्षक उनके खेल के प्रति जुनून को देखकर उन्हें प्रोत्साहित करते रहे।

पगडंडियों पर किया अभ्यास

प्राची ने बचपन में एथलीट बनने का सपना देखा। गांव में आधुनिक सुविधाओं का अभाव था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। प्राची ने गांव की कच्ची पगडंडियों, खेतों के रास्तों और सड़कों को अपना ट्रेनिंग ग्राउंड बना लिया। सुबह की धुंध हो या कड़कड़ाती धूप, प्राची का अभ्यास कभी नहीं रुका। पगडंडियों पर बहाए गए उनके पसीने ने उन्हें आज अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता बना दिया है।

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