मिशन 2047: भारतीय रेल इतिहास का सबसे बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर पुश; 7 हाई डेंसिटी कॉरिडोर्स में बिछेंगी चार पटरियां

The CSR Journal Magazine

भारतीय रेलवे का ऐतिहासिक कायाकल्प: मोदी कैबिनेट ने 7 ‘हाई डेंसिटी कॉरिडोर्स’ को 4-लेन बनाने की दी हरी झंडी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने भारतीय रेलवे के बुनियादी ढांचे को एक नई दिशा देते हुए एक युगांतरकारी फैसला लिया है। देश के सबसे व्यस्त और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण 7 हाई डेंसिटी कॉरिडोर्स को ‘फोर-लेन’ (चार पटरियों वाला) बनाने की योजना को आधिकारिक मंजूरी दे दी गई है। करीब 11,000 किलोमीटर लंबे इन कॉरिडोरों के पूर्ण विस्तार से भारतीय रेल में सफर की रफ्तार दोगुनी होगी और मालगाड़ियों के संचालन में एक क्रांतिकारी बदलाव आएगा। केंद्रीय रेल मंत्री ने कैबिनेट बैठक के बाद आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में देश को इस ऐतिहासिक फैसले की जानकारी साझा की।

देश का ‘स्वर्णिम चतुर्भुज’ बनेगा सुपरफास्ट

रेल मंत्रालय के अनुसार, इन 7 हाई डेंसिटी रूट्स में भारत के प्रमुख महानगरों को आपस में जोड़ने वाला ‘गोल्डन क्वाड्रिलैटरल’ (स्वर्णिम चतुर्भुज) मुख्य रूप से शामिल है। इसके तहत दिल्ली-मुंबई, मुंबई-चेन्नई, चेन्नई-कोलकाता, कोलकाता-दिल्ली और बिलासपुर-कटनी जैसे अति-व्यस्त रेल मार्गों का पूर्ण रूप से आधुनिकीकरण किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, मुंबई-हावड़ा हाई डेंसिटी नेटवर्क के तहत खड़गपुर से झारसुगुड़ा तक 367 किलोमीटर लंबी चौथी रेल लाइन तथा अरकुनम से रेनिगुन्टा तक 77 किलोमीटर लंबी तीसरी व चौथी लाइन को भी विशेष तौर पर मंजूरी मिली है। ये 7 कॉरिडोर भारतीय रेलवे के कुल भौगोलिक नेटवर्क का महज 16 प्रतिशत हिस्सा हैं, लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि देश का लगभग 40 से 41 प्रतिशत रेल ट्रैफिक अकेले इन्हीं रूट्स पर निर्भर है। पटरियों की कमी के कारण इन मार्गों पर यात्री और मालगाड़ियों का अत्यधिक दबाव रहता है, जिससे अक्सर ट्रेनें लेट होती हैं। चार लाइनें पूरी तरह बिछ जाने के बाद ट्रेनों की लेटलतीफी गुजरे जमाने की बात हो जाएगी।

परियोजना का ढांचा: तीन रणनीतिक चरणों में पूरा होगा काम

सरकार इस महापरियोजना को मिशन मोड में अमलीजामा पहना रही है। पूरे 11,000 किलोमीटर के इस सघन नेटवर्क को फोर-लेन करने का ब्लूप्रिंट तीन चरणों में विभाजित किया गया है-
2,000 किलोमीटर: इस हिस्से पर चार पटरियों (फोर-लेन) का निर्माण कार्य पहले ही सफलतापूर्वक पूरा किया जा चुका है और ट्रेनें दौड़ रही हैं।
5,000 किलोमीटर: इस लंबे रेल खंड पर वर्तमान में कार्य बहुत तेजी से प्रगति पर है या इसे पूर्व में प्रशासनिक व वित्तीय स्वीकृति मिल चुकी है।
4,000 किलोमीटर: शेष बचे इस सबसे महत्वपूर्ण हिस्से को मोदी कैबिनेट ने आज अंतिम और पूर्ण वित्तीय मंजूरी प्रदान कर दी है, जिससे अब पूरे कॉरिडोर का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।
इसके अलावा, सरकार ने ₹10,700 करोड़ से अधिक की लागत वाली तीन विशिष्ट मल्टी-ट्रैकिंग परियोजनाओं को भी इसके साथ जोड़ा है, जिसमें कटनी से पेंड्रा रोड और बिलासपुर से पेंड्रा रोड जैसी महत्वपूर्ण कोयला और खनिज ढुलाई वाली रेल लाइनें शामिल हैं।

भारतीय रेलवे और देश की अर्थव्यवस्था के लिए ‘गेम चेंजर’

ट्रैफिक कंजेशन से स्थायी मुक्ति – यात्री ट्रेनों और मालगाड़ियों के लिए अलग-अलग ट्रैक उपलब्ध होने से आउटर पर खड़ी होने वाली समस्या खत्म होगी।
माल ढुलाई में अभूतपूर्व गति – कोयला, लौह अयस्क, सीमेंट और खाद्यान्न जैसे जरूरी सामानों की आपूर्ति देश के कोने-कोने में तेजी से होगी।
ईंधन और समय की भारी बचत – ट्रेनों की रफ्तार बढ़ने से लॉजिस्टिक्स लागत (Logistics Cost) में कमी आएगी, जिससे भारतीय उद्योग वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनेंगे।
रोजगार के असीम अवसर – पटरियों को बिछाने, सिग्नलिंग प्रणाली को अपग्रेड करने और निर्माण कार्यों से देश में लाखों कुशल व अकुशल रोजगार पैदा होंगे।

आधुनिकीकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम

प्रधानमंत्री के नेतृत्व में भारतीय रेलवे का पूरी तरह से ओवरहाल और आधुनिकीकरण किया जा रहा है। अभी तक भारतीय रेल में केवल दोहरीकरण (डबलिंग) या ट्रिपलिंग पर जोर दिया जाता था, लेकिन भविष्य की जरूरतों और 2047 के ‘विकसित भारत’ के संकल्प को देखते हुए अब ‘क्वाड्रुपलिंग’ (चार लाइन) को अनिवार्य बना दिया गया है। इन नई और पुरानी सभी लाइनों पर अत्याधुनिक ‘कवच’ (Kavach) सुरक्षा प्रणाली और आधुनिक डिजिटल ऑटोमैटिक सिग्नलिंग सिस्टम भी लगाया जाएगा। इससे पटरियों की क्षमता (Line Capacity) कई गुना बढ़ जाएगी। दो लाइनें केवल जाने वाली ट्रेनों के लिए और दो लाइनें आने वाली ट्रेनों के लिए आरक्षित की जा सकेंगी, जिससे एक्सप्रेस ट्रेनों को किसी मालगाड़ी या पैसेंजर ट्रेन के पीछे रेंगने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

यात्रियों के सफर और लॉजिस्टिक्स पर सीधा असर

इस फैसले का सबसे बड़ा लाभ आम मध्यमवर्गीय यात्रियों और देश के व्यापार जगत को मिलेगा। वर्तमान में दिल्ली से मुंबई या कोलकाता जाने वाली प्रीमियम ट्रेनें (जैसे राजधानी या वंदे भारत) भी कई बार भारी ट्रैफिक और मालगाड़ियों के दबाव के कारण धीमी हो जाती हैं। फोर-लेन नेटवर्क तैयार होने के बाद यात्री ट्रेनों की औसत गति में 20 से 30 किमी प्रति घंटे का बड़ा सुधार होने की उम्मीद है। वहीं दूसरी ओर, उद्योग जगत के लिए मालगाड़ियों की विश्वसनीयता बढ़ेगी। ‘हाइब्रिड एन्युटी मॉडल’ (HAM) और PPP मॉडल्स के जरिए प्राइवेट सेक्टर की विशेषज्ञता को भी इस इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार में शामिल किया जा रहा है, जिससे काम समय सीमा के भीतर पूरा हो सके।

नए भारत की नई जीवनरेखा

मोदी कैबिनेट का यह फैसला महज पटरियों को बढ़ाने का एक साधारण प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि यह देश की आर्थिक जीवनरेखा को नया विस्तार देने का महाभियान है। 11,000 किलोमीटर के इस सघन नेटवर्क का फोर-लेनिंग में बदलना भारतीय रेलवे के इतिहास का सबसे बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर पुश माना जा सकता है। आने वाले 2-3 वर्षों में जब यह परियोजना धरातल पर पूरी तरह क्रियान्वित होगी, तब देश के नागरिकों को एक बेहद सुरक्षित, समयबद्ध और विश्वस्तरीय रेल यात्रा का अनुभव प्राप्त होगा।

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