8 साल पुराने तेजप्रकाश शर्मा हत्याकांड में बड़ा फैसला, पत्नी-साले समेत तीनों आरोपी बरी

The CSR Journal Magazine
राजस्थान में जयपुर के बहुचर्चित तेजप्रकाश शर्मा हत्याकांड में करीब आठ साल बाद जिला सेशन न्यायालय ने बड़ा फैसला सुनाते हुए मृतक की पत्नी, साले और किराएदार को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ हत्या के आरोप साबित करने में पूरी तरह असफल रहा और प्रस्तुत साक्ष्य एक-दूसरे से जुड़े हुए तथा विश्वसनीय नहीं थे। ऐसे में आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए रिहा करने का आदेश दिया गया।

जलमहल की पहाड़ियों से मिला था नरमुंड, पुलिस ने बनाई थी हत्या की थ्योरी

मामले की शुरुआत वर्ष 2018 में हुई थी, जब गलता गेट थाने में हरीश कुमार शर्मा ने अपने भाई तेजप्रकाश शर्मा के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। रिपोर्ट के अनुसार तेजप्रकाश 14 जनवरी 2018 को घर से निकले थे और वापस नहीं लौटे। इसके बाद 26 जनवरी 2018 को जलमहल की पहाड़ियों में एक नरमुंड और कुछ हड्डियां बरामद हुई थीं। जांच के दौरान पुलिस ने मृतक की पत्नी सीमा शर्मा, साले श्रीकांत निर्मोही और किराएदार अभिषेक शर्मा को आरोपी मानते हुए हत्या का मामला दर्ज किया था।

बचाव पक्ष ने जांच की खामियां उजागर कीं, कोर्ट ने माना तर्क

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ता कुलदीप सिंह, वी.के. बाली और सोनल दाधीच ने पुलिस जांच और साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए। अदालत ने पाया कि जांच में कई महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक और तथ्यात्मक कमियां थीं। न्यायालय ने माना कि अभियोजन पक्ष घटनाक्रम और उपलब्ध साक्ष्यों के बीच तार्किक संबंध स्थापित करने में विफल रहा। बचाव पक्ष द्वारा उठाए गए सवालों ने पुलिस की पूरी जांच प्रक्रिया को संदेह के घेरे में ला दिया।

मेडिकल रिपोर्ट, डीएनए और कॉल रिकॉर्ड नहीं बने मजबूत सबूत

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार बरामद कंकाल लगभग एक माह पुराना था, जबकि पुलिस द्वारा प्रस्तुत समय-सीमा और घटनाक्रम उससे मेल नहीं खाते थे। इसके अलावा बरामदगी का समय और घटनास्थल की दूरी भी अविश्वसनीय प्रतीत हुई। न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि रोजनामचे में घटना से संबंधित तत्काल प्रविष्टि दर्ज नहीं की गई थी, जिससे जांच की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हुए।
इसके साथ ही डीएनए जांच के लिए आरोपियों की लिखित सहमति रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं थी। वहीं कॉल डिटेल रिकॉर्ड और मोबाइल लोकेशन भी आरोपियों की घटनास्थल पर मौजूदगी साबित नहीं कर सके। अदालत ने इन सभी तथ्यों को देखते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ मजबूत और निर्विवाद साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाया। परिणामस्वरूप पत्नी, साले और किराएदार को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।

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