महाराष्ट्र: 1 साल के कोर्स के बाद होम्योपैथी डॉक्टरों को एलोपैथी दवाएं लिखने की मंजूरी

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महाराष्ट्र में होम्योपैथी डॉक्टरों को मिली एलोपैथिक दवाएं लिखने की इजाजत

महाराष्ट्र सरकार ने चिकित्सा क्षेत्र में एक ऐतिहासिक लेकिन अत्यधिक विवादास्पद कदम उठाते हुए कुछ विशिष्ट शर्तों के तहत योग्य होम्योपैथी डॉक्टरों को एलोपैथिक दवाएं लिखने की अनुमति दे दी है। इसके साथ ही महाराष्ट्र आधुनिक औषध विज्ञान (फार्माकोलॉजी) में प्रशिक्षण प्राप्त होम्योपैथों को इस प्रकार की क्रॉस-प्रैक्टिस की कानूनी मंजूरी देने वाला देश का पहला राज्य बन गया है। राज्य सरकार के इस फैसले के तहत जिन होम्योपैथी (BHMS) डॉक्टरों ने महाराष्ट्र स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय (MUHS), नासिक से एक वर्षीय या छह महीने का ‘सर्टिफिकेट कोर्स इन मॉडर्न फार्माकोलॉजी’ (CCMP) पूरा किया है, वे अब एलोपैथिक दवाएं लिखने के पात्र होंगे। महाराष्ट्र मेडिकल काउंसिल (MMC) ने इस संबंध में अधिसूचना जारी कर ऐसे डॉक्टरों का पंजीकरण शुरू कर दिया है, जिसे लेकर पूरे राज्य में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) और रेजिडेंट डॉक्टरों (MARD) ने अनिश्चितकालीन हड़ताल और भारी विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है।

फैसले का आधार: क्या है CCMP कोर्स और इसकी पृष्ठभूमि?

महाराष्ट्र सरकार ने यह निर्णय रातों-रात नहीं लिया है, बल्कि इसकी जड़ें साल 2014 के एक विधायी संशोधन में छिपी हैं। 25 जून 2014 को राज्य सरकार ने राजपत्र अधिसूचना जारी कर ‘महाराष्ट्र होम्योपैथिक प्रैक्टिशनर्स एक्ट’ और ‘महाराष्ट्र मेडिकल काउंसिल एक्ट 1965’ में संशोधन किया था। इस संशोधन के जरिए राज्य सरकार ने ‘पंजीकृत चिकित्सा पेशेवर’ (रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर) की परिभाषा बदल दी, ताकि इसमें उन होम्योपैथों को शामिल किया जा सके जिन्होंने राज्य सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त मॉडर्न फार्माकोलॉजी कोर्स पूरा किया हो। इस पृष्ठभूमि के आधार पर, महाराष्ट्र स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय (MUHS), नासिक की विशेषज्ञ समिति द्वारा सर्टिफिकेट कोर्स इन मॉडर्न फार्माकोलॉजी (CCMP) का प्रारूप तैयार किया गया।

होम्योपैथी और MBBS के बीच संतुलन बनाने की कोशिश

संसद के पटल पर सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, यह कोर्स होम्योपैथी और MBBS के पाठ्यक्रम का तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद तैयार किया गया था, ताकि दोनों प्रणालियों के बीच के अंतर (गैप) को पाटा जा सके और होम्योपैथी डॉक्टरों को बुनियादी एलोपैथिक दवाएं सुरक्षित रूप से लिखने के योग्य बनाया जा सके। काफी समय तक कानूनी पेचों और प्रशासनिक असमंजस के कारण यह निर्णय अटका रहा। हाल ही में, महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने दवा विक्रेताओं और थोक व्यापारियों को निर्देश जारी कर साफ किया कि सीसीएमपी धारक होम्योपैथों के पर्चे (प्रिस्क्रिप्शन) पर एलोपैथिक दवाएं बेची जा सकती हैं, जिसके बाद एमएमसी ने डॉक्टरों का पंजीकरण औपचारिक रूप से शुरू कर दिया है।

सरकार का पक्ष: ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी दूर करना

महाराष्ट्र सरकार और चिकित्सा शिक्षा विभाग के इस कदम के पीछे मुख्य तर्क राज्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करना है। सरकार का मानना है कि महाराष्ट्र के ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में आज भी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) पर योग्य एमबीबीएस डॉक्टरों की भारी कमी है। ऐसी स्थिति में, फार्माकोलॉजी का विधिवत कोर्स कर चुके होम्योपैथी डॉक्टर ग्रामीण आबादी को प्राथमिक उपचार और आवश्यक जीवन रक्षक एलोपैथिक दवाएं मुहैया करा सकते हैं।

कानूनी ढांचा, सीमित अधिकार

सरकार का कहना है कि यह नियम पूरी तरह से दोनों सदनों से पारित कानून और कानूनी जांच के दायरे में तैयार किया गया है। होम्योपैथों को पूर्ण एलोपैथिक डॉक्टर का दर्जा नहीं दिया जा रहा है, बल्कि उन्हें केवल कुछ विशिष्ट और सामान्य एलोपैथिक एंटीबायोटिक्स, दर्द निवारक व प्राथमिक दवाएं लिखने की ही अनुमति होगी।

IMA और एलोपैथिक डॉक्टरों का कड़ा रुख: ‘मरीजों की जान से खिलवाड़’

सरकार के इस कदम ने आधुनिक चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े डॉक्टरों को पूरी तरह से नाराज कर दिया है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) की महाराष्ट्र शाखा और महाराष्ट्र एसोसिएशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स (MARD) ने इस नीति के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।डॉक्टरों और चिकित्सा विशेषज्ञों का विरोध निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं पर आधारित है-
सुरक्षा का संकट: डॉक्टरों का तर्क है कि साढ़े पांच साल की कठिन पढ़ाई और इंटर्नशिप के बाद मिलने वाली एमबीबीएस की डिग्री की तुलना कुछ महीनों या एक साल के सर्टिफिकेट कोर्स से कतई नहीं की जा सकती। बिना विस्तृत नैदानिक अनुभव (क्लीनिकल ट्रेनिंग) के एलोपैथिक दवाएं, विशेषकर एंटीबायोटिक्स लिखना मरीजों के स्वास्थ्य के साथ बड़ा खिलवाड़ हो सकता है।
मिक्सोपैथी और क्रॉस-प्रैक्टिस का खतरा: IMA लंबे समय से विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों को आपस में मिलाने यानी ‘मिक्सोपैथी’ का विरोध करता आया है। विशेषज्ञों का कहना है कि हर चिकित्सा पद्धति का अपना एक विज्ञान और सिद्धांत होता है, उन्हें इस तरह मिलाना चिकित्सा विज्ञान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन

प्रदर्शनकारी डॉक्टरों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में दिए अपने कई फैसलों में ‘क्रॉस-प्रैक्टिस’ (एक पद्धति के डॉक्टर द्वारा दूसरी पद्धति की दवा देना) को प्रतिबंधित किया है और इसे मेडिकल नेग्लिजेंस (चिकित्सा लापरवाही) की श्रेणी में माना है।

सड़कों पर उतरे डॉक्टर: अस्पतालों में ओपीडी ठप, स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित

पंजीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के विरोध में MARD (रेजिडेंट डॉक्टर्स) ने पूरे महाराष्ट्र में अनिश्चितकालीन हड़ताल का ऐलान कर दिया है। हड़ताल के पहले दिन रेजिडेंट डॉक्टरों ने अस्पतालों की बाह्य रोगी विभाग (OPD) सेवाओं, रूटीन वार्ड ड्यूटियों और शैक्षणिक गतिविधियों का पूरी तरह बहिष्कार कर दिया। हालांकि, मरीजों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए शुरुआत के 24 घंटों में आपातकालीन (इमरजेंसी) और ICU सेवाएं जारी रखी गई हैं। रेजिडेंट डॉक्टरों के संगठन का स्पष्ट कहना है कि जब तक सरकार इस पंजीकरण प्रक्रिया को तुरंत निलंबित नहीं करती और अदालत का अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक वे काम पर नहीं लौटेंगे। यदि सरकार ने जल्द ही इस मामले में सकारात्मक रुख नहीं अपनाया, तो आपातकालीन सेवाओं को भी ठप करने की चेतावनी दी गई है।

होम्योपैथी डॉक्टरों का स्वागत: ‘यह जनहित में लिया गया फैसला’

दूसरी ओर, होम्योपैथी चिकित्सकों के संगठनों (जैसे महाराष्ट्र यूनाइटेड होम्योपैथिक डॉक्टर्स फ्रंट – MUHDF) ने सरकार के इस कदम का पुरजोर स्वागत किया है। उनका कहना है कि वे सालों से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ बने हुए हैं। कई बार आपातकालीन स्थिति में एलोपैथिक दवा न लिख पाने के कारण मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता था। चूंकि उन्होंने सरकार के नियमों के तहत बकायदा परीक्षा पास कर मॉडर्न फार्माकोलॉजी का सर्टिफिकेट हासिल किया है, इसलिए उन्हें प्रैक्टिस का कानूनी अधिकार मिलना ही चाहिए।

आगे की राह

महाराष्ट्र में उपजा यह ‘एलोपैथी बनाम होम्योपैथी’ का विवाद केवल एक प्रशासनिक आदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की स्वास्थ्य नीति और मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा एक बेहद गंभीर मुद्दा है। जहां एक तरफ सरकार का लक्ष्य ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे के खाली स्थानों को भरना है, वहीं दूसरी तरफ डॉक्टरों की चिंता चिकित्सा मानकों की गुणवत्ता को लेकर पूरी तरह जायज है। फिलहाल मामला बॉम्बे हाई कोर्ट और राजनीतिक गलियारों में गरमाया हुआ है, और राज्य के चिकित्सा शिक्षा मंत्री हसन मुश्रीफ ने भी माना है कि अदालत के स्थगनादेशों और कानूनी पहलुओं की समीक्षा की जा रही है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि अदालत इस संवेदनशील विषय पर क्या अंतिम निर्णय सुनाती है।

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