महाराष्ट्र में कोचिंग सेंटरों पर शिकंजा, रोजाना 5 घंटे से ज्यादा क्लास पर रोक का प्रस्ताव, 13 साल से कम उम्र के बच्चों के दाखिले पर भी रोक
महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में तेजी से बढ़ते निजी कोचिंग सेंटरों को नियमन के दायरे में लाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। स्कूल शिक्षा एवं खेल विभाग ने “महाराष्ट्र प्राइवेट कोचिंग सेंटर्स (रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन) एक्ट, 2026” का मसौदा जारी किया है। प्रस्तावित कानून के तहत निजी कोचिंग संस्थानों के लिए पंजीकरण अनिवार्य करने, विद्यार्थियों की उम्र और पढ़ाई के घंटों को लेकर सीमा तय करने, फीस और रिफंड के नियम बनाने तथा छात्रों की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े प्रावधान लागू करने का प्रस्ताव है। सबसे अहम प्रस्तावों में रोजाना अधिकतम पांच घंटे तक ही कोचिंग कक्षाएं चलाने की सीमा शामिल है। इसके अलावा 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को कोचिंग में दाखिला देने पर रोक लगाने का प्रस्ताव है। सरकार का उद्देश्य विद्यार्थियों पर बढ़ते शैक्षणिक दबाव को कम करना और निजी कोचिंग व्यवस्था को अधिक जवाबदेह बनाना है।
अभी कानून नहीं, मसौदा प्रस्ताव है
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि फिलहाल यह प्रस्तावित कानून है, लागू कानून नहीं। सरकार ने मसौदे पर जनता, अभिभावकों, विद्यार्थियों, शिक्षकों और संबंधित पक्षों से सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक सुझाव 4 सितंबर 2026 को शाम 6 बजे तक भेजे जा सकते हैं। इसके बाद प्राप्त सुझावों पर विचार कर सरकार सितंबर में मसौदे को आगे बढ़ाने पर फैसला कर सकती है। इसलिए फिलहाल पांच घंटे की सीमा या 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों पर रोक को तत्काल प्रभाव से लागू नियम नहीं माना जाना चाहिए।
25 से अधिक विद्यार्थियों वाले केंद्र भी दायरे में
प्रस्तावित व्यवस्था में 25 से अधिक विद्यार्थियों वाले निजी कोचिंग सेंटरों को औपचारिक नियामकीय ढांचे में लाने की बात सामने आई है। ऐसे संस्थानों के लिए पंजीकरण और निर्धारित संचालन मानकों का पालन आवश्यक होगा। मसौदे के अनुसार, प्रत्येक शाखा को अलग कोचिंग सेंटर माना जाएगा। मौजूदा संस्थानों को कानून लागू होने के बाद निर्धारित अवधि के भीतर पंजीकरण कराना होगा। रिपोर्टों के मुताबिक मौजूदा केंद्रों को पंजीकरण के लिए छह महीने का समय देने का प्रस्ताव है, जबकि पंजीकरण की वैधता तीन वर्ष रहने का प्रावधान प्रस्तावित है। आवेदन और नवीनीकरण की प्रक्रिया ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से किए जाने की योजना है।
रोजाना पांच घंटे से ज्यादा पढ़ाई पर रोक क्यों?
प्रस्तावित कानून में पांच घंटे की दैनिक सीमा को सबसे महत्वपूर्ण प्रावधानों में माना जा रहा है। प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले कई संस्थानों में विद्यार्थी लंबे समय तक कक्षाओं, टेस्ट और अध्ययन गतिविधियों में लगे रहते हैं। सरकार का तर्क है कि अत्यधिक कोचिंग और अकादमिक दबाव विद्यार्थियों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है। नई व्यवस्था का उद्देश्य पढ़ाई और आराम के बीच बेहतर संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। खासकर कम उम्र के विद्यार्थियों को लगातार कई घंटे कोचिंग में रखने की व्यवस्था पर सरकार ने नियंत्रण का प्रस्ताव रखा है।
13 साल से कम उम्र के बच्चों को दाखिला नहीं
प्रस्तावित कानून में 13 वर्ष से कम उम्र के विद्यार्थियों के नामांकन पर रोक लगाने की बात है। यानी छोटे बच्चों को कम उम्र से ही भारी प्रतिस्पर्धी कोचिंग व्यवस्था में डालने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने की कोशिश की जा रही है। यह प्रावधान खास तौर पर उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है जहां स्कूल की नियमित पढ़ाई के साथ बच्चों को कम उम्र से ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए निजी कोचिंग में भेजा जाता है।
डमी स्कूलों पर भी लगाम
मसौदे में कोचिंग व्यवस्था और औपचारिक स्कूली शिक्षा के बीच मौजूद कथित समानांतर व्यवस्था पर भी रोक लगाने का प्रस्ताव है। डमी स्कूलों की व्यवस्था को प्रतिबंधित करने की दिशा में प्रावधान प्रस्तावित हैं। डमी स्कूल मॉडल में विद्यार्थी नियमित स्कूल की जगह मुख्य रूप से कोचिंग संस्थान की तैयारी पर निर्भर रहते हैं। इसके अलावा कोचिंग सेंटरों को मान्यता प्राप्त स्कूल या कॉलेज के परिसर में संचालन करने से रोकने और मान्यता प्राप्त स्कूलों तथा जूनियर कॉलेजों में कार्यरत शिक्षकों को कोचिंग संस्थानों में नियुक्त करने पर भी प्रतिबंध का प्रस्ताव है।
बेसमेंट में कोचिंग चलाने पर भी रोक का प्रस्ताव
प्रस्तावित नियमों में विद्यार्थियों की सुरक्षा और बुनियादी ढांचे पर विशेष ध्यान दिया गया है। रिपोर्टों के मुताबिक बेसमेंट में कोचिंग सेंटर चलाने पर रोक का भी प्रस्ताव है। इसका मकसद आग, निकासी और आपातकालीन परिस्थितियों में विद्यार्थियों की सुरक्षा से जुड़े जोखिमों को कम करना है। कोचिंग संस्थानों को पर्याप्त भौतिक सुविधाएं, सुरक्षित परिसर और विद्यार्थियों के लिए उपयुक्त वातावरण सुनिश्चित करना होगा।
फीस पर भी होगी निगरानी
नए मसौदे में केवल कक्षाओं के घंटे ही नहीं, बल्कि फीस और रिफंड व्यवस्था को भी नियमन के दायरे में लाने का प्रस्ताव है। कोचिंग संस्थानों को अपनी फीस, पाठ्यक्रम, सुविधाओं और रिफंड नीति से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करने की जरूरत होगी। इससे विद्यार्थियों और अभिभावकों को दाखिले से पहले यह समझने में मदद मिल सकती है कि उन्हें कितनी फीस देनी होगी और किसी कारण से कोर्स छोड़ने की स्थिति में रिफंड की क्या व्यवस्था होगी। मनमानी फीस वसूली और दाखिले के समय अस्पष्ट शर्तों को लेकर लंबे समय से शिकायतें सामने आती रही हैं। प्रस्तावित कानून इस क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ाने की कोशिश करता है।
झूठे दावों और रैंक के वादे पर रोक
कोचिंग संस्थानों द्वारा विज्ञापनों में विद्यार्थियों को आकर्षित करने के लिए रैंक, अंक या सफलता की गारंटी देने वाले दावों पर भी प्रस्तावित कानून में सख्ती की गई है। मसौदा संस्थानों को भ्रामक विज्ञापन और रैंक या अंक की झूठी गारंटी देने से रोकने का प्रस्ताव करता है। संस्थानों को अपने शिक्षकों, पाठ्यक्रम, फीस, सुविधाओं और रिफंड नीति जैसी जानकारी अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध करानी होगी। इसका सीधा असर उन विज्ञापनों पर पड़ सकता है जिनमें किसी परीक्षा में सफलता को लगभग निश्चित बताकर विद्यार्थियों और अभिभावकों को आकर्षित किया जाता है।
शिक्षकों की योग्यता भी तय होगी
प्रस्तावित कानून में कोचिंग संस्थानों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की न्यूनतम योग्यता तय करने की बात है। रिपोर्टों के अनुसार, संस्थानों को स्नातक से कम योग्यता वाले ट्यूटर नियुक्त करने से रोकने का प्रस्ताव है। इसके साथ ही संस्थानों को अपने शिक्षकों की जानकारी सार्वजनिक करने की जरूरत होगी। इससे विद्यार्थियों और अभिभावकों को यह जानने में मदद मिलेगी कि जिस शिक्षक से वे पढ़ रहे हैं, उसकी शैक्षणिक योग्यता और विशेषज्ञता क्या है।
मानसिक स्वास्थ्य और काउंसलिंग पर जोर
प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी के दौरान विद्यार्थियों पर पढ़ाई, परीक्षा और भविष्य को लेकर दबाव बढ़ सकता है। प्रस्तावित कानून में इसी समस्या को देखते हुए काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य सहायता से जुड़े प्रावधान शामिल किए गए हैं। सरकार की प्रस्तावित व्यवस्था में कोचिंग संस्थानों को विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण को लेकर जिम्मेदारी निभानी होगी। यह पहल विशेष रूप से उन छात्रों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है जो लंबे समय तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं।
शिकायत निवारण की व्यवस्था
प्रस्तावित कानून में विद्यार्थियों और अभिभावकों की शिकायतों के समाधान के लिए ग्रिवांस रिड्रेसल मैकेनिज्मयानी शिकायत निवारण व्यवस्था बनाने की बात है। इसका उद्देश्य फीस, सुविधाओं, शिक्षकों, सुरक्षा, विज्ञापन या अन्य सेवाओं से जुड़ी शिकायतों को एक निर्धारित प्रक्रिया के तहत उठाने और उनका समाधान करने की व्यवस्था तैयार करना है।
NEET विवाद के बाद बढ़ी निगाह
महाराष्ट्र में कोचिंग क्षेत्र को नियंत्रित करने की पहल ऐसे समय में सामने आई है जब NEET-UG 2026 पेपर लीक विवाद के बाद राज्य की परीक्षा और कोचिंग व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे। इस विवाद ने परीक्षा प्रणाली, कोचिंग संस्थानों की भूमिका और विद्यार्थियों पर बढ़ते प्रतिस्पर्धी दबाव को लेकर बहस तेज की। हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि प्रस्तावित कानून के प्रत्येक प्रावधान का सीधा संबंध किसी एक घटना से है। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में कोचिंग क्षेत्र को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की मांग जरूर तेज हुई है।
संस्थानों पर भारी जुर्माने का प्रस्ताव
प्रस्तावित व्यवस्था में नियमों के उल्लंघन के लिए दंड का प्रावधान भी रखा गया है। रिपोर्टों के अनुसार गंभीर उल्लंघनों पर ₹50 लाख तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। इसका उद्देश्य केवल नियम बनाना नहीं, बल्कि उनका पालन सुनिश्चित करना है। यदि कानून अंतिम रूप में इसी तरह लागू होता है तो बिना पंजीकरण संचालन, सुरक्षा मानकों का उल्लंघन, भ्रामक विज्ञापन या अन्य गंभीर अनियमितताओं पर कोचिंग संस्थानों को आर्थिक दंड का सामना करना पड़ सकता है।
कोचिंग सेंटरों के सामने नई चुनौती
यदि प्रस्तावित कानून लागू होता है तो निजी कोचिंग संस्थानों को अपनी मौजूदा कार्यप्रणाली में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं। संस्थानों को पंजीकरण, शिक्षक योग्यता, फीस पारदर्शिता, वेबसाइट पर जानकारी, सुरक्षा व्यवस्था, विद्यार्थियों की उम्र और कक्षाओं की अवधि जैसे कई मानकों का पालन करना होगा। विशेष रूप से बड़े प्रतियोगी परीक्षा केंद्रों के लिए पांच घंटे की सीमा और 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के दाखिले पर रोक संचालन मॉडल में बदलाव ला सकती है।
अभिभावकों और छात्रों के लिए क्या बदलेगा?
प्रस्तावित व्यवस्था लागू होने के बाद अभिभावकों को कोचिंग सेंटर चुनते समय कुछ अतिरिक्त जानकारी आसानी से उपलब्ध हो सकती है। संस्थानों को फीस, पाठ्यक्रम, शिक्षकों और सुविधाओं की जानकारी सार्वजनिक करनी होगी। विद्यार्थियों के लिए सबसे बड़ा बदलाव पढ़ाई के समय और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े प्रावधानों का हो सकता है। यदि पांच घंटे की दैनिक सीमा लागू होती है तो कोचिंग और स्व-अध्ययन के बीच समय का बेहतर संतुलन बनाने की जरूरत पड़ेगी।
सरकार ने मांगी जनता की राय
सरकार ने मसौदे को अंतिम रूप देने से पहले जनता से सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक 4 सितंबर 2026 शाम 6 बजे तक प्राप्त सुझावों पर विचार किया जाएगा। इसके बाद सरकार प्रस्तावित कानून में संशोधन कर सकती है और आगे की विधायी प्रक्रिया शुरू हो सकती है। यानी अभी इस मसौदे को अंतिम कानून मानना सही नहीं होगा। सुझावों और आपत्तियों के आधार पर प्रावधानों में बदलाव संभव है।
एक नजर में प्रस्तावित नियम
प्रस्तावित कानून: Maharashtra Private Coaching Centers (Registration and Regulation) Act, 2026
मुख्य विभाग: स्कूल शिक्षा एवं खेल विभाग
दैनिक कक्षा सीमा: अधिकतम 5 घंटे प्रस्तावित
उम्र सीमा: 13 वर्ष से कम बच्चों के दाखिले पर रोक प्रस्तावित
पंजीकरण: अनिवार्य करने का प्रस्ताव
मौजूदा केंद्र: कानून लागू होने के बाद छह महीने में पंजीकरण का प्रस्ताव
पंजीकरण वैधता: तीन वर्ष प्रस्तावित
डमी स्कूल: प्रतिबंध का प्रस्ताव
बेसमेंट कोचिंग: रोक का प्रस्ताव
भ्रामक विज्ञापन: प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव
फीस: पारदर्शिता और रिफंड नियम प्रस्तावित
काउंसलिंग: मानसिक स्वास्थ्य और छात्र कल्याण पर जोर
शिक्षक: न्यूनतम योग्यता संबंधी नियम प्रस्तावित
शिकायत: औपचारिक शिकायत निवारण व्यवस्था
अधिकतम प्रस्तावित जुर्माना: गंभीर उल्लंघनों पर ₹50 लाख तक
सुझाव की अंतिम समय सीमा: 4 सितंबर 2026, शाम 6 बजे तक
प्राइवेट कोचिंग सेंटर्स को नियामित करने का प्रयास
महाराष्ट्र सरकार का यह मसौदा निजी कोचिंग क्षेत्र को पहली बार एक व्यापक नियामकीय ढांचे में लाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। पांच घंटे की दैनिक सीमा, 13 साल से कम उम्र के बच्चों पर रोक, डमी स्कूलों पर कार्रवाई, फीस में पारदर्शिता, शिक्षक योग्यता, सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य जैसे प्रावधानों से सरकार कोचिंग व्यवस्था को केवल परीक्षा-केंद्रित कारोबार के बजाय विद्यार्थी-केंद्रित बनाने का प्रयास कर रही है। हालांकि, फिलहाल यह मसौदा कानून है और अंतिम अधिनियम नहीं। अब 4 सितंबर तक मिलने वाले सुझाव महत्वपूर्ण होंगे। इसके बाद सरकार यह तय करेगी कि किन प्रावधानों को यथावत रखा जाए, किनमें बदलाव किया जाए और कानून को किस रूप में आगे बढ़ाया जाए।
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