बनारस, इलाहाबाद या प्रयागराज: नाम बदलने में कितना आता है खर्च?

The CSR Journal Magazine
केरल से उत्तर प्रदेश तक, भारत में शहरों और राज्यों के नाम बदलने की बहस लगातार गरमाई हुई है। ये मुद्दा सिर्फ सरकार की घोषणा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें संविधान, संसद तथा कई सरकारी विभागों की मंजूरी भी शामिल होती है। क्या आपको पता है कि किसी शहर या राज्य का नाम बदलना सिर्फ साइन बोर्ड बदलने जितना आसान नहीं है? हाल ही में केरल का नाम “केरलम” करने की कोशिश और दिल्ली में “सेवा तीर्थ” नामकरण के प्रस्ताव ने इस बात को और महत्वपूर्ण बना दिया है।

उत्तर प्रदेश में नाम का सफर

योगी आदित्यनाथ सरकार के समय में उत्तर प्रदेश में कई जगहों के नाम बदले गए हैं। इनमें इलाहाबाद को प्रयागराज, फैजाबाद को अयोध्या और मुगलसराय रेलवे स्टेशन को पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर के नाम से जाना जाने लगा है। सरकार का ये कहना है कि इससे ऐतिहासिक पहचान को मजबूती मिलेगी, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक स्वार्थ का हिस्सा मानता है। नए नामों के साथ-साथ सरकारी रिकॉर्ड और नक्शों में भी बदलाव करना जरूरी होता है।

अन्य राज्यों में नाम बदलने की प्रक्रिया

नाम बदलने के मामले में उत्तर प्रदेश ही अकेला नहीं है। पश्चिम बंगाल में कलकत्ता को कोलकाता, महाराष्ट्र में बंबई को मुंबई और मद्रास को चेन्नई का नाम दिया गया है। हाल में, अक्टूबर 2024 में महाराष्ट्र में औरंगाबाद का नाम छत्रपति संभाजीनगर रखने का निर्णय लिया गया। दिल्ली में रेस कोर्स रोड को लोक कल्याण मार्ग और राजपथ को कर्तव्य पथ नाम दिया गया है। यह शृंखला अब आगे बढ़ती हुई दिखाई दे रही है।

केरल का नया नाम: केरलम

इस साल फरवरी में केंद्र सरकार ने केरल का नाम बदलकर “केरलम” करने का प्रस्ताव पारित किया। पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन का कहना है कि मलयालम में राज्य को हमेशा “केरलम” कहा गया। यह नाम परिवर्तन मलयालम भाषियों के एकीकृत राज्य के आंदोलन से जुड़ा हुआ है। यह सब तब शुरू हुआ जब प्रधानमंत्री मोदी ने “सेवा तीर्थ” के उद्घाटन के अवसर पर इस प्रस्ताव को मंजूरी दी।

कोर्ट में चल रही कानूनी बहस

दिल्ली हाई कोर्ट में सुप्रीम कोर्ट मेट्रो स्टेशन के हिंदी नाम को बदलने की मांग की गई। याचिकाकर्ता का कहना था कि इसे “सर्वोच्च न्यायालय” लिखा जाना चाहिए, जैसा कि अन्य सरकारी रिकॉर्ड्स में किया गया है। याचिका के अनुसार, एक स्टेशन का नाम बदलने पर 40 से 45 लाख रुपये खर्च आते हैं।

नाम बदलने की प्रक्रिया

भारत में किसी राज्य का नाम बदलने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 3 और 4 के अधीन होती है। सबसे पहले राष्ट्रपति संबंधित राज्य की विधानसभा से राय मांगते हैं, फिर संसद में विधेयक पेश किया जाता है। इसके बाद, दोनों सदनों से साधारण बहुमत से विधेयक पारित होने के बाद नया नाम कानूनी रूप से मान्यता पा लेता है।

कैसे आता है खर्च?

किसी शहर या राज्य का नाम बदलना केवल साइन बोर्ड बदलने तक सीमित नहीं है। इसके साथ कई सरकारी रिकॉर्ड, मानचित्र, भूमि अभिलेख, रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट के नाम भी बदलते हैं। इस प्रक्रिया में लगभग 200 करोड़ से 500 करोड़ रुपये खर्च आ सकता है। अगर शहर बड़ा हो, तो यह खर्च बढ़कर 1,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।

नाम बदलने के पीछे क्या है

Long or Short, get news the way you like. No ads. No redirections. Download Newspin and Stay Alert, The CSR Journal Mobile app, for fast, crisp, clean updates!

App Store –  https://apps.apple.com/in/app/newspin/id6746449540 

Google Play Store – https://play.google.com/store/apps/details?id=com.inventifweb.newspin&pcampaignid=web_share

Latest News

Popular Videos