Dilip Mandal ने छेड़ा जाति और Ambedkar का मुद्दा

The CSR Journal Magazine
नई दिल्ली: लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के मनुस्मृति को लेकर दिए गए बयान पर दिलीप मंडल ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि यह बात ब्राह्मण्यवादी पितृसत्ता पर आधारित नहीं है। मंडल का मानना है कि ‘ठाकुर का कुआं’ और मनुस्मृति का आज की महिलाओं की स्थिति से कोई संबंध नहीं है। दिलीप मंडल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी बात रखते हुए स्पष्ट किया कि ये मुद्दे ओबीसी और दलितों से नहीं जुड़े हैं।

ठाकुर का कुआं और सामाजिक विभाजन

दिलीप मंडल ने कहा कि ‘ठाकुर का कुआं’ की कहानी 1932 में मुंशी प्रेमचंद ने लिखी थी। उन्होंने यह भी बताया कि ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का विचार 1990 के दशक में प्रो. उमा चक्रवर्ती द्वारा पेश किया गया था। मंडल ने राहुल गांधी के बयान को लेकर आरोप लगाया कि उनकी बातें ओबीसी या दलित समुदायों के मुद्दों से दूर हैं और इसे प्रगतिशीलता के दायरे में समझने की जरूरत है।

बाबा साहब की आत्मकथा में बर्बरता का जिक्र

दिलीप मंडल ने बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की प्रमुख पुस्तक ‘वीजा की प्रतीक्षा में’ का हवाला देते हुए एक विवादास्पद घटना का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि 1934 में दौलताबाद के मुस्लिम समुदाय ने पानी के संबंध में बाबा साहब के साथ बुरा बर्ताव किया था। मंडल का कहना है कि इस घटना में आंबेडकर को जातिसूचक गालियां दी गईं और उनसे मारपीट की गई।

जाति के मुद्दे पर उठाए गए सवाल

दिलीप मंडल ने यह भी सवाल उठाया कि अगर ‘ठाकुर का कुआं’ जैसे संदर्भों के माध्यम से किसी जाति को निशाना बनाया जाता है, तो पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह और अर्जुन सिंह जैसे नेताओं को किस नजर से देखना चाहिए। मंडल का कहना है कि वीपी सिंह ने आंबेडकर को भारत रत्न दिलाने की कोशिश की थी, जो कांग्रेस की मंशा के खिलाफ था।

जातियों के योगदान को समझने की जरूरत

मंडल ने अंत में कहा कि किसी एक जाति को निशाना बनाना आसान जरूर है, लेकिन यह जरूरी है कि हम सभी जातियों और उनके योगदान को समग्र दृष्टिकोण में समझें। वे यह मानते हैं कि ऐसा करना हर समुदाय के लिए सही नहीं है। मंडल की यह बातें इस मुद्दे पर एक नई बहस को जन्म दे सकती हैं, जोकि समाज में समरसता की जरूरत को और स्पष्ट करती हैं।

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