चित्तौड़गढ़ के शंभूपुरा क्षेत्र में आदित्य सीमेंट प्लांट के बाहर न पानी, न शौचालय, न छाया
Aditya Birla Ultratech Cement Plant Chittorgarh: राजस्थान के औद्योगिक जिले चित्तौड़गढ़ में स्थित आदित्य बिरला का अल्ट्राटेक सीमेंट प्लांट (Aditya Birla Ultratech Cement Plant) एक बार फिर चर्चा में है लेकिन इस बार वजह उत्पादन नहीं, बल्कि बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है। शंभूपुरा क्षेत्र में स्थित इस बड़े औद्योगिक केंद्र के बाहर आज भी न पीने का पानी है, न सार्वजनिक शौचालय और न ही छाया या बैठने की कोई व्यवस्था।
Aditya Birla Ultratech Cement Plant Chittorgarh: महिलाएं और राहगीर सबसे ज्यादा परेशान
स्थानीय लोगों का कहना है कि फैक्ट्री के गेट के पास रोजाना सैकड़ों मजदूर, सप्लायर और अधिकारी आते-जाते हैं, लेकिन Public Toilets, Drinking Water Facility और Rest Shed जैसी न्यूनतम सुविधाएं तक नहीं हैं। सबसे अधिक परेशानी महिलाओं को झेलनी पड़ती है, जिन्हें दूर-दूर तक कोई शौचालय नहीं मिलता। कर्मचारी बताते हैं कि गर्मी के मौसम में घंटों धूप में खड़ा रहना पड़ता है, क्योंकि फैक्ट्री के बाहर इंतज़ार के लिए कोई शेड नहीं है। वहीं, कुछ लोग पानी की कमी के चलते नजदीकी दुकानों या खेतों से पानी लेने को मजबूर हैं।
Aditya Birla Ultratech Cement CSR फंड पर उठे सवाल
स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि आदित्य सीमेंट लिमिटेड (Aditya Cement Ltd.) हर साल करोड़ों रुपये के Corporate Social Responsibility (CSR) फंड खर्च करने का दावा करती है, लेकिन उसका कोई असर आसपास के क्षेत्र में नहीं दिखता। गांव के एक वरिष्ठ नागरिक ने बताया कि प्लांट के नाम पर यहां करोड़ों की कमाई होती है, लेकिन गांव की हालत जस की तस है। CSR का पैसा कहां जाता है, किसी को नहीं पता। कई ग्रामीणों का कहना है कि कंपनी और प्रशासन को इस क्षेत्र के बुनियादी ढांचे पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि इससे स्थानीय लोगों का जीवन सीधे प्रभावित होता है।
ग्रामीणों ने की तत्काल कार्रवाई की मांग
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और कंपनी प्रबंधन से मांग की है कि शौचालय (Toilets), पेयजल (Drinking Water) और छाया व्यवस्था (Shade Facilities) की तत्काल व्यवस्था की जाए। महिला समूहों ने भी चेतावनी दी है कि अगर जल्द सुधार नहीं हुआ तो वे फैक्ट्री के गेट पर धरना देने को मजबूर होंगी।
कंपनी की CSR नीति पर पारदर्शिता की जरूरत
जानकारों का मानना है कि उद्योगों को अपने CSR बजट का उपयोग केवल दस्तावेजों तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि जमीन पर इसका असर दिखना चाहिए। चित्तौड़गढ़ जैसे औद्योगिक जिलों में यह जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है, क्योंकि यहां हजारों लोग रोज़ाना इन कंपनियों पर निर्भर हैं। स्थानीय एनजीओ के एक सदस्य समीर चौहान ने कहा कि CSR का मतलब सिर्फ रिपोर्ट बनाना नहीं है। यह कंपनियों की सामाजिक जिम्मेदारी है। अगर सीमेंट प्लांट के आसपास रहने वाले लोग ही परेशान हैं, तो यह नीति विफल है।
प्रशासन की भूमिका पर भी उठे सवाल
लोगों का कहना है कि स्थानीय प्रशासन को इस मामले में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। कई बार शिकायत करने के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। फिलहाल जिला प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। चित्तौड़गढ़ का यह मामला इस बात की याद दिलाता है कि Industrial Development केवल उत्पादन तक सीमित नहीं होना चाहिए। जब तक उद्योग अपने आस-पास के समुदायों के जीवन स्तर को नहीं सुधारेंगे, तब तक विकास अधूरा रहेगा। अगर आदित्य सीमेंट प्लांट सच में ‘Responsible Corporate Citizen’ बनना चाहता है, तो उसे अपने CSR फंड को कागजों से निकालकर जमीन पर उतारना होगा।
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