संयुक्त राष्ट्र में भारत का सख्त रुख, सांसद प्रिया सरोज ने उठाया जवाबदेही का मुद्दा

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संयुक्त राष्ट्र में भारत का कड़ा संदेश, UN अधिकारियों के अपराधों पर जीरो टॉलरेंस; सांसद प्रिया सरोज ने उठाई जवाबदेही की मांग

संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में भारत ने संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों और विभिन्न अभियानों में तैनात विशेषज्ञों की आपराधिक जवाबदेही का मुद्दा प्रमुखता से उठाया है। भारत की ओर से राष्ट्रीय वक्तव्य देते हुए सांसद प्रिया सरोज ने स्पष्ट किया कि संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारियों की ओर से किए जाने वाले आपराधिक कृत्यों और कदाचार के मामलों में किसी भी तरह की ढिलाई स्वीकार नहीं की जा सकती। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता केवल उसके उद्देश्यों और घोषणाओं से नहीं, बल्कि उसके अधिकारियों के आचरण, पारदर्शिता और जवाबदेही से भी तय होती है।

अपराधों पर निष्पक्ष त्वरित कार्यवाई

संयुक्त राष्ट्र महासभा की छठी समिति में एजेंडा मद 75 के अंतर्गत हुई चर्चा में भारत ने आपराधिक आरोपों की समयबद्ध जांच, दोष सिद्ध होने पर कानूनी कार्रवाई, सदस्य देशों और संयुक्त राष्ट्र के बीच बेहतर समन्वय तथा पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा की आवश्यकता रेखांकित की। यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय संस्था की कार्यप्रणाली में जवाबदेही मजबूत करने और कानून के शासन के प्रति उसकी प्रतिबद्धता सुनिश्चित करने से जुड़ा है। भारत का संदेश केवल कड़ा रुख अपनाने तक सीमित नहीं रहा। सांसद प्रिया सरोज ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक आरोप सामने आने पर निष्पक्ष जांच, उचित कानूनी प्रक्रिया और संबंधित सभी पक्षों के अधिकारों का सम्मान जरूरी है। भारत की मांग है कि आरोपों को लंबित रखने के बजाय उन पर प्रभावी कार्रवाई हो और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए संयुक्त राष्ट्र तथा संबंधित देश अपनी-अपनी जिम्मेदारियां निभाएं।

93 मामलों को संबंधित देशों के पास जांच के लिए भेजा गया

इस चर्चा का एक महत्वपूर्ण पहलू संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों और अभियानों में तैनात विशेषज्ञों के विरुद्ध आपराधिक आरोपों की जांच से जुड़ा है। सांसद प्रिया सरोज ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव की रिपोर्टों का उल्लेख करते हुए बताया कि 1 जुलाई 2025 से 30 जून 2026 के बीच संयुक्त राष्ट्र के विधिक मामलों के कार्यालय ने 93 अधिकारियों और मिशन विशेषज्ञों से जुड़े 93 मामलों को जांच और संभावित अभियोजन के लिए उनके राष्ट्रीयता वाले देशों के पास भेजा। इन आंकड़ों का महत्व इसलिए है क्योंकि किसी मामले को संबंधित देश के पास भेजना अपने आप में अपराध सिद्ध होना नहीं है। यह जांच और संभावित कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया का हिस्सा है। आरोपों की प्रकृति, उपलब्ध साक्ष्य और संबंधित देश के कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई तय की जाती है। इसलिए जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए यह जरूरी है कि मामलों को केवल एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक भेजने की औपचारिकता तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उनकी प्रगति की निगरानी भी हो।
भारत ने इसी संदर्भ में कहा कि संयुक्त राष्ट्र और सदस्य देशों के बीच प्रभावी सहयोग के बिना जवाबदेही की व्यवस्था अपने उद्देश्य को पूरी तरह हासिल नहीं कर सकती। संयुक्त राष्ट्र को आरोपों से संबंधित आवश्यक जानकारी समय पर साझा करनी चाहिए, जबकि संबंधित देशों को अपने अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत जांच करनी चाहिए और पर्याप्त आधार मिलने पर अभियोजन की कार्रवाई आगे बढ़ानी चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र की छठी समिति में क्यों उठा यह मुद्दा?

संयुक्त राष्ट्र महासभा की छठी समिति को सामान्यतः कानूनी मामलों से संबंधित समिति के रूप में जाना जाता है। इसमें अंतरराष्ट्रीय कानून, कानूनी सहयोग, संधियों और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रश्नों पर चर्चा होती है। संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों और मिशन पर तैनात विशेषज्ञों की आपराधिक जवाबदेही भी इसी दायरे में आती है। इस विषय को महासभा की 81वीं बैठक में एजेंडा मद 75 के अंतर्गत शामिल किया गया है। संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक अभिलेखों के अनुसार, इस विषय पर चर्चा का उद्देश्य उन कानूनी और प्रक्रियागत चुनौतियों की समीक्षा करना है, जिनका सामना सदस्य देशों और संयुक्त राष्ट्र को अपने अधिकारियों के विरुद्ध आपराधिक आरोपों से निपटने में करना पड़ता है।

मजबूत हो जवाबदेही की व्ययबस्था

संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी और विशेषज्ञ अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाते हैं। इनमें प्रशासनिक कार्यों से जुड़े कर्मचारी, विभिन्न अभियानों में नियुक्त अधिकारी और विशेष विशेषज्ञ शामिल हो सकते हैं। शांति अभियानों सहित संयुक्त राष्ट्र के कार्यक्षेत्र में तैनात कर्मियों से अंतरराष्ट्रीय मानकों, संगठन के नियमों और लागू कानूनों का पालन करने की अपेक्षा की जाती है। ऐसे में यदि किसी अधिकारी पर गंभीर अपराध का आरोप लगता है, तो यह सवाल उठता है कि उसकी जांच कौन करेगा, संबंधित देश के पास अभियोजन का अधिकार है या नहीं, संयुक्त राष्ट्र किस प्रकार सहयोग करेगा और पीड़ित को न्याय कैसे मिलेगा। इसी तरह के सवालों के समाधान के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जवाबदेही की व्यवस्था को मजबूत करने पर चर्चा की जा रही है।

भारत ने जवाबदेही के साथ निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया पर भी दिया जोर

सांसद प्रिया सरोज के वक्तव्य का एक अहम हिस्सा यह था कि जवाबदेही सुनिश्चित करने के साथ निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया का पालन भी अनिवार्य है। किसी भी आरोप की जांच तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए। आरोपित व्यक्ति को भी कानून के तहत अपने पक्ष में उचित प्रक्रिया का अधिकार मिलना चाहिए। भारत का यह दृष्टिकोण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में काम करने वाले लोगों के विरुद्ध कार्रवाई करते समय केवल संगठनात्मक अनुशासन पर्याप्त नहीं होता। जहां मामला आपराधिक प्रकृति का हो, वहां संबंधित कानूनों के अनुसार जांच, साक्ष्य का परीक्षण और आवश्यक होने पर न्यायिक प्रक्रिया पूरी करना जरूरी है।
भारत ने सदस्य देशों से आग्रह किया कि वे अपने नागरिकों द्वारा विदेश में किए गए गंभीर अपराधों के संबंध में अपने राष्ट्रीय कानूनों के तहत उपलब्ध अधिकार क्षेत्र को मजबूत करने की संभावनाओं पर विचार करें। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति को केवल इसलिए कानूनी जवाबदेही से बचने का अवसर न मिले क्योंकि कथित अपराध उसके अपने देश से बाहर हुआ है। हालांकि, ऐसे मामलों में कानूनी अधिकार क्षेत्र का निर्धारण संबंधित देश के कानून, अपराध की प्रकृति और लागू अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं के अनुरूप ही किया जाता है।

भारतीय न्याय संहिता और प्रत्यर्पण कानून का उल्लेख

भारत ने अपने वक्तव्य में देश की कानूनी व्यवस्था का भी उल्लेख किया। सांसद प्रिया सरोज ने बताया कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 में ऐसे कुछ अपराधों के संबंध में प्रावधान हैं, जिन्हें भारतीय नागरिक भारत के बाहर अंजाम देते हैं। इसके अतिरिक्त, प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962 के तहत लागू परिस्थितियों में प्रत्यर्पण की कानूनी व्यवस्था उपलब्ध है। भारतीय न्याय संहिता के तहत विदेश में किए गए कुछ अपराधों के लिए भारतीय नागरिकों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की संभावना मौजूद है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि विदेश में किया गया प्रत्येक कथित अपराध स्वतः भारत में अभियोजन के दायरे में आ जाता है। इसके लिए संबंधित कानूनी प्रावधानों और मामले की परिस्थितियों को देखना आवश्यक होता है।
इसी प्रकार, प्रत्यर्पण की प्रक्रिया भी निर्धारित कानूनी शर्तों और लागू व्यवस्थाओं के अधीन होती है। जब किसी आरोपी को दूसरे देश में न्यायिक कार्रवाई का सामना करना हो, तो संबंधित देशों के बीच कानूनी सहयोग महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत ने इन व्यवस्थाओं का उल्लेख करके यह रेखांकित किया कि आपराधिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय कानून और अंतरराष्ट्रीय सहयोग एक-दूसरे के पूरक होने चाहिए।

पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा को बताया जरूरी

इस पूरे विषय का सबसे संवेदनशील पक्ष उन लोगों की सुरक्षा और न्याय से जुड़ा है, जो कथित आपराधिक कृत्यों से प्रभावित होते हैं। सांसद प्रिया सरोज ने पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा को जवाबदेही की प्रभावी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। कई मामलों में शिकायतकर्ता या गवाह जांच के दौरान दबाव, डर अथवा अन्य कठिनाइयों का सामना कर सकते हैं। ऐसे में शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया, पहचान की सुरक्षा, जांच के दौरान उचित व्यवहार और आवश्यक सहायता की उपलब्धता महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत ने इस बात पर भी जोर दिया कि अपराधों की रोकथाम के लिए प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारियों और विशेषज्ञों को उनके दायित्वों, आचरण संबंधी नियमों और उल्लंघन के परिणामों के बारे में स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए। भारत ने यौन शोषण और दुर्व्यवहार के पीड़ितों की सहायता के लिए संयुक्त राष्ट्र महासचिव के न्यास को निरंतर योगदान देने की आवश्यकता भी रेखांकित की। इस पहल का उद्देश्य प्रभावित लोगों की सहायता और उनके पुनर्वास से संबंधित प्रयासों को समर्थन देना है।

संयुक्त राष्ट्र की साख से जुड़ा है जवाबदेही का सवाल

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना का मूल उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा, सहयोग और मानवाधिकारों को बढ़ावा देना है। ऐसे संगठन के कर्मचारियों से उच्च स्तर की नैतिकता और जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है। यदि उसके किसी अधिकारी पर गंभीर अपराध का आरोप लगता है और मामले में प्रभावी कार्रवाई नहीं होती, तो इससे संस्था की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं। यह चुनौती इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी और विशेषज्ञ कई बार ऐसे क्षेत्रों में काम करते हैं, जहां स्थानीय संस्थाएं कमजोर होती हैं या लोग संघर्ष और असुरक्षा से प्रभावित होते हैं। ऐसे स्थानों पर तैनात कर्मियों के आचरण का प्रभाव केवल संगठन की छवि तक सीमित नहीं रहता, बल्कि स्थानीय समुदायों के भरोसे को भी प्रभावित कर सकता है। भारत ने इसी संदर्भ में पारदर्शिता, प्रभावी जांच और दोष सिद्ध होने पर उचित कार्रवाई को महत्वपूर्ण बताया। साथ ही, यह रेखांकित किया कि जवाबदेही की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिसमें न तो आरोपों को अनदेखा किया जाए और न ही निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया से समझौता हो।

जांच और कार्यवाई के बीच बेहतर समन्वय की चुनौती

संयुक्त राष्ट्र महासभा की छठी समिति में इस विषय पर विचार-विमर्श के दौरान सदस्य देशों के सामने प्रमुख चुनौती ऐसी व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना है, जिसके तहत आपराधिक आरोपों की रिपोर्टिंग, जांच, संबंधित देशों को मामले भेजने और उसके बाद की कार्रवाई के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो सके। संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक अभिलेखों में इस विषय से संबंधित महासचिव की रिपोर्टें A/81/207 और A/81/284 दर्ज हैं। महासभा के पिछले सत्र में प्रस्ताव 80/160 के माध्यम से इस विषय पर काम जारी रखने और संबंधित कानूनी पहलुओं की समीक्षा करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया था।
आगे की प्रक्रिया में सदस्य देशों के विचार, उनके राष्ट्रीय कानूनों का दायरा, संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा नीतियां और जांच के बाद की कार्रवाई महत्वपूर्ण होंगी। हालांकि, किसी नई कानूनी व्यवस्था या प्रस्ताव के अंतिम परिणाम के बारे में अभी निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। भारत ने स्पष्ट किया है कि वह सदस्य देशों और संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर जवाबदेही, सहयोग और प्रभावी क्रियान्वयन को मजबूत करने के लिए रचनात्मक भूमिका निभाने को तैयार है।

अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में भी हो कानून का पालन

सांसद प्रिया सरोज का वक्तव्य इसी व्यापक संदेश को सामने रखता है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए उनके भीतर भी कानून का पालन सुनिश्चित होना चाहिए। भारत की जीरो टॉलरेंस नीति का आशय है कि संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारियों और मिशन विशेषज्ञों से जुड़े आपराधिक आचरण के मामलों को गंभीरता से लिया जाए, उनकी निष्पक्ष जांच हो और जहां अपराध सिद्ध हो, वहां कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। साथ ही पीड़ितों के अधिकारों और सुरक्षा को भी समान महत्व दिया जाए।

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