IT, मीडिया, सेल्स, बैंकिंग और हेल्थकेयर सेक्टर में बढ़ता तनाव और अनियमित जीवनशैली युवाओं को बना रही है गंभीर बीमारियों का शिकार
आज के आधुनिक और प्रतिस्पर्धी दौर में करियर की ऊंचाइयों को छूने की चाह ने इंसान की जीवनशैली को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। कॉर्पोरेट जगत की चकाचौंध और भारी-भरकम पैकेज के पीछे छिपा एक कड़वा सच अब खुलकर सामने आने लगा है। हाल के दिनों में सामने आए कई चिकित्सा और सामाजिक अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि देश के पांच सबसे प्रमुख सेक्टर—इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IT), मीडिया, सेल्स, बैंकिंग और हेल्थकेयर—अब सिर्फ रोजगार के साधन नहीं रह गए हैं, बल्कि काम के अत्यधिक दबाव और अनियमित जीवनशैली के कारण ये कर्मचारियों की सेहत के लिए सबसे बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं।
IT और सॉफ्टवेयर सेक्टर: ‘सिटिंग डिजीज’ और बर्नआउट का गढ़
आईटी और सॉफ्टवेयर उद्योग को देश के आर्थिक विकास का इंजन माना जाता है, लेकिन इस सेक्टर में काम करने वाले कर्मचारियों की सेहत की स्थिति चिंताजनक है।
मुख्य कारण: लगातार 10 से 12 घंटे तक स्क्रीन के सामने बैठे रहना, ‘डेडलाइंस’ का लगातार दबाव, और अमेरिकी या यूरोपीय देशों के समय (शिफ्ट्स) के अनुसार रात में काम करना।
स्वास्थ्य पर प्रभाव: इस सेक्टर के कर्मचारियों में मोटापा (Obesity), प्रकार-2 मधुमेह (Diabetes), और स्लिप डिस्क या रीढ़ की हड्डी से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। लगातार कंप्यूटर के इस्तेमाल से ‘कंप्यूटर विजन सिंड्रोम’ (आंकड़ों का सूखापन और धुंधलापन) और ‘कार्पल टनल सिंड्रोम’ (कलाई की नसों में दर्द) आम हो चुके हैं।
मानसिक स्थिति: ‘वर्क फ्रॉम होम’ के खत्म होने और दोबारा ‘वर्क फ्रॉम ऑफिस’ या हाइब्रिड मॉडल लागू होने से कर्मचारियों में वर्क-लाइफ बैलेंस पूरी तरह बिगड़ चुका है, जिससे ‘क्रोनिक बर्नआउट’ (पूरी तरह से ऊर्जा खत्म हो जाना) की स्थिति पैदा हो रही है।
मीडिया और पत्रकारिता: 24×7 की दौड़ और अनिश्चितता
सूचना तकनीक के विस्तार ने मीडिया जगत को चौबीसों घंटे सक्रिय रहने वाला उद्योग बना दिया है। चाहे प्रिंट हो, इलेक्ट्रॉनिक हो या डिजिटल मीडिया, यहां काम करने वाले पत्रकार और कर्मचारी लगातार एक अदृश्य दबाव में रहते हैं।
मुख्य कारण: ‘ब्रेकिंग न्यूज’ की होड़, लगातार बदलती घटनाएं, फील्ड पर काम करने की अनिश्चितता और नाइट शिफ्ट्स। सोशल मीडिया के इस दौर में हर सेकंड न्यूज अपडेट करने का दबाव कर्मचारियों को कभी भी ‘लॉग ऑफ’ नहीं होने देता।
स्वास्थ्य पर प्रभाव: अनियमित खान-पान के कारण मीडियाकर्मियों में गंभीर गैस्ट्रिक समस्याएं, पेट के अल्सर, और उच्च रक्तचाप (Hypertension) बहुत आम हैं। नींद की पुरानी बीमारी (Insomnia) इस सेक्टर के 60% से अधिक कर्मचारियों को प्रभावित करती है।
मानसिक स्थिति: लगातार नकारात्मक, हिंसक या तनावपूर्ण खबरों के बीच रहने से पत्रकारों में ‘सेकेंडरी ट्रॉमा’ और अवसाद (Depression) के लक्षण देखे जा रहे हैं।
सेल्स और मार्केटिंग: ‘टारगेट’ का अंतहीन दबाव
सेल्स और मार्केटिंग की नौकरियां हमेशा से ही परिणाम-उन्मुख (Result-oriented) रही हैं, लेकिन मौजूदा बाजार की गलाकाट प्रतिस्पर्धा ने इस दबाव को कई गुना बढ़ा दिया है।
मुख्य कारण: दैनिक, साप्ताहिक और मासिक ‘टारगेट्स’ को पूरा करने की तलवार। फील्ड सेल्स के कर्मचारियों के लिए लगातार यात्रा करना, मौसम की मार झेलना और हर समय ग्राहकों के लिए उपलब्ध रहना अनिवार्य होता है।
स्वास्थ्य पर प्रभाव: अत्यधिक यात्रा और बाहर के अस्वस्थ भोजन के कारण लिवर की बीमारियां, कोलेस्ट्रॉल का बढ़ना और हृदय रोग (Heart Attacks) इस क्षेत्र में बहुत कम उम्र के युवाओं को अपना शिकार बना रहे हैं।
मानसिक स्थिति: टारगेट पूरा न होने पर नौकरी जाने का डर (Job Insecurity) और इंसेंटिव खोने की चिंता के कारण इस सेक्टर के लोग सबसे ज्यादा एंग्जायटी (घबराहट) और पैनिक अटैक का सामना करते हैं।
बैंकिंग और वित्तीय सेवाएं: वर्कलोड और जवाबदेही का बोझ
अक्सर एक सुरक्षित और प्रतिष्ठित नौकरी माने जाने वाले बैंकिंग सेक्टर की हकीकत अब बदल चुकी है। राष्ट्रीयकृत बैंकों से लेकर निजी बैंकों तक, हर जगह कर्मचारी भारी मानसिक दबाव में हैं।
मुख्य कारण: वित्तीय लेन-देन में जीरो-एरर (गलती की कोई गुंजाइश न होना) की जवाबदेही, ग्राहकों की बढ़ती शिकायतें, और लोन रिकवरी व अन्य वित्तीय उत्पादों को बेचने का अतिरिक्त दबाव।
स्वास्थ्य पर प्रभाव: लगातार कई घंटों तक एक ही मुद्रा में बैठकर ऑडिटिंग और कैश काउंटिंग करने से गर्दन और पीठ का पुराना दर्द (Chronic Back Pain) और समय से पहले जोड़ों की समस्याएं होने लगती हैं। साथ ही, वित्तीय तनाव सीधे तौर पर कार्डियोवैस्कुलर (हृदय) प्रणाली को नुकसान पहुंचाता है।
मानसिक स्थिति: काम के अत्यधिक घंटों के कारण परिवार को समय न दे पाना और काम के दौरान लगातार अत्यधिक सतर्कता बरतने की मजबूरी दिमाग को शांत नहीं होने देती, जिससे चिड़चिड़ापन और गंभीर डिप्रेशन की स्थिति बन जाती है।
हेल्थकेयर और चिकित्सा क्षेत्र: दूसरों को जीवन देने वालों का अपना जीवन संकट में
यह सबसे बड़ा विरोधाभास है कि जो क्षेत्र दूसरों को स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करता है, वहां काम करने वाले डॉक्टर, नर्स और पैरामेडिकल स्टाफ खुद सबसे ज्यादा अस्वस्थ जीवन जीने को मजबूर हैं।
मुख्य कारण: डॉक्टरों और मरीजों के अनुपात में भारी अंतर, 24 से 36 घंटे की लगातार ऑन-ड्यूटी शिफ्ट्स, आपातकालीन स्थितियां, और कभी-कभी मरीजों के तीमारदारों द्वारा की जाने वाली हिंसा का डर।
स्वास्थ्य पर प्रभाव: डॉक्टरों और नर्सों में क्रोनिक फटीग सिंड्रोम (लगातार थकावट रहना), कम्यूनिकेबल बीमारियां (संक्रमण का खतरा) और हार्मोनल असंतुलन बहुत आम हैं। रात भर जागने के कारण उनकी जैविक घड़ी (Circadian Rhythm) पूरी तरह नष्ट हो जाती है।
मानसिक स्थिति: मरीजों की गंभीर स्थिति और मौतों को लगातार देखने से उत्पन्न होने वाला ‘एम्पैथी फटीग’ (संवेदना की कमी या थकावट) और हर पल जीवन-मरण के फैसले लेने का भारी तनाव उन्हें मानसिक रूप से तोड़ देता है।
क्या हैं इस महामारी के मुख्य लक्षण और कारण?
इन पांचों सेक्टरों की कार्यप्रणाली का विश्लेषण करने पर कुछ सामान्य कारक सामने आते हैं जो कॉर्पोरेट कर्मचारियों को बीमार बना रहे हैं:
1. सिटिंग इज द न्यू स्मोकिंग: लगातार 8-10 घंटे बैठे रहना सिगरेट पीने जितना ही खतरनाक साबित हो रहा है।
2. जंक फूड और कैफीन का अत्यधिक सेवन: नींद भगाने और ऊर्जा पाने के लिए दिन में 4-5 बार चाय, कॉफी या एनर्जी ड्रिंक्स का सेवन और प्रोसेस्ड फूड खाना।
3. डिजिटल डिटॉक्स की कमी: सोने से ठीक पहले तक मोबाइल या लैपटॉप स्क्रीन का इस्तेमाल करना, जिससे ‘मेलाटोनिन’ हार्मोन का बनना कम हो जाता है और गहरी नींद नहीं आती।
विशेषज्ञ क्या सलाह देते हैं? (The Way Forward)
चिकित्सकों और कॉर्पोरेट सलाहकारों के अनुसार, यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो भारत की कामकाजी आबादी का एक बड़ा हिस्सा गंभीर रूप से बीमार हो जाएगा। इसके समाधान के लिए त्रिस्तरीय रणनीति की आवश्यकता है:
कर्मचारियों के स्तर पर: हर 45 मिनट के काम के बाद 2 मिनट का वॉक (स्ट्रैचिंग) करें। ‘7-8 घंटे की गहरी नींद’ से कोई समझौता न करें। सप्ताह में कम से कम 5 दिन 30 मिनट का व्यायाम या योग अनिवार्य करें।
कॉर्पोरेट/कंपनियों के स्तर पर: कंपनियों को ‘वर्कहॉलिक’ संस्कृति को बढ़ावा देने के बजाय मानसिक स्वास्थ्य और वर्क-लाइफ बैलेंस को प्राथमिकता देनी होगी। ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ (काम के घंटों के बाद कॉल या ईमेल का जवाब न देने का अधिकार) जैसी नीतियां भारत में भी लागू की जानी चाहिए।
सरकार के स्तर पर: श्रम कानूनों में संशोधन करके काम के अधिकतम घंटों और कर्मचारियों के स्वास्थ्य बीमा को लेकर कड़े नियम बनाए जाने की आवश्यकता है।
करियर में प्रगति और आर्थिक संपन्नता का तब तक कोई मूल्य नहीं है जब तक कि उसे भोगने के लिए एक स्वस्थ शरीर और शांत मन न हो। यह समय कॉर्पोरेट जगत और कर्मचारियों दोनों के लिए आत्मनिरीक्षण करने और ‘सफलता’ की परिभाषा को बदलने का है।

