जियो-एयरटेल के AI पर TRAI की नजर, ग्राहकों को हुआ नुकसान, तो बढ़ेगी जवाबदेही

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Jio Airtel के AI इस्तेमाल पर कसेगा शिकंजा, TRAI लाया नए नियमों का मसौदा; ग्राहकों को नुकसान हुआ तो कंपनियों की होगी जवाबदेही

दूरसंचार सेवाओं में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। मोबाइल नेटवर्क का संचालन, अनचाही कॉल और संदेशों की पहचान, साइबर धोखाधड़ी रोकने और ग्राहकों को सेवाएं उपलब्ध कराने में इस तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ रही है। लेकिन इसके साथ गलत निर्णय, तकनीकी गड़बड़ी, निजी जानकारी के दुरुपयोग और ग्राहकों को नुकसान पहुंचने का खतरा भी जुड़ा है। इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) ने दूरसंचार नेटवर्क और सेवाओं में AI के जिम्मेदार इस्तेमाल के लिए नए दिशा-निर्देशों का मसौदा जारी किया है। 30 अक्टूबर 2026 को जारी इस मसौदे में दूरसंचार कंपनियों के लिए कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखे गए हैं। इनके तहत रिलायंस जियो, भारती एयरटेल और अन्य संबंधित दूरसंचार सेवा प्रदाताओं को AI के इस्तेमाल के लिए अपने निदेशक मंडल से मंजूर नीति बनानी होगी, एआई प्रणालियों को जोखिम के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटना होगा और गंभीर तकनीकी घटनाओं की जानकारी नियामक को देनी होगी। कंपनियों को एआई से जुड़ी शिकायतों की जांच और समाधान के लिए भी व्यवस्था करनी होगी।

कंपनियों को बनानी होगी निदेशक मंडल से मंजूर AI नीति

TRAI के प्रस्तावों में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि दूरसंचार कंपनियां AI का इस्तेमाल केवल तकनीकी विभाग के भरोसे नहीं छोड़ सकेंगी। प्रत्येक संबंधित कंपनी को अपने निदेशक मंडल या समकक्ष उच्च प्रबंधन से मंजूर आंतरिक एआई नीति तैयार करनी होगी। इसमें यह स्पष्ट करना होगा कि कंपनी किन कार्यों में एआई का इस्तेमाल करती है, उसके संभावित जोखिम क्या हैं और तकनीक से जुड़ी गड़बड़ी होने पर जिम्मेदारी किसकी होगी। प्रस्तावित नीति में AI प्रणालियों के जोखिम का आकलन, उनके इस्तेमाल की मंजूरी, मानवीय निगरानी, आंकड़ों की सुरक्षा, तकनीकी घटनाओं का प्रबंधन और ग्राहकों की शिकायतों के निपटारे की व्यवस्था शामिल करनी होगी। कंपनी को यह भी तय करना होगा कि किसी नई AI प्रणाली को शुरू करने से पहले किन जांचों और मंजूरियों की आवश्यकता होगी। मसौदे के अनुसार, नीति की समीक्षा कम से कम प्रत्येक वित्त वर्ष में एक बार करनी होगी। नीति लागू होने या उसमें संशोधन किए जाने के बाद निर्धारित समय के भीतर उसकी जानकारी TRAI को भी देनी होगी। प्रस्ताव में इसके लिए सात कार्यदिवस की समयसीमा रखी गई है।

AI प्रणालियों को तीन जोखिम श्रेणियों में बांटना होगा

TRAI ने एआई के इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए जोखिम आधारित व्यवस्था प्रस्तावित की है। इसके अंतर्गत कंपनियों को अपनी एआई प्रणालियों को उच्च, मध्यम और निम्न जोखिम की तीन श्रेणियों में वर्गीकृत करना होगा। वर्गीकरण केवल तकनीक के नाम या उसकी जटिलता के आधार पर नहीं होगा, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगा कि वह दूरसंचार नेटवर्क, कंपनी के परिचालन और उपभोक्ताओं को कितना प्रभावित कर सकती है।
1. उच्च जोखिम- ऐसी प्रणालियां जिनकी गड़बड़ी से नेटवर्क के महत्वपूर्ण हिस्सों, सेवाओं की निरंतरता या ग्राहकों को गंभीर नुकसान पहुंचने की आशंका हो। इनके लिए अधिक कड़ी जांच, निगरानी और मंजूरी की आवश्यकता हो सकती है।
2. मध्यम जोखिम- ऐसी प्रणालियां जिनकी त्रुटि से सेवाओं, कंपनी के कामकाज या ग्राहकों पर उल्लेखनीय असर पड़ सकता है, लेकिन जिनका जोखिम उचित नियंत्रण और सुधार से सीमित किया जा सकता है।
3. निम्न जोखिम- ऐसी प्रणालियां जिनके संभावित प्रभाव अपेक्षाकृत सीमित हों। इनके लिए भी निर्धारित सुरक्षा, निगरानी और जवाबदेही के प्रावधान लागू रहेंगे।
यहां ध्यान देना जरूरी है कि ये तीन श्रेणियां एआई प्रणालियों के जोखिम का आकलन करने के लिए हैं। TRAI ने एआई से जुड़ी घटनाओं की गंभीरता मापने के लिए अलग से चार श्रेणियों का प्रस्ताव रखा है। दोनों व्यवस्थाओं का उद्देश्य अलग-अलग है।

AI से गंभीर गड़बड़ी हुई तो TRAI को देनी होगी जानकारी

प्रस्तावित नियमों का एक प्रमुख हिस्सा एआई से जुड़ी घटनाओं की पहचान, जांच और रिपोर्टिंग है। दूरसंचार नेटवर्क में इस्तेमाल होने वाली कोई एआई प्रणाली गलत निर्णय लेती है, बार-बार विफल होती है या उसकी वजह से सेवाओं पर गंभीर असर पड़ता है, तो कंपनी को घटना का रिकॉर्ड रखना होगा और उसके कारणों की जांच करनी होगी। TRAI ने एआई से जुड़ी घटनाओं को चार स्तरों में बांटने का प्रस्ताव रखा है। गंभीरतम और उच्च गंभीरता वाली घटनाओं की सूचना TRAI को निर्धारित प्रारूप और समयसीमा के भीतर देनी होगी। कंपनियों को एआई से जुड़ी घटनाओं का केंद्रीय अभिलेख भी रखना होगा, ताकि यह पता चल सके कि गड़बड़ी कब हुई, उसका क्या असर पड़ा और उसे ठीक करने के लिए क्या कदम उठाए गए।

जियो और एयरटेल जैसी कंपनियों की जवाबदेही क्यों बढ़ेगी?

दूरसंचार क्षेत्र में एआई का इस्तेमाल अब केवल प्रयोग तक सीमित नहीं है। कंपनियां नेटवर्क के प्रदर्शन में सुधार, खराबी का पूर्वानुमान, अनचाही कॉल की पहचान और धोखाधड़ी रोकने जैसे कार्यों में इस तकनीक का उपयोग कर रही हैं। भारती एयरटेल एआई आधारित प्रणालियों के माध्यम से अनचाही कॉल और संदेशों की पहचान करने तथा साइबर खतरों से सुरक्षा देने पर काम कर रही है। रिलायंस जियो ने अपने नेटवर्क संचालन में जियोब्रेन नामक एआई मंच के इस्तेमाल की जानकारी दी है। इसका उद्देश्य नेटवर्क की संभावित खराबियों का अनुमान लगाने, क्षमता के बेहतर उपयोग और संचालन को अधिक कुशल बनाने में सहायता करना है। ऐसी प्रणालियां बड़े स्तर पर काम करती हैं। यदि इनमें कोई त्रुटि आती है, तो उसका प्रभाव एक ग्राहक तक सीमित रह सकता है या परिस्थितियों के अनुसार बड़ी संख्या में उपयोगकर्ताओं और नेटवर्क सेवाओं तक पहुंच सकता है। इसी वजह से नियामक यह सुनिश्चित करना चाहता है कि कंपनियों के पास एआई से जुड़े जोखिमों की पहचान और उनका समाधान करने की स्पष्ट व्यवस्था हो।

तीसरी कंपनी से तकनीक खरीदने पर भी जिम्मेदारी ऑपरेटर की

मसौदे का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कंपनी एआई प्रणाली का निर्माण स्वयं करे या किसी दूसरी कंपनी से खरीदे, उसकी जवाबदेही संबंधित दूरसंचार इकाई पर ही रहेगी। उदाहरण के लिए, यदि कोई दूरसंचार कंपनी बाहरी तकनीकी आपूर्तिकर्ता की एआई प्रणाली का इस्तेमाल करती है और उससे ग्राहकों को नुकसान होता है, तो कंपनी केवल यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकेगी कि तकनीक किसी दूसरी कंपनी ने बनाई थी। प्रस्तावित व्यवस्था के अंतर्गत कंपनियों को तकनीकी आपूर्तिकर्ताओं की विश्वसनीयता, प्रणाली की क्षमताओं, उसकी सीमाओं और आंकड़ों की गुणवत्ता का आकलन करना होगा। अनुबंधों में नियामकीय अनुपालन, जांच के अधिकार, घटना की सूचना और जवाबदेही से संबंधित प्रावधान भी शामिल किए जाने प्रस्तावित हैं।

AI के इस्तेमाल से पहले होगी तकनीकी जांच

TRAI के प्रस्ताव केवल घटना होने के बाद कार्रवाई तक सीमित नहीं हैं। इनका उद्देश्य संभावित गड़बड़ियों को पहले ही रोकने की व्यवस्था बनाना भी है। किसी नई एआई प्रणाली को लागू करने या मौजूदा प्रणाली में महत्वपूर्ण बदलाव करने से पहले कंपनियों को उसकी पुष्टि, अनुरूपता और प्रभाव का आकलन करना होगा। इसमें प्रणाली की सटीकता, मजबूती, निष्पक्षता, उसके निर्णयों को समझने की क्षमता और बदलती परिस्थितियों में सही ढंग से काम करने की योग्यता की जांच शामिल होगी। एआई प्रणाली समय के साथ नए आंकड़ों और परिस्थितियों के कारण अलग तरह से व्यवहार करने लग सकती है। तकनीकी भाषा में इसे मॉडल ड्रिफ्ट कहा जाता है। यदि इस बदलाव पर ध्यान न दिया जाए, तो पहले सही परिणाम देने वाली प्रणाली बाद में गलत निर्णय लेने लग सकती है। इसके अलावा, प्रशिक्षण के दौरान आंकड़ों में मौजूद पक्षपात, जानबूझकर किए गए तकनीकी हमले और एआई के अप्रत्याशित व्यवहार से भी जोखिम पैदा हो सकते हैं। दूरसंचार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में इन खतरों की अनदेखी नेटवर्क की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती है।

हर कंपनी में बनानी होगी एआई निगरानी समिति

मसौदे में कंपनियों के भीतर एआई के सुरक्षित इस्तेमाल की निगरानी के लिए एक विशेष समिति गठित करने का भी प्रस्ताव है। इसे एआई गवर्नेंस एंड सेफ्टी कमेटी कहा गया है। इस समिति में नेटवर्क संचालन, सेवा वितरण, सूचना प्रौद्योगिकी, आंकड़ा प्रबंधन, नियामकीय मामलों और उपभोक्ता मामलों से जुड़े अधिकारियों का प्रतिनिधित्व रखने का प्रस्ताव है। इसकी अगुवाई वरिष्ठ अधिकारी करेंगे, जिन्हें एआई गवर्नेंस एंड सेफ्टी ऑफिसर के रूप में नामित किया जाएगा। समिति का काम केवल नियमों का पालन सुनिश्चित करना नहीं होगा। उसे एआई प्रणालियों के प्रदर्शन, सुरक्षा की कमजोरियों, मानवीय निगरानी की प्रभावशीलता और निष्पक्षता से जुड़े जोखिमों की भी समीक्षा करनी होगी। जरूरत पड़ने पर प्रणाली में बदलाव करने या उसे बंद करने जैसे सुधारात्मक कदमों पर विचार किया जा सकेगा।

ग्राहकों को नुकसान हुआ तो शिकायत और समाधान की व्यवस्था

ग्राहकों के लिए इस प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शिकायतों का निपटारा है। यदि एआई आधारित किसी सेवा के कारण उपभोक्ता को नुकसान पहुंचता है, तो कंपनी के पास शिकायत दर्ज करने, उसकी जांच करने और समाधान उपलब्ध कराने की पूर्वनिर्धारित व्यवस्था होनी चाहिए। कंपनियों को एआई से जुड़े नुकसान की शिकायतों का केंद्रीय रिकॉर्ड रखने और उनके निपटारे की प्रक्रिया तय करने का प्रस्ताव है। इसमें नुकसान की प्रकृति समझना, संबंधित प्रणाली की जांच करना और जरूरी सुधारात्मक कार्रवाई करना शामिल होगा। हालांकि, मसौदे में शिकायतों के समाधान के लिए निश्चित दिनों की कोई एक सार्वभौमिक समयसीमा स्पष्ट नहीं की गई है। इसमें उचित समय के भीतर समाधान और पूर्वनिर्धारित शिकायत निवारण प्रक्रिया पर जोर दिया गया है। इसलिए फिलहाल यह दावा करना सही नहीं होगा कि प्रत्येक शिकायत का समाधान अनिवार्य रूप से 24 घंटे, 48 घंटे या सात दिनों में करना होगा।

आंकड़ों की सुरक्षा और निजता पर भी जोर

दूरसंचार कंपनियों के पास ग्राहकों की पहचान, संपर्क और सेवा उपयोग से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े होते हैं। एआई प्रणालियों के प्रशिक्षण और संचालन में इन आंकड़ों का इस्तेमाल होने पर उनकी सुरक्षा का सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रस्तावित नीति में आंकड़ों के वैध संग्रह, उपयोग, साझा करने और सुरक्षित निपटान की व्यवस्था शामिल करनी होगी। गोपनीयता, साइबर सुरक्षा और लागू कानूनों के अनुरूप आंकड़ों का प्रबंधन करना भी आवश्यक होगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एआई के माध्यम से बेहतर सेवा देने की कोशिश में ग्राहकों की निजी जानकारी और दूरसंचार नेटवर्क की सुरक्षा कमजोर न पड़े। हालांकि, इन दिशा-निर्देशों का अर्थ यह नहीं है कि एआई के इस्तेमाल से जुड़ी हर निजता संबंधी समस्या स्वतः समाप्त हो जाएगी। इसके लिए तकनीकी सुरक्षा, उचित निगरानी और लागू कानूनों का पालन भी जरूरी होगा।

AI से सुविधा भी, गलती पर जवाबदेही भी

TRAI का प्रस्ताव स्पष्ट संकेत देता है कि दूरसंचार क्षेत्र में एआई के बढ़ते इस्तेमाल के साथ कंपनियों की जवाबदेही भी मजबूत करने की कोशिश की जा रही है। अब जोर केवल इस बात पर नहीं है कि तकनीक कितनी तेजी से काम करती है, बल्कि इस पर भी है कि वह कितनी सुरक्षित, निष्पक्ष और भरोसेमंद है। यदि प्रस्तावित व्यवस्था अंतिम रूप में लागू होती है, तो जियो, एयरटेल और अन्य संबंधित कंपनियों को एआई प्रणालियों का रिकॉर्ड रखने, जोखिम का आकलन करने, मानवीय निगरानी सुनिश्चित करने और गंभीर घटनाओं की जानकारी नियामक को देने के लिए अधिक व्यवस्थित व्यवस्था बनानी होगी। ग्राहकों के लिए इसका संभावित लाभ शिकायतों के बेहतर निपटारे और तकनीकी गड़बड़ियों के प्रति अधिक जवाबदेही के रूप में सामने आ सकता है। दूसरी ओर, कंपनियों के लिए चुनौती यह होगी कि वे एआई से मिलने वाली परिचालन संबंधी सुविधाओं को बनाए रखते हुए सुरक्षा, निजता और उपभोक्ता हितों से जुड़े मानकों का पालन करें।
फिलहाल सबसे अहम तारीख 27 नवंबर 2026 है, जब तक TRAI ने मसौदे पर सुझाव मांगे हैं। इसके बाद आने वाले निर्णयों से स्पष्ट होगा कि दूरसंचार क्षेत्र में एआई के इस्तेमाल के लिए अंतिम नियामकीय व्यवस्था कैसी होगी।

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