पश्चिम बंगाल की स्कूल किताबों में बड़े बदलाव की तैयारी, ‘पानी-अब्बा-अम्मी’ की जगह ‘जल-बाबा-मां’ करने की सिफारिश; इतिहास और साहित्य का पाठ्यक्रम भी बदलेगा
पश्चिम बंगाल के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली बंगाली भाषा की पुस्तकों और इतिहास-साहित्य के पाठ्यक्रम में बड़े बदलाव की तैयारी चल रही है। राज्य सरकार की ओर से गठित पाठ्यक्रम समीक्षा समिति ने भाषा, इतिहास और साहित्य से जुड़े कई संशोधनों की सिफारिश की है। इनमें बंगाली पुस्तकों में इस्तेमाल होने वाले कुछ शब्दों को बदलने, हिंदू राष्ट्रवादी नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन और योगदान को पाठ्यपुस्तकों में शामिल करने तथा मुगल शासन, ब्रिटिश औपनिवेशिक इतिहास और मार्क्सवादी विचारधारा से संबंधित सामग्री को कम करने के प्रस्ताव शामिल हैं। कल्याणी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर देबाशीष चटर्जी की अध्यक्षता वाली समिति की इन सिफारिशों ने शिक्षा, भाषा और इतिहास को लेकर नई बहस छेड़ दी है। समिति का कहना है कि प्रस्तावित बदलावों में विद्यार्थियों की रोजमर्रा की भाषा, भारतीय इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े विषयों पर ध्यान दिया गया है। दूसरी ओर, पाठ्यक्रम में किन साहित्यिक रचनाओं और ऐतिहासिक घटनाओं को जगह मिलेगी तथा किन विषयों को कम किया जाएगा, इस पर भी चर्चा शुरू हो गई है।
‘Pani’ की जगह ‘Jal’, ‘Abba’ की जगह ‘Baba’ करने का प्रस्ताव
इस प्रस्तावित बदलाव में सबसे अधिक चर्चा बंगाली भाषा की पुस्तकों में इस्तेमाल होने वाले शब्दों को लेकर हो रही है। समिति ने ‘पानी’ के स्थान पर ‘जल’, ‘अब्बा’ के स्थान पर ‘बाबा’ और ‘अम्मी’ के स्थान पर ‘मां’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल की सिफारिश की है। समिति के अध्यक्ष देबाशीष चटर्जी के अनुसार, जिन शब्दों को बदलने का सुझाव दिया गया है, वे सामान्य बोलचाल की बंगाली भाषा में उतने प्रचलित नहीं हैं। उनका तर्क है कि पाठ्यपुस्तकों में ऐसे शब्दों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जिनका इस्तेमाल विद्यार्थी रोजमर्रा की बातचीत में करते हैं। बंगाल में भाषा का इस्तेमाल क्षेत्र, परिवार, सामाजिक परिवेश और सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार बदलता है। कुछ शब्दों का इस्तेमाल अलग-अलग समुदायों और परिवारों में अधिक हो सकता है, जबकि दूसरे शब्द अन्य संदर्भों में प्रचलित होते हैं। इसलिए किसी शब्द को कम प्रचलित मानने और उसे पाठ्यपुस्तक से हटाने के बीच अंतर है।
पुस्तकीय और व्यावहारिक भाषा में संतुलन
बंगाली भाषा में ‘जल’ और ‘पानी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल अलग-अलग संदर्भों में मिलता है। इसी तरह ‘बाबा’, ‘अब्बा’, ‘मां’ और ‘अम्मी’ जैसे संबोधन परिवारों तथा भाषाई-सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार इस्तेमाल किए जाते हैं। समिति का प्रस्ताव पाठ्यपुस्तकों में शब्दों के चयन को लेकर है, लेकिन इससे व्यापक सवाल यह भी उठता है कि स्कूल की भाषा विद्यार्थियों के अलग-अलग भाषाई अनुभवों को किस हद तक प्रतिबिंबित करे। शिक्षा विशेषज्ञों के लिए यह महत्वपूर्ण विषय है, क्योंकि प्राथमिक स्तर पर भाषा सीखने का उद्देश्य केवल मानक शब्दावली सिखाना नहीं, बल्कि बच्चों को अपनी भाषा समझने, पढ़ने और अभिव्यक्त करने में सक्षम बनाना भी होता है। प्रस्तावित संशोधन लागू होने पर यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पुस्तकों में भाषा की सरलता और विद्यार्थियों की भाषाई विविधता के बीच किस तरह संतुलन बनाया जाता है।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन पाठ्यपुस्तकों में शामिल करने की सिफारिश
समिति की सिफारिशों में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन और योगदान को स्कूल की पुस्तकों में स्थान देना है। रिपोर्टों के अनुसार, समिति चाहती है कि उनके जीवन और विचारों का संक्षिप्त विवरण पाठ्यपुस्तकों में शामिल किया जाए, ताकि विद्यार्थियों को उनके राजनीतिक जीवन और ऐतिहासिक भूमिका के बारे में जानकारी मिल सके। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म 1901 में हुआ था। वे शिक्षाविद्, राजनीतिज्ञ और भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे। उन्होंने स्वतंत्र भारत की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे भारतीय जनता पार्टी के वैचारिक पूर्ववर्ती संगठन भारतीय जनसंघ की स्थापना से जुड़े थे और राष्ट्रवाद से संबंधित अपने विचारों के लिए जाने जाते हैं। इससे पहले वे स्वतंत्र भारत की पहली केंद्रीय मंत्रिपरिषद में मंत्री भी रहे थे। उनके जीवन को पाठ्यक्रम में शामिल करने की सिफारिश राज्य में शिक्षा और इतिहास के चयन को लेकर व्यापक बदलावों का हिस्सा है। समिति का दृष्टिकोण भारतीय इतिहास, राष्ट्रवाद और देश के राजनीतिक विकास में योगदान देने वाले व्यक्तित्वों को अधिक स्थान देने पर केंद्रित दिखाई देता है।
यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न पाठ्यक्रम के संतुलन का भी है। किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व के जीवन और योगदान को पढ़ाना विद्यार्थियों के लिए उपयोगी हो सकता है, लेकिन इतिहास की शिक्षा में विभिन्न विचारधाराओं, राजनीतिक धाराओं और ऐतिहासिक घटनाओं को तथ्यात्मक संदर्भों के साथ समझाना भी जरूरी है। पाठ्यपुस्तकों में व्यक्तित्वों का चयन किस आधार पर किया जाता है और उनके योगदान को किस ऐतिहासिक संदर्भ में प्रस्तुत किया जाता है, इससे विद्यार्थियों की समझ प्रभावित होती है। समिति की सिफारिशों के अनुसार, डॉ. मुखर्जी से संबंधित सामग्री को पुस्तकों में शामिल करने की योजना बनाई गई है। हालांकि, इसका अंतिम स्वरूप और विभिन्न कक्षाओं में सामग्री की मात्रा स्वीकृत पाठ्यक्रम से ही स्पष्ट होगी।
मुगल इतिहास और ब्रिटिश शासन से जुड़े अध्यायों में कटौती का प्रस्ताव
पाठ्यक्रम समीक्षा समिति की सिफारिशों में इतिहास की पुस्तकों में मुगल शासन, भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन और मार्क्सवादी विचारधारा से संबंधित कुछ अंशों को कम करने का प्रस्ताव भी शामिल है। समिति का तर्क है कि भारतीय इतिहास को पढ़ाते समय केवल कुछ शासकों, साम्राज्यों और राजनीतिक विचारधाराओं पर अधिक ध्यान देने के बजाय देश की सांस्कृतिक विरासत, स्वतंत्रता के संघर्ष और राष्ट्र के निर्माण में योगदान देने वाले व्यक्तित्वों को भी पर्याप्त स्थान मिलना चाहिए। मुगल काल भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस अवधि में शासन व्यवस्था, स्थापत्य कला, साहित्य, व्यापार, प्रशासन और विभिन्न समुदायों के बीच संबंधों में कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए। इसी प्रकार ब्रिटिश शासन के अध्ययन से विद्यार्थियों को औपनिवेशिक नीतियों, आर्थिक प्रभावों, सामाजिक बदलावों और स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि समझने में मदद मिलती है।
मार्क्सवादी विचारधारा भी आधुनिक राजनीतिक और सामाजिक इतिहास के अध्ययन का एक हिस्सा रही है। इसलिए इन विषयों की सामग्री कम करने का निर्णय केवल पाठ्यक्रम में बदलाव नहीं, बल्कि इस बात से भी जुड़ा है कि विद्यार्थियों को इतिहास की किन घटनाओं, विचारों और प्रक्रियाओं से परिचित कराया जाए। समिति ने इन विषयों की सामग्री कम करने की सिफारिश की है, लेकिन उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि मुगल इतिहास, ब्रिटिश शासन या मार्क्सवाद से संबंधित सभी सामग्री हटा दी जाएगी। प्रस्ताव का आशय इन विषयों को सीमित करने से जुड़ा है। वास्तविक बदलावों का पता संशोधित पुस्तकों और स्वीकृत पाठ्यक्रम से ही चलेगा।
रवींद्रनाथ टैगोर की कविताओं और ऐतिहासिक नाटकों में भी बदलाव
भाषा और इतिहास के साथ साहित्य के पाठ्यक्रम में भी संशोधन की सिफारिश की गई है। इन बदलावों में नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर की कुछ रचनाओं और ऐतिहासिक विषयों पर आधारित नाटकों को लेकर प्रस्ताव शामिल हैं। समिति ने टैगोर की कविता ‘आफ्रिका’ को हटाकर ‘शिवाजी उत्सव’ को शामिल करने की सिफारिश की है। इसी तरह सिराजुद्दौला पर आधारित नाटक को हटाकर द्विजेंद्रलाल राय के ऐतिहासिक नाटक ‘मेवाड़ पतन’ को शामिल करने का प्रस्ताव है। इन दोनों बदलावों के साहित्यिक और ऐतिहासिक महत्व को समझना जरूरी है।
टैगोर की कविता ‘आफ्रिका’ केवल एक भौगोलिक क्षेत्र का वर्णन नहीं है। यह अफ्रीका के लोगों पर औपनिवेशिक हिंसा, शोषण और नस्लीय दमन की पृष्ठभूमि में लिखी गई रचना है। इसका संबंध यूरोपीय साम्राज्यवाद की आलोचना से भी है। दूसरी ओर, ‘शिवाजी उत्सव’ में छत्रपति शिवाजी के व्यक्तित्व और उनसे जुड़े ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विचारों को स्थान मिलता है। इसी तरह सिराजुद्दौला पर आधारित नाटक बंगाल के इतिहास में प्लासी के युद्ध, राजनीतिक विश्वासघात और सत्ता परिवर्तन की घटनाओं को समझने का साहित्यिक माध्यम है। इसके स्थान पर ‘मेवाड़ पतन’ को शामिल करने का प्रस्ताव इतिहास के दूसरे प्रसंग को पाठ्यक्रम में प्रमुखता देता है।
सिंगूर आंदोलन और कन्याश्री योजना से जुड़े अध्याय भी हटाने की सिफारिश
प्रस्तावित संशोधनों में पश्चिम बंगाल की पिछली ममता बनर्जी सरकार के कार्यकाल में पाठ्यपुस्तकों में शामिल किए गए कुछ विषयों को हटाने की सिफारिश भी की गई है। इनमें सिंगूर भूमि आंदोलन और कन्याश्री योजना से संबंधित अध्याय शामिल हैं। सिंगूर आंदोलन पश्चिम बंगाल की राजनीति और भूमि अधिग्रहण से जुड़े विवादों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। सिंगूर में उद्योग लगाने के लिए जमीन अधिग्रहण का मामला राज्य में बड़े राजनीतिक आंदोलन का कारण बना था। इस आंदोलन ने भूमि, किसानों के अधिकार, औद्योगीकरण और विकास की नीतियों को लेकर व्यापक बहस को जन्म दिया था।
कन्याश्री योजना पश्चिम बंगाल सरकार की एक प्रमुख योजना रही है, जिसका उद्देश्य बालिकाओं की शिक्षा को प्रोत्साहित करना और कम उम्र में विवाह की समस्या को कम करने में मदद करना है। इस योजना के तहत पात्र लड़कियों को निर्धारित शर्तों के अनुसार आर्थिक सहायता दी जाती है। समिति ने इन विषयों को पाठ्यपुस्तकों से हटाने की सिफारिश की है। इसके पीछे पाठ्यक्रम में बदलाव और विषयों के पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया है। हालांकि, सिंगूर आंदोलन और कन्याश्री योजना जैसे विषयों का महत्व राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक इतिहास से भी जुड़ा हुआ है।
जनवरी 2027 से नई किताबें लाने की तैयारी, लेकिन समय की चुनौती
पाठ्यक्रम समीक्षा समिति के सामने सबसे बड़ी व्यावहारिक चुनौती नई पुस्तकों को निर्धारित समय पर तैयार करना और लाखों विद्यार्थियों तक पहुंचाना है। समिति के अध्यक्ष देबाशीष चटर्जी के हवाले से प्रकाशित रिपोर्टों में कहा गया है कि पुस्तकों को 2 जनवरी तक स्कूलों में उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए लगभग 12 करोड़ पुस्तकों के प्रकाशन और वितरण की आवश्यकता बताई गई है। इतनी बड़ी संख्या में पुस्तकें तैयार करने की प्रक्रिया में पाठ्य सामग्री की समीक्षा, संशोधित अध्यायों का संपादन, भाषा की जांच, मुद्रण, गुणवत्ता नियंत्रण और वितरण जैसी कई गतिविधियां शामिल होती हैं। इसी वजह से समिति ने फिलहाल पूरे पाठ्यक्रम को नए सिरे से तैयार करने के बजाय आवश्यक संशोधनों और सुधारों पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही है।
स्कूलों में मोबाइल फोन पर रोक और परीक्षा व्यवस्था में बदलाव पर भी विचार
पश्चिम बंगाल में स्कूल शिक्षा को लेकर चर्चा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने 25 अक्टूबर 2026 को स्कूल शिक्षा व्यवस्था में संभावित बदलावों का उल्लेख किया था। रिपोर्टों के अनुसार, सरकार स्कूलों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर रोक लगाने, विद्यार्थियों को अगली कक्षा में भेजने से संबंधित मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा करने और राष्ट्रीय कैडेट कोर (NCC) जैसी गतिविधियों को दोबारा बढ़ावा देने पर विचार कर रही है। मुख्यमंत्री ने मोबाइल फोन पर रोक और उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण व्यवस्था को फिर से लागू करने के प्रति अपना समर्थन भी जताया था। इसके अलावा राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) और व्रतचारी कार्यक्रम जैसी सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों को बढ़ावा देने की बात कही गई थी।
पाठ्यक्रम बदलाव पर क्यों बढ़ सकती है बहस?
पश्चिम बंगाल की पाठ्यपुस्तकों में प्रस्तावित संशोधन भाषा, इतिहास, साहित्य और राजनीति के बीच संबंधों को लेकर व्यापक चर्चा का विषय बन सकते हैं। किसी भी राज्य में पाठ्यक्रम तय करना केवल यह निर्धारित करना नहीं है कि विद्यार्थी कौन-से अध्याय पढ़ेंगे। यह भी तय करना होता है कि नई पीढ़ी को भाषा, समाज, संस्कृति और इतिहास के बारे में किस प्रकार की समझ दी जाएगी। भाषा के मामले में मानक शब्दावली और विद्यार्थियों की वास्तविक बोलचाल के बीच संतुलन आवश्यक है। इतिहास में विभिन्न शासकों, सामाजिक आंदोलनों, स्वतंत्रता संघर्ष और राजनीतिक विचारधाराओं को तथ्यात्मक संदर्भों के साथ पढ़ाना जरूरी है। वहीं साहित्य में अलग-अलग विचारों, अनुभवों और सांस्कृतिक परंपराओं को स्थान देने से विद्यार्थियों की समझ व्यापक हो सकती है।
सिफारिशों पर नजर, अंतिम फैसले का इंतजार
पश्चिम बंगाल के सरकारी स्कूलों में बंगाली भाषा, इतिहास और साहित्य की पुस्तकों में संशोधन की प्रक्रिया एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक बदलाव है। ‘पानी’ की जगह ‘जल’, ‘अब्बा’ की जगह ‘बाबा’ और ‘अम्मी’ की जगह ‘मां’ जैसे शब्दों के प्रस्ताव से लेकर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन को शामिल करने, मुगल इतिहास और मार्क्सवाद से संबंधित सामग्री कम करने तथा साहित्यिक रचनाओं में बदलाव तक, समिति की सिफारिशों का दायरा व्यापक है। इसके साथ सिंगूर आंदोलन और कन्याश्री योजना के अध्याय हटाने तथा पुरानी शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी कुछ नीतियों पर दोबारा विचार करने की चर्चा भी है।
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