तेल में लगी आग: ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर पार, भारत के लिए बढ़ी मुसीबतें

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Crude Oil Price: ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर के पार, भारत के लिए बढ़ेगी मुसीबत

ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी है, जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था समेत भारत के सामने एक बड़ा आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है। पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव और हाल ही में सऊदी अरब के ऊर्जा संयंत्रों पर ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के ताजा मिसाइल हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में यह जबरदस्त उबाल आया है। भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 85% हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल का यह शतक भारतीय घरेलू बाजार में महंगाई, चालू खाता घाटे (CAD) और रुपये की कमजोरी के रूप में बड़ी मुसीबतें लेकर आने वाला है।

ब्रेंट क्रूड $100 के पार

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों ने एक बार फिर दुनिया को हिलाकर रख दिया है। वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) 100 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर चुका है। वहीं, अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) भी तेजी से इसके पीछे भाग रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह भू-राजनीतिक तनाव जल्द शांत नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक भी जा सकती हैं। त्योहारों के सीजन से ठीक पहले कच्चे तेल की कीमतों में आई इस अभूतपूर्व तेजी ने भारत सरकार और आम आदमी की चिंताओं को अत्यधिक बढ़ा दिया है।

कीमतें बढ़ने की मुख्य वजह: पश्चिम एशिया में युद्ध की नई चिंगारी

कच्चे तेल के उबलने के पीछे सबसे बड़ा कारण अमेरिका और ईरान के बीच गहराता सैन्य टकराव है। हाल ही में अमेरिकी नौसेना पर हुए हमलों के जवाब में अमेरिकी सेना ने ईरान के तीन क्रूड ऑयल टैंकरों को निशाना बनाया। इसके तुरंत बाद, ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब की बड़ी तेल फैक्ट्रियों और ऊर्जा संयंत्रों पर ड्रोन व मिसाइल हमले कर वहां आग लगा दी। इन हमलों की वजह से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग ‘होर्मुज जलडमरूमन्य’ (Strait of Hormuz) और लाल सागर (Red Sea) के जरिए होने वाली तेल की सप्लाई पूरी तरह चरमरा गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, जहां इस रूट से रोजाना 80 से 90 लाख बैरल तेल गुजरता था, वह अब घटकर 20 लाख बैरल प्रति दिन से भी कम रह गया है। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने भी आशंका जताई है कि इस साल वैश्विक तेल आपूर्ति में करीब 43 लाख बैरल प्रति दिन की भारी गिरावट आ सकती है।

वैश्विक वित्तीय संस्थाओं की चेतावनी

सप्लाई चैन टूटने और युद्ध के लंबे खिंचने की आशंका को देखते हुए दुनिया के बड़े वैश्विक बैंकों जैसे Goldman Sachs, Bank of America, और HSBC ने कच्चे तेल की कीमतों के अपने पुराने अनुमानों को बढ़ा दिया है। इन सभी का मानना है कि चालू तिमाही (Q4) में ब्रेंट क्रूड का औसत भाव $100 या उससे ऊपर ही टिका रह सकता है।

भारत के लिए क्यों बढ़ी मुसीबत? इनसाइड स्टोरी

भारत के लिए कच्चा तेल महंगा होना किसी दोधारी तलवार से कम नहीं है। हमारी अर्थव्यवस्था पर इसका चौतरफा असर देखने को मिलेगा-

पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका

कच्चा तेल महंगा होने का सीधा दबाव देश की सरकारी तेल कंपनियों (IOC, HPCL, BPCL) पर पड़ेगा। भारतीय रिफाइनरियों के लिए कच्चे तेल का आयात करना महंगा हो जाएगा, जिसके कारण घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में ₹5 से ₹8 प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है।

मालभाड़ा बढ़ेगा, चौतरफा फैलेगी महंगाई

डीजल की कीमतों में उछाल आते ही देश में ट्रांसपोर्टेशन (मालभाड़ा) महंगा हो जाएगा। इसके परिणामस्वरूप फल, सब्जियां, दूध, अनाज और FMCG उत्पादों समेत सभी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में तेजी आएगी। आम जनता की जेब पर इसका सीधा बोझ पड़ेगा।

रुपया होगा रिकॉर्ड कमजोर और बढ़ेगा ट्रेड डेफिसिट

भारत को तेल खरीदने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। तेल महंगा होने से भारत का डॉलर आउटफ्लो (डॉलर का बाहर जाना) बढ़ जाएगा। डॉलर की मांग बढ़ने से भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर फिसल सकता है, जिससे अन्य जरूरी इलेक्ट्रॉनिक सामानों और कच्चे माल का आयात भी महंगा हो जाएगा।

चालू खाता घाटा (CAD) में रिकॉर्ड उछाल

आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से भारत का चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) करीब 10 से 12 अरब डॉलर बढ़ जाता है। क्रूड का $100 के पार जाना देश के राजकोषीय गणित और सरकारी बजट को पूरी तरह बिगाड़ सकता है।

आगे क्या है विकल्प?

भारत सरकार इस संकट से निपटने के लिए रूस से मिलने वाले रियायती (डिस्काउंटेड) तेल का कोटा बढ़ाने की कोशिश कर रही है। हालांकि, यूक्रेनी हमलों के कारण रूसी रिफाइनरियों को हुए नुकसान और रूस द्वारा इस साल के उत्पादन अनुमान में कटौती करने से वहां से भी भारी मात्रा में तेल मिलना आसान नहीं दिख रहा है। यदि खाड़ी देशों का यह संकट लंबा खिंचता है, तो रिजर्व बैंक (RBI) को महंगाई पर काबू पाने के लिए ब्याज दरों में कटौती का फैसला टालना पड़ सकता है, जिससे देश की आर्थिक विकास रफ्तार (GDP Growth) पर भी ब्रेक लग सकता है।

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