दशहरे पर हाईटेक रावण: मुस्लिम कारीगरों की अनोखी पहल

The CSR Journal Magazine
दशहरा, असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक माना जाता है। इस दिन भगवान राम और लक्ष्मण की भूमिका निभाने वाले रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतलों का दहन किया जाता है। लेकिन अब यह परंपरा आधुनिकता की ओर बढ़ रही है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में उत्तर प्रदेश के मुस्लिम परिवार इन पुतलों को तैयार कर रहे हैं। यह एक अनोखी मिसाल है गंगा-जमुनी तहजीब और हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की। कारीगरों का कहना है कि दशहरे का त्योहार उनके परिवारों की रोजी-रोटी का बड़ा सहारा है।

हाईटेक पुतलों की तैयारी

करीब एक महीने से ये कारीगर पुतले बनाने में जुटे हुए हैं। राजस्थान के पाली में साल भर रावण के पुतले तैयार किए जाते हैं और फिर उन्हें देश के विभिन्न शहरों में भेजा जाता है। दशहरे से चार महीने पहले ही इसकी तैयारी शुरू हो जाती है। इस काम में 150 से ज्यादा कारीगर शामिल होते हैं, जो सभी मुस्लिम समुदाय से आते हैं। उनके लिए यह सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा है।

आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल

कारीगरों ने बताया कि अब रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतलों में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ रहा है। पहले जहां पुतले पारंपरिक तरीके से बनाए जाते थे, वहीं अब उनमें मोटर और लाइटिंग जैसी सुविधाएं जोड़ी जा रही हैं। इस बार रावण की गर्दन घूमेगी, उसके हाथ-पैर हिलेंगे और हाथ में मौजूद तलवार भी घूमती दिखाई देगी। इतना ही नहीं, रावण की आंखों और मुंह से आग की लपटें निकलने जैसी विशेषताएं भी शामिल की जा रही हैं।

बढ़ती मांग और भव्यता

इन बदलावों का मकसद पुतलों को पहले से ज्यादा आकर्षक और प्रभावशाली बनाना है। कारीगरों के मुताबिक, रोशनी और तकनीक से लैस पुतलों की मांग लगातार बढ़ रही है। इसी वजह से छोटे शहरों और कस्बों में भी अब भव्य रावण दहन कार्यक्रम आयोजित होने लगे हैं। पुतले बनाने के लिए खास तौर पर बरेली से बांस मंगवाया जाता है। इसके ढांचे पर चमकीले कागज चिपकाकर रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतलों को तैयार किया जाता है।

पुश्तैनी काम और पारिवारिक परंपरा

कारीगरों ने बताया कि रावण के पुतले बनाना उनका पुश्तैनी काम है। उनके पूर्वज भी इसी पेशे से जुड़े थे। वे रावण को एक विद्वान पंडित मानते हैं और उसके पुतले पूरे सम्मान के साथ तैयार करते हैं। राजस्थान के पाली में 100 फुट ऊंचा रावण भी बनाया जाता है। इसके अलावा, अलग-अलग शहरों में जरूरत और मांग के अनुसार पुतले तैयार किए जाते हैं।

दशहरे की कमाई से परिवार का खर्च

आगरा और उत्तर प्रदेश के अन्य इलाकों से आने वाले ये कारीगर राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के अलावा दिल्ली, मुंबई, नासिक, बिहार, पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड समेत कई राज्यों में काम कर चुके हैं। उनके बनाए पुतलों की सुंदरता और आधुनिक तकनीक के कारण उन्हें अलग-अलग जगहों से बुलाया जाता है। दशहरे से होने वाली कमाई से उनके परिवारों का साल भर का खर्च चलता है।

आतिशबाजी का नया अंदाज

अलवर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में आता है, इसलिए यहां आतिशबाजी में ग्रीन पटाखों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके लिए गाजियाबाद से विशेष आतिशबाजी कारीगर भी पहुंचेंगे। अलवर में पुरुषार्थी समाज वर्षों से रावण दहन का आयोजन करता आ रहा है। इस तरह परंपरा, तकनीक और विभिन्न समुदायों की भागीदारी से दशहरे का आयोजन हर साल नया रूप ले रहा है।

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