Nepal Floods: नेपाल में घास के पुतले का अंतिम संस्कार क्यों? गरुड़ पुराण में सदियों पुरानी इस परंपरा का क्या है विधान

The CSR Journal Magazine
नेपाल में आई भीषण फ्लैश फ्लड ने बड़ी तबाही मचाई है। इस आपदा में कई लोगों की मौत हुई, लेकिन कई परिवार ऐसे भी हैं जिन्हें अपने प्रियजनों के शव नहीं मिल सके। मौत की खबर मिलने के बाद भी जब शव सामने न हो तो परिवारों के सामने अंतिम संस्कार की बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाती है। इसी स्थिति में नेपाल में कुछ परिवार प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार की परंपरा अपना रहे हैं। बागमती नदी के किनारे कई परिवार कुश घास से मृतक की प्रतीकात्मक आकृति तैयार कर उसका अंतिम संस्कार कर रहे हैं। यह प्रक्रिया पशुपति आर्यघाट में भी अपनाई जा रही है।

शव नहीं मिले तो क्या है धार्मिक रास्ता?

सनातन परंपरा में अंतिम संस्कार को 16 संस्कारों में आखिरी संस्कार माना गया है। इसमें मृत व्यक्ति के शरीर को सम्मानपूर्वक विदा करने के साथ आगे दशगात्र, पिंडदान और अन्य धार्मिक क्रियाएं की जाती हैं। लेकिन जब मृतक का शरीर ही नहीं मिले तो ऐसी स्थिति के लिए भी धार्मिक ग्रंथों में व्यवस्था बताई गई है। गरुड़ पुराण की प्रेतकल्प परंपरा में ऐसी परिस्थिति का उल्लेख मिलता है। इसमें कहा गया है कि यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाए और उसका शव प्राप्त न हो सके, तो दर्भ यानी कुश घास से उसकी प्रतीकात्मक प्रतिकृति बनाकर उसका दाह संस्कार किया जा सकता है।

गरुड़ पुराण में क्या लिखा है?

गरुड़ पुराण-सारोद्धार के प्रेतकल्प के अध्याय 10 में श्लोक 88 से 90 तक इस स्थिति का वर्णन बताया गया है। इसमें विदेश, जंगल या किसी दूसरी परिस्थिति में मृत्यु होने और शव नहीं मिलने की स्थिति में दर्भ या कुश घास की प्रतिकृति तैयार कर दाह संस्कार करने का विधान बताया गया है। इसका भावार्थ यह है कि जब किसी व्यक्ति की मृत्यु की सूचना मिल जाए, लेकिन उसका शरीर न मिल सके, तो कुश घास से उसकी प्रतिकृति बनाकर सामान्य विधि के अनुसार उसका दाह संस्कार किया जाए। इसके बाद उस प्रतीकात्मक शव की राख को एकत्र करके गंगा या किसी पवित्र जल में विसर्जित करने की बात कही गई है।

इसके बाद कौन-कौन से संस्कार होते हैं?

गरुड़ पुराण में केवल प्रतीकात्मक दाह संस्कार का ही उल्लेख नहीं है, बल्कि इसके बाद की धार्मिक प्रक्रिया के बारे में भी बताया गया है। स्रोत के अनुसार प्रतीकात्मक दाह के बाद राख को पवित्र जल में विसर्जित किया जाता है और दशगात्र आदि क्रियाएं उसी दिन से शुरू करने का विधान बताया गया है। इसके बाद मृतक के लिए आगे की धार्मिक क्रियाएं सामान्य अंतिम संस्कार की तरह की जाती हैं। वार्षिक श्राद्ध के लिए भी मृत्यु का समाचार मिलने वाले दिन को आधार बनाने का उल्लेख मिलता है।

इसे क्या कहा जाता है?

कुश या दर्भ घास से प्रतीकात्मक शव बनाकर उसका दाह संस्कार करने की प्रक्रिया को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। स्रोत में इसे तृणपिंड दाह, पुत्तल दाह और दर्भादाह जैसे नामों से बताया गया है। इसमें दर्भ या कुश घास से मृत व्यक्ति की प्रतीकात्मक आकृति बनाई जाती है और फिर उसका दाह संस्कार किया जाता है। इसके बाद आगे के संस्कार उसी तरह किए जाते हैं जैसे सामान्य मृत्यु के बाद किए जाते हैं। तेरहवीं के बाद शुद्धि होने और सूतक हटने की परंपरा का भी उल्लेख किया गया है।

राजा सगर के पुत्रों से भी जुड़ा है पौराणिक प्रसंग

इस परंपरा से जुड़ा एक पौराणिक प्रसंग राजा सगर के पुत्रों से भी जोड़ा जाता है। मान्यता के अनुसार महर्षि कपिल के शाप से राजा सगर के 60 हजार पुत्र भस्म हो गए थे। उनके शरीर नष्ट हो जाने के कारण उनकी मुक्ति का प्रश्न सामने आया। बाद में राजा भगीरथ गंगा को धरती पर लेकर आए। मान्यता है कि गंगा के स्पर्श से राजा सगर के पुत्रों को मुक्ति मिली। इसी प्रसंग को प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार की धार्मिक अवधारणा से जोड़कर देखा जाता है।

नेपाल में क्यों अपनाई जा रही है यह परंपरा?

नेपाल में आई बाढ़ के बाद जिन परिवारों को अपने परिजनों के शव नहीं मिल पा रहे हैं, उनके लिए अंतिम संस्कार करना भावनात्मक और धार्मिक दोनों स्तरों पर कठिन स्थिति बन गई है। ऐसे में कुश घास की प्रतीकात्मक प्रतिकृति बनाकर दाह संस्कार करने की प्रक्रिया उन्हें अपने परिजनों के अंतिम संस्कार की धार्मिक प्रक्रिया पूरी करने का एक रास्ता दे रही है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि धार्मिक परंपराओं के पालन की विधि अलग-अलग संप्रदायों और स्थानीय परंपराओं में अलग हो सकती है। इसलिए ऐसी स्थिति में परिवार अपने पुरोहित या संबंधित धार्मिक आचार्य की सलाह के अनुसार विधि अपनाते हैं।

जब शरीर नहीं मिला, तब भी अंतिम विदाई का रास्ता

नेपाल की मौजूदा त्रासदी ने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी है, जहां कई परिवार अपने प्रियजनों की मौत की खबर तो जान चुके हैं, लेकिन अंतिम दर्शन तक नहीं कर पाए। ऐसे समय में प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार उनके लिए सिर्फ एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि अपने प्रियजन को अंतिम विदाई देने का माध्यम भी बन रहा है। गरुड़ पुराण में वर्णित दर्भ या कुश घास की प्रतिकृति से दाह संस्कार की परंपरा इसी तरह की असाधारण परिस्थितियों के लिए धार्मिक व्यवस्था के रूप में सामने आती है। नेपाल में बाढ़ प्रभावित परिवार इसी परंपरा के आधार पर अपने लापता परिजनों का प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार कर रहे हैं।

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