NEET विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने NTA को दी UPSC मॉडल अपनाने की सलाह, केंद्र ने परीक्षा प्रणाली का किया बचाव

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सुप्रीम कोर्ट ने NTA से कहा- UPSC जैसा सिस्टम बनाएं: सरकार ने NEET पेपर सिस्टम को फूलप्रूफ बताया

देश की सबसे बड़ी चिकित्सा प्रवेश परीक्षा नीट-यूजी (NEET-UG) में पेपर लीक और कथित अनियमितताओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर तीखी बहस हुई है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने न्यायालय के समक्ष हलफनामा देकर और मौखिक दलीलों के जरिए दावा किया कि वर्तमान नीट परीक्षा प्रणाली पूरी तरह फूलप्रूफ (सुरक्षित) है और इसमें सेंध लगाना बेहद मुश्किल है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट सरकार के इन तर्कों से पूरी तरह संतुष्ट नजर नहीं आया। शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि उसे संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) जैसी संस्थाओं से सीख लेनी चाहिए और उनके जैसा ही एक पारदर्शी, जवाबदेह और मजबूत परीक्षा ढांचा तैयार करना चाहिए। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि जब तक व्यक्तिगत और संस्थागत जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसी घटनाओं पर रोक लगाना नामुमकिन होगा।

केंद्र सरकार की दलील: ‘हमारा सिस्टम बेहद मजबूत और सुरक्षित है’

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने परीक्षा प्रणाली का पुरजोर बचाव किया। उन्होंने न्यायालय को आश्वस्त करने का प्रयास किया कि नीट-यूजी परीक्षा के लिए प्रश्न-पत्र तैयार करने से लेकर उसे परीक्षा केंद्रों तक सुरक्षित पहुंचाने तक हर स्तर पर गोपनीयता का विशेष ध्यान रखा जाता है। सॉलिसीटर जनरल ने कोर्ट के सामने इस जटिल प्रक्रिया को विस्तार से समझाते हुए भौतिक विज्ञान (फिजिक्स) के एक 100 अंकों के प्रश्न-पत्र का उदाहरण दिया। सरकार की ओर से दी गई जानकारियों के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं।
मल्टी-लेयर क्वेश्चन बैंक: परीक्षा के लिए एक बड़ा क्वेश्चन बैंक तैयार करने के लिए कई अलग-अलग मॉडरेटर और विषय विशेषज्ञों की मदद ली जाती है। ये मॉडरेटर मिलकर लगभग 500 से अधिक प्रश्नों का एक समूह तैयार करते हैं।
गोपनीयता का स्तर: प्रश्न तैयार करने वाले विशेषज्ञों के पहले सेट को यह बिल्कुल नहीं पता होता कि उनके द्वारा बनाए गए सवालों में से कौन से सवाल अंतिम प्रश्न-पत्र का हिस्सा बनेंगे। इसके बाद मॉडरेटरों का एक दूसरा समूह उन 500 प्रश्नों में से 100-100 प्रश्न चुनकर 4 अलग-अलग सेट (प्रश्न-पत्र) तैयार करता है।
महानिदेशक (DG) का अंतिम फैसला: इन 4 तैयार प्रश्न-पत्रों में से एनटीए (NTA) के महानिदेशक सिर्फ 2 प्रश्न-पत्रों का चयन करते हैं। अंतिम समय तक किसी भी बाहरी या आंतरिक व्यक्ति को यह भनक नहीं होती कि अंततः कौन सा प्रश्न-पत्र परीक्षा में छात्रों के सामने आएगा।

प्रेस और छपाई की सुरक्षा

चुने गए प्रश्न-पत्र एक डिजिटल चाबी (डिजिटल की) के साथ सीलबंद बक्से में दो अलग-अलग प्रिंटिंग प्रेसों में भेजे जाते हैं। इन प्रेसों की सुरक्षा केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) और CBT/CCTV कैमरों की चौबीसों घंटे निगरानी में होती है। छपाई के दौरान प्रेस के मालिक को भी यह नहीं पता होता कि वह किस परीक्षा का पेपर प्रिंट कर रहा है। एक बार डिजिटल कोड के जरिए बॉक्स खुलने के बाद पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग होती है और किसी को भी अंदर-बाहर जाने की अनुमति नहीं होती।

GPS से ट्रैकिंग

सरकार ने अदालत को बताया कि प्रश्न-पत्रों को प्रिंटिंग प्रेस से नोडल हब और फिर बैंकों या परीक्षा केंद्रों तक ले जाने वाले वाहनों में हाई-टेक जीपीएस (GPS) सिस्टम लगे होते हैं। गाड़ी की एक छोटी सी संदिग्ध हलचल भी तुरंत मुख्य सर्वर पर रिकॉर्ड हो जाती है। इसके अलावा, परीक्षा केंद्रों पर प्रत्येक कक्षा में केवल 24 छात्रों के बैठने की व्यवस्था होती है और OMR शीट के साथ प्रश्न-पत्र एक विशेष सीलबंद लिफाफे में आते हैं, जिसे केवल परीक्षा शुरू होने के समय छात्रों के सामने ही खोला जाता है। सरकार ने माना कि इस पूरी लंबी श्रृंखला में कुछ स्थानों पर इंसानी दखल (Human Intervention) होता है, और शायद इसी मानवीय चूक का फायदा उठाकर कुछ असामाजिक तत्वों ने व्यवस्था में सेंध लगाने की कोशिश की, लेकिन पूरा ढांचा दोषपूर्ण नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: ‘राधाकृष्णन कमेटी की रिपोर्ट देखें, हमें दूरगामी समाधान चाहिए’

सरकार द्वारा सुरक्षा के इतने बड़े-बड़े दावों को गिनाए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कड़ी टिप्पणी की। न्यायाधीशों ने कहा कि सॉलिसिटर जनरल जिन सुरक्षा उपायों और तकनीकी दावों की बात कर रहे हैं, उन सभी पहलुओं की समीक्षा सरकार द्वारा गठित डॉ. के. राधाकृष्णन समिति पहले ही कर चुकी है। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि वर्तमान व्यवस्था में गहरी संस्थागत और संरचनात्मक समस्याएं (Structural Problems) मौजूद हैं। अदालत ने कहा, “आप देश के सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा निकाय UPSC को देखिए। वह इतने बड़े पैमाने पर, देश के कोने-कोने में सिविल सेवा जैसी बेहद संवेदनशील परीक्षाएं आयोजित करता है, लेकिन वहां कभी इस तरह के पेपर लीक या बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की शिकायतें सामने नहीं आतीं। NTA को UPSC के इस मॉडल से गंभीर सीख लेनी होगी। हमें तदर्थ (Ad-hoc) या कामचलाऊ व्यवस्था नहीं, बल्कि एक ऐसा दूरगामी और स्थायी समाधान चाहिए जिससे देश के लाखों छात्रों का भविष्य सुरक्षित हो सके।”

विशेषज्ञों की नियुक्ति का आदेश

न्यायालय ने NTA को निर्देश दिया कि वे अपने संगठन में ऐसे विशेषज्ञ अधिकारियों (Expert Officers) की नियुक्ति करें जो बदलती हुई आधुनिक तकनीकों को गहराई से समझते हों और साइबर व भौतिक सुरक्षा के खतरों से निपटने में सक्षम हों। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि NTA ने अपने ढीले रवैये में तुरंत सुधार नहीं किया, तो देश की शिक्षा प्रणाली और राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं की विश्वसनीयता पूरी तरह समाप्त हो जाएगी।

NTA का आउटसोर्सिंग मॉडल और संसदीय समिति की चिंताएं

सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) के पास इतने बड़े पैमाने पर परीक्षाएं आयोजित कराने के लिए पर्याप्त स्थायी जनशक्ति (Manpower) नहीं है। एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से प्राप्त जानकारी के अनुसार, एजेंसी अपनी स्थापना के बाद से ही निजी वेंडरों, बाहरी ठेकेदारों और संविदा कर्मचारियों (Contractual Employees) पर अत्यधिक निर्भर रही है। परीक्षा से जुड़े अलग-अलग काम जैसे- डेटा मैनेजमेंट, परीक्षा केंद्रों का आवंटन, और OMR शीट की छपाई आदि विभिन्न निजी एजेंसियों को आउटसोर्स किए जाते हैं। इस वजह से जब भी कोई गड़बड़ी होती है, तो जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो जाता है और जवाबदेही की कड़ियां टूट जाती हैं। दिसंबर 2025 में आई एक संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए भी अदालत में चर्चा हुई, जिसमें बताया गया था कि NTA द्वारा आयोजित की जाने वाली 14 प्रमुख राष्ट्रीय परीक्षाओं में से कम से कम 5 परीक्षाओं में पेपर लीक, प्रश्न-पत्रों में गलतियां, या नतीजों में देरी जैसी गंभीर समस्याएं देखी गईं। संसदीय समिति ने भी तब एजेंसी को कड़ी फटकार लगाते हुए अपने कामकाज को जल्द से जल्द दुरुस्त करने के लिए कहा था।

भविष्य के बड़े सुधार: 2027 से पूरी तरह ऑनलाइन (CBT) हो सकती है NEET परीक्षा

NEET- UG परीक्षा में बार-बार हो रहे विवादों को जड़ से खत्म करने के लिए केंद्र सरकार और NTA अब बड़े नीतिगत बदलावों पर विचार कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए दस्तावेजों के अनुसार, राधाकृष्णन कमेटी ने अपनी सिफारिशों में स्पष्ट कहा है कि पारंपरिक पेन-एंड-पेपर (Pen-and-Paper) मोड ही इस पूरी चयन प्रक्रिया की सबसे कमजोर कड़ी है, क्योंकि इसमें प्रश्न-पत्रों की छपाई, परिवहन और उन्हें फिजिकल लॉकरों में रखने के दौरान लीक होने का सबसे ज्यादा खतरा रहता है। इस समस्या के समाधान के रूप में, NTA ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया है कि वह वर्ष 2027 से नीट-यूजी परीक्षा को पूरी तरह से कंप्यूटर आधारित टेस्ट (CBT – Computer Based Test) मोड में स्थानांतरित करने पर गंभीरता से विचार कर रही है। सरकार नीट परीक्षा को इंजीनियरिंग की जेईई (JEE) परीक्षा की तर्ज पर दो चरणों (Two-Stage Format) में आयोजित करने की संभावनाओं पर भी विचार कर रही है। इससे परीक्षा का प्रबंधन आसान होगा और छात्रों की भारी भीड़ को नियंत्रित कर सुरक्षा को और कड़ा किया जा सकेगा।

छात्रों और परिवारों पर मानसिक व आर्थिक आघात

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के अंत में इस पूरे विवाद के मानवीय पहलू पर भी गहरी चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि नीट परीक्षा केवल एक प्रतियोगिता नहीं है, बल्कि यह देश के 24 लाख से अधिक छात्रों और उनके परिवारों के सपनों, उनकी दिन-रात की मेहनत और खून-पसीने की कमाई से जुड़ी हुई है। छात्र देश के दूरदराज के इलाकों से, कोटा जैसे कोचिंग हबों में भारी-भरकम कर्ज लेकर सालों तक तैयारी करते हैं। ऐसे में जब परीक्षा के आयोजन में थोड़ी सी भी लापरवाही या पेपर लीक की खबरें आती हैं, तो यह पूरे छात्र समुदाय को मानसिक रूप से तोड़ कर रख देती हैं।

छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य से खिलवाड़ नहीं

न्यायालय ने कहा कि परीक्षाओं को रद्द करना या दोबारा परीक्षा (Re-exam) कराना अंतिम विकल्प होना चाहिए, क्योंकि इससे ईमानदार छात्रों को भारी मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में एक भी मेधावी छात्र के साथ अन्याय न हो। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र और एनटीए को निर्देश दिया है कि वे राधाकृष्णन समिति की सभी सिफारिशों को चरणबद्ध तरीके से लागू करने का एक विस्तृत टाइमलाइन ढांचा कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करें।

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