मुंबई में आवारा कुत्तों के लिए बनेगी नई व्यवस्था, 1,000 कुत्तों की आजीवन देखभाल, कुत्तों के काटने की बढ़ती घटनाओं के बीच BMC की योजना
मुंबई में आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या और उनसे जुड़े सुरक्षा संबंधी सवालों के बीच बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) ने 1,000 आवारा कुत्तों के लिए आजीवन आश्रय की व्यवस्था करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। महानगरपालिका ने पहले चरण में संवेदनशील सार्वजनिक स्थानों से हटाए जाने वाले 1,000 कुत्तों को निजी संस्था के आश्रय केंद्र में रखने का निर्णय लिया है। इन कुत्तों के भोजन, चिकित्सा उपचार, देखभाल और अन्य आवश्यक सुविधाओं पर दो वर्ष में करीब ₹13 करोड़ 35 लाख 17 हजार खर्च प्रस्तावित है। इस संबंध में प्रस्ताव मंजूरी के लिए स्थायी समिति के समक्ष रखा जाना है।
यह कदम विशेष रूप से उन आवारा कुत्तों के लिए उठाया जा रहा है, जो स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, रेलवे स्टेशन, बस डिपो, खेल परिसरों और अन्य संवेदनशील सार्वजनिक स्थानों में पाए जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2025 के निर्देशों के बाद ऐसे स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाकर निर्धारित आश्रय केंद्रों में रखने की जिम्मेदारी स्थानीय निकायों पर बढ़ी है। अदालत ने स्पष्ट किया था कि इन स्थानों से पकड़े गए कुत्तों को नसबंदी और टीकाकरण के बाद उसी जगह दोबारा नहीं छोड़ा जा सकता।
90 हजार से ज्यादा आवारा कुत्ते
मुंबई में आवारा कुत्तों की संख्या काफी बड़ी है। 2024 में किए गए सर्वेक्षण के अनुसार शहर में करीब 90,757 आवारा कुत्ते पाए गए थे। इससे पहले 2014 में इनकी संख्या करीब 95,172 दर्ज की गई थी। महानगरपालिका लंबे समय से नसबंदी और रेबीजरोधी टीकाकरण के माध्यम से आवारा कुत्तों की संख्या और रेबीज के खतरे को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है। महानगरपालिका के अनुसार अप्रैल 2024 से अप्रैल 2025 के बीच 25,211 कुत्तों की नसबंदी की गई थी। इसके बाद अगले करीब आठ महीनों में लगभग 12,000 और कुत्तों की नसबंदी की गई। इस तरह करीब 18 महीनों में लगभग 37,000 कुत्तों की नसबंदी हुई। इसी अवधि में नसबंदी और रेबीजरोधी टीकाकरण पर करीब ₹6.5 करोड़ खर्च किए गए। वर्ष 2026 तक करीब 1,00,235 आवारा कुत्तों को रेबीजरोधी टीका लगाए जाने की जानकारी भी महानगरपालिका ने दी है।
नसबंदी के बाद अब वापस नहीं छोड़ने की व्यवस्था
अब तक मुंबई में आवारा कुत्तों के प्रबंधन की मुख्य व्यवस्था पकड़ने, नसबंदी करने, रेबीजरोधी टीका लगाने और फिर उन्हें उसी इलाके में छोड़ने पर आधारित रही है। लेकिन संवेदनशील संस्थागत परिसरों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद इस व्यवस्था में बड़ा बदलाव करना पड़ रहा है। नई व्यवस्था के तहत स्कूल, अस्पताल, रेलवे स्टेशन, बस डिपो और खेल परिसरों जैसे स्थानों से पकड़े गए कुत्तों की पहले आवश्यक चिकित्सकीय जांच, नसबंदी और टीकाकरण किया जाएगा। इसके बाद उन्हें उसी परिसर या आसपास के इलाके में छोड़ने के बजाय आश्रय केंद्र में रखा जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने भी मई 2026 में अपने नवंबर 2025 के निर्देशों को बरकरार रखते हुए कहा था कि संवेदनशील संस्थागत क्षेत्रों से हटाए गए आवारा कुत्तों को नसबंदी के बाद वापस उन्हीं स्थानों पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
प्रति कुत्ता प्रतिदिन ₹155 का खर्च
BMC ने इस काम के लिए निजी संस्थाओं से ई-निविदाएं आमंत्रित की थीं। प्राप्त प्रस्तावों में जेनिस शिफ्ट एनिमल वेलफेयर ट्रस्ट ने तकनीकी मूल्यांकन में 100 में से 100 अंक हासिल किए और प्रति कुत्ता प्रतिदिन औसतन ₹155 की सबसे कम दर पेश की। इसी आधार पर पहले चरण में 1,000 कुत्तों की देखभाल की जिम्मेदारी निजी संस्था को सौंपने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। एक कुत्ते के लिए प्रतिदिन ₹155 के हिसाब से 1,000 कुत्तों पर सालाना खर्च करीब ₹5.66 करोड़ बैठता है। दो वर्षों का मूल खर्च करीब ₹11.31 करोड़ होता है, जबकि प्रस्तावित कुल राशि में जीएसटी सहित करीब ₹13.35 करोड़ खर्च का प्रावधान है। इसके अलावा अनुमान लगाया गया है कि यदि इन कुत्तों की शेष संभावित आयु औसतन नौ वर्ष मानी जाए तो लंबे समय में प्रति कुत्ता करीब ₹6 लाख तक खर्च हो सकता है।
भोजन से लेकर चिकित्सा तक की जिम्मेदारी
आश्रय केंद्र चलाने वाली संस्था के लिए केवल कुत्तों को रखने की व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी। प्रस्ताव के अनुसार उन्हें दिन में दो बार पौष्टिक भोजन, पर्याप्त स्वच्छ पानी और नियमित पशु चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करानी होगी। बीमार या घायल कुत्तों के उपचार के लिए आवश्यक चिकित्सकीय व्यवस्था भी आश्रय केंद्र में रखनी होगी। इसके साथ ही प्रत्येक कुत्ते का रिकॉर्ड व्यवस्थित तरीके से रखने पर भी जोर दिया गया है। कंप्यूटरीकृत रिकॉर्ड और भौगोलिक स्थान निर्धारण तकनीक के जरिए कुत्तों की पहचान, उनके पकड़े जाने का स्थान, चिकित्सा स्थिति, नसबंदी और टीकाकरण जैसी जानकारियां दर्ज की जाएंगी। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि कोई कुत्ता किस क्षेत्र से लाया गया और उसे किस प्रक्रिया के तहत आश्रय केंद्र में रखा गया है।
मुंबई में स्थायी आश्रय की कमी बड़ी चुनौती
इस योजना की जरूरत इसलिए भी महसूस हुई क्योंकि मुंबई महानगरपालिका के पास फिलहाल पर्याप्त स्थायी आवारा कुत्ता आश्रय व्यवस्था नहीं है। इस साल BMC ने मुंबई में बड़े आश्रय केंद्र की योजना भी बनाई थी। अप्रैल में महानगरपालिका ने पशु कल्याण संस्थाओं से प्रस्ताव मंगाकर कम से कम 3,000 कुत्तों की क्षमता वाला आश्रय केंद्र विकसित करने की योजना सामने रखी थी। इसमें पशु चिकित्सक, भोजन व्यवस्था, केनेल, अलग रखने के लिए कक्ष और उपचार की सुविधाएं प्रस्तावित थीं। मालवणी में ऐसे बड़े आश्रय केंद्र की योजना पर भी काम किया गया है। हालांकि जमीन उपलब्ध कराने और स्थानीय स्तर पर विरोध जैसी समस्याओं के कारण परियोजना को आगे बढ़ाने में कठिनाई सामने आई है। सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार BMC मुंबई से बाहर भी जमीन तलाशने पर विचार कर रही थी, क्योंकि शहर के भीतर आश्रय केंद्र के लिए उपयुक्त जमीन जुटाना चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।
कुत्तों की सुरक्षा और नागरिकों की चिंता के बीच संतुलन
आवारा कुत्तों को लेकर मुंबई में दो प्रमुख चिंताएं सामने आती रही हैं। एक ओर नागरिकों की सुरक्षा, कुत्तों के काटने की घटनाएं और रेबीज का खतरा है, तो दूसरी ओर पशु अधिकार संगठनों की चिंता है कि कुत्तों को पकड़कर बड़ी संख्या में एक ही आश्रय केंद्र में रखने से उनकी सेहत और व्यवहार पर विपरीत असर पड़ सकता है। BMC के अनुसार मुंबई में वर्ष 2025 में 1,54,017 कुत्ते के काटने के मामले दर्ज हुए थे। इस वजह से आवारा कुत्तों के प्रबंधन को सार्वजनिक स्वास्थ्य और नागरिक सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है। महानगरपालिका ने 2030 तक मुंबई को रेबीज-मुक्त बनाने का लक्ष्य भी रखा है। हालांकि पशु कल्याण विशेषज्ञों ने बड़े आश्रय केंद्रों की व्यावहारिकता को लेकर सावधानी बरतने की जरूरत बताई है। कुत्ते क्षेत्रीय स्वभाव के होते हैं और बड़ी संख्या में उन्हें एक स्थान पर रखने पर आपसी संघर्ष तथा संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए आश्रय केंद्रों में पर्याप्त जगह, अलग-अलग समूहों के लिए सुरक्षित व्यवस्था, साफ-सफाई और चिकित्सा निगरानी बेहद महत्वपूर्ण होगी।
1,000 कुत्तों से शुरुआत, आगे बढ़ सकता है दायरा
BMC का मौजूदा प्रस्ताव 1,000 कुत्तों के लिए है, लेकिन शहर में आवारा कुत्तों की कुल संख्या इसके मुकाबले बहुत अधिक है। इसलिए इसे समस्या के पूर्ण समाधान के बजाय शुरुआती चरण के रूप में देखा जा सकता है। यदि यह व्यवस्था प्रभावी रहती है तो भविष्य में आश्रय क्षमता बढ़ाने और अधिक संवेदनशील इलाकों से कुत्तों को हटाने की आवश्यकता पड़ सकती है। साथ ही, केवल आश्रय केंद्र बनाना पर्याप्त नहीं होगा। नसबंदी का लगातार विस्तार, बड़े पैमाने पर रेबीजरोधी टीकाकरण, कुत्तों की नियमित निगरानी, नागरिक शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई और कुत्तों के व्यवहार से संबंधित शिकायतों का वैज्ञानिक प्रबंधन भी जरूरी होगा। BMC के पशु चिकित्सा स्वास्थ्य विभाग की मौजूदा व्यवस्था में पशु कल्याण संस्थाओं और कुत्तों की देखभाल करने वालों के लिए दिशा-निर्देश भी उपलब्ध हैं।
सार्वजनिक सुरक्षा और पशु कल्याण एक साथ
इस पूरी योजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सार्वजनिक सुरक्षा और पशु कल्याण को एक-दूसरे के विरोध में रखने के बजाय दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की जा रही है। संवेदनशील सार्वजनिक स्थानों को सुरक्षित रखने के लिए कुत्तों को हटाना आवश्यक होने पर उनके भोजन, इलाज और जीवनभर देखभाल की जिम्मेदारी भी तय करनी होगी। BMC का ₹13.35 करोड़ का प्रस्ताव इसी दिशा में उठाया गया कदम है। हालांकि अंतिम रूप से यह व्यवस्था कितनी प्रभावी होगी, यह आश्रय केंद्र की वास्तविक क्षमता, निगरानी, चिकित्सा सुविधाओं और निजी संस्था के कामकाज पर निर्भर करेगा।
नोट: ₹13.35 करोड़ की राशि फिलहाल प्रस्तावित दो-वर्षीय खर्च है; इसे 1,000 कुत्तों की पूरी जीवनभर की कुल लागत नहीं समझना चाहिए। प्रस्ताव में लंबे समय तक देखभाल के लिए अलग अनुमान दिया गया है।
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