स्मार्ट सिस्टम, पुरानी सुस्ती: गोरखपुर नगर निगम के ऑनलाइन दावों की जमीनी हकीकत

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गोरखपुर नगर निगम का डिजिटल सिस्टम: शिकायत ऑनलाइन, लेकिन समाधान का इंतजार जारी

उत्तर प्रदेश का प्रमुख महानगर और तेजी से विकसित हो रहा गोरखपुर शहर डिजिटल इंडिया की दौड़ में कदम तो बढ़ा चुका है, लेकिन नगर निगम की प्रशासनिक रफ्तार इस आधुनिक बदलाव से मेल नहीं खा पा रही है। गोरखपुर नगर निगम का डिजिटल सिस्टम फाइलों और पोर्टल पर तो बेहद सक्रिय नजर आता है, लेकिन आम जनता के लिए आज भी समस्याओं का समाधान एक लंबा इंतजार बना हुआ है। सरकार ने नागरिकों की सहूलियत के लिए सीएम डैशबोर्ड, जनसुनवाई-IGRS पोर्टल, और नगर निगम की अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर ऑनलाइन शिकायत दर्ज करने की व्यवस्था शुरू की है। इसके बावजूद, धरातल पर स्थिति यह है कि माउस के एक क्लिक पर शिकायत तो दर्ज हो जाती है, मगर उसका निवारण करने में निगम के अधिकारियों को हफ्तों और महीनों लग जाते हैं।

ऑनलाइन व्यवस्था: सिर्फ तकनीकी औपचारिकता?

गोरखपुर को स्मार्ट सिटी (Smart City) बनाने की दिशा में नगर निगम ने अपनी कई सेवाओं को ऑनलाइन किया है। नागरिक अब घर बैठे नगर निगम गोरखपुर की वेबसाइट पर जाकर हाउस टैक्स देखने, पानी का बिल भरने या फिर साफ-सफाई, फॉगिंग, और स्ट्रीट लाइट से जुड़ी शिकायतें दर्ज कराने की सुविधा पा चुके हैं। सरकार का दावा था कि इस डिजिटल पहल से जनता को नगर निगम के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे और बिचौलियों से मुक्ति मिलेगी। तकनीकी रूप से यह प्रणाली बहुत आसान दिखती है। शिकायतकर्ता को एक यूनिक शिकायत संख्या (Complaint ID) मिल जाती है और उनके मोबाइल पर संदेश आता है कि आपकी शिकायत संबंधित अधिकारी को भेज दी गई है। लेकिन असल खेल यहीं से शुरू होता है। ऑनलाइन रिकॉर्ड में शिकायतें ‘लंबित’ (Pending) या ‘अग्रसारित’ (Forwarded) दिखती रहती हैं, लेकिन वार्डों में सफाईकर्मी या मरम्मत दल नहीं पहुंचता।

शिकायत दर्ज, पर समाधान गायब: वार्डों का हाल

गोरखपुर के विभिन्न वार्डों जैसे कि शाहपुर, बिछिया, मोहद्दीपुर और तिवारीपुर के स्थानीय निवासियों से बात करने पर डिजिटल सिस्टम की जमीनी हकीकत सामने आती है। शाहपुर के एक निवासी ने बताया, “मैंने गली में जलजमाव और नाली टूटने की शिकायत जनसुनवाई पोर्टल पर दर्ज की थी। तीन दिन बाद मेरे फोन पर मैसेज आया कि आपकी शिकायत का निस्तारण कर दिया गया है। जब मैंने नाली देखी, तो वह वैसी ही टूटी पड़ी थी। नगर निगम के कर्मचारियों ने दफ्तर में बैठकर ही फर्जी रिपोर्ट लगा दी कि काम पूरा हो गया है।” यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। शहर के सैकड़ों नागरिक इस बात से परेशान हैं कि अधिकारी कागजी कोरम पूरा करने और रैंकिंग सुधारने के लिए शिकायतों को बिना काम किए ही ‘निस्तारित’ (Disposed) श्रेणी में डाल देते हैं। जब नागरिक इस पर आपत्ति जताते हैं, तो उन्हें दोबारा शिकायत करने या जनसुनवाई पोर्टल पर रिमाइंडर भेजने की सलाह दी जाती है, जिससे समय की बर्बादी के अलावा कुछ हासिल नहीं होता।

तकनीकी खामियां और जागरूकता का अभाव

डिजिटल सिस्टम के असफल होने के पीछे केवल प्रशासनिक लापरवाही ही नहीं, बल्कि तकनीकी खामियां भी हैं। कई बार नगर निगम का सर्वर डाउन रहता है, जिससे ऑनलाइन टैक्स भुगतान या शिकायत दर्ज करने में दिक्कतें आती हैं। इसके अलावा, गोरखपुर के कई ऐसे पिछड़े और मलिन बस्तियों वाले इलाके हैं जहां के निवासी स्मार्टफोन या इंटरनेट का उपयोग करना नहीं जानते। उनके लिए यह डिजिटल सिस्टम किसी काम का नहीं है। जब वे अपनी शिकायत लेकर नगर निगम कार्यालय जाते हैं, तो उन्हें ऑनलाइन आवेदन करने की बात कहकर वापस भेज दिया जाता है।

प्रशासनिक फेरबदल और जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना

हाल के दिनों में गोरखपुर में प्रशासनिक स्तर पर कई बदलाव देखे गए हैं, जिसमें नगर आयुक्तों के तबादले भी शामिल हैं। अधिकारियों के बदलने से कई बार पुरानी योजनाओं और पेंडिंग शिकायतों की फाइलों पर धूल जम जाती है। नए अधिकारी को व्यवस्था समझने में समय लगता है, और इस दौरान निचले स्तर के कर्मचारी (जैसे बाबू और सफाई निरीक्षक) अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। जब जनता जोनल कार्यालयों में संपर्क करती है, तो कर्मचारी यह कहकर टाल देते हैं कि “मामला उच्च अधिकारियों के संज्ञान में है और डिजिटल माध्यम से ही आगे बढ़ेगा।”

डिजिटल सिस्टम को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक कदम

गोरखपुर नगर निगम की इस सुस्त रफ्तार को बदलने और डिजिटल सिस्टम को वास्तव में जनता के लिए उपयोगी बनाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने अत्यंत आवश्यक हैं:
1. फिजिकल वेरिफिकेशन (धरातली सत्यापन): किसी भी शिकायत को क्लोज या निस्तारित करने से पहले अधिकारियों को मौके की जियो-टैग्ड तस्वीर (Geo-tagged Photo) अपलोड करना अनिवार्य किया जाना चाहिए, ताकि कागजी फर्जीवाड़े पर रोक लग सके।
2. जवाबदेही तय हो: यदि किसी शिकायत का निवारण तय समय सीमा (SLA) के भीतर नहीं होता है, तो संबंधित वार्ड के जिम्मेदार अधिकारी या कर्मचारी के वेतन से कटौती की जानी चाहिए।
3. हेल्पडेस्क की स्थापना: नगर निगम कार्यालय और सभी वार्डों में एक समर्पित डिजिटल सहायता केंद्र होना चाहिए, जो इंटरनेट से अपरिचित नागरिकों की शिकायतें ऑनलाइन दर्ज करने में मदद करे।
4. फीडबैक सिस्टम: शिकायत बंद होने के बाद सीधे शिकायतकर्ता से कॉल के जरिए फीडबैक लिया जाए। यदि नागरिक असंतुष्ट है, तो शिकायत स्वतः उच्च अधिकारियों के पास ट्रांसफर हो जानी चाहिए।

प्रशासन भी हो स्मार्ट

डिजिटल सिस्टम निश्चित रूप से एक सराहनीय कदम है, लेकिन यह केवल तभी सफल हो सकता है जब इसके पीछे काम करने वाली प्रशासनिक मशीनरी भी उतनी ही ‘स्मार्ट’ और संवेदनशील हो। गोरखपुर की जनता टैक्स समय पर दे रही है और तकनीक को भी अपना रही है, अब बारी गोरखपुर नगर निगम की है कि वह अपनी फाइलों से बाहर निकलकर धरातल पर काम दिखाए, ताकि लोगों को अपनी जायज समस्याओं के समाधान के लिए अंतहीन इंतजार न करना पड़े।

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