40 साल बाद बदली बालाघाट की तस्वीर, नक्सल प्रभावित गांवों में पहुंची मेडिकल टीम, 125 बच्चे इलाज के बाद स्वस्थ

The CSR Journal Magazine
मध्य प्रदेश का बालाघाट लंबे समय तक नक्सलवाद की वजह से विकास और सरकारी सुविधाओं की पहुंच से जूझता रहा है। खासकर बिरसा ब्लॉक के दूरदराज के गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बड़ी चुनौती रही। अब नक्सल गतिविधियों के कमजोर पड़ने के बाद इन इलाकों में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था तेजी से पहुंच रही है। स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने गांव-गांव पहुंचकर बच्चों और ग्रामीणों की जांच शुरू की है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले एक महीने में विभिन्न बीमारियों से पीड़ित 169 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जिनमें से 125 बच्चे स्वस्थ होकर घर लौट चुके हैं।

जहां डॉक्टर पहुंचना था मुश्किल, वहां घर-घर हो रही जांच

बिरसा विकासखंड के कुंडेकसा, अडोरी, कोरका, बांदरी, बोंदारी, घुम्मुर, मछुरदा, गठिया और मातला समेत कई गांव लंबे समय तक नक्सल गतिविधियों से प्रभावित रहे हैं। ऐसे इलाकों में सरकारी कर्मचारियों और स्वास्थ्य टीमों की नियमित पहुंच आसान नहीं थी। अब स्वास्थ्य विभाग ने इन गांवों में घर-घर सर्वे शुरू किया है। 20 सर्वे टीम लगातार ग्रामीणों की स्वास्थ्य जांच कर रही हैं। इसके अलावा 4 मोबाइल मेडिकल यूनिट, 10 चिकित्सा अधिकारी और 4 एंबुलेंस तैनात की गई हैं।

169 बच्चों का अस्पताल में इलाज, 125 स्वस्थ

स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, कुंडेकसा, अडोरी, कोरका और बांदरी में सर्दी-खांसी, बुखार, त्वचा संबंधी बीमारी, मीजल्स, स्कैबीज, मलेरिया और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित बच्चों की पहचान की गई। कुल 169 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। इनमें 125 बच्चे इलाज पूरा होने के बाद स्वस्थ होकर अपने गांव लौट चुके हैं, जबकि 44 बच्चों का उपचार जारी है। विभाग के अनुसार अस्पताल में उपचाररत बच्चों की हालत भी ठीक है।

630 मरीज मिले, 461 का घर पर ही इलाज

स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने अब तक अलग-अलग बीमारियों से पीड़ित 630 मरीजों की पहचान की है। इनमें 125 मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जबकि 461 मरीजों का इलाज उनके घर पर ही किया गया और वे स्वस्थ हो चुके हैं। इस अभियान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि स्वास्थ्य विभाग पहली बार इन दूरदराज के इलाकों में नियमित मेडिकल रिकॉर्ड तैयार कर रहा है। इससे बीमारी के पैटर्न को समझने और समय पर उपचार उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।

980 घरों तक पहुंचा स्वास्थ्य सुरक्षा अभियान

स्वास्थ्य विभाग ने करीब 10 गांवों के 980 घरों में स्वास्थ्य सर्वे और सुरक्षा अभियान चलाया है। इस दौरान बच्चों को विटामिन-A, ORS और जिंक की खुराक दी गई। 597 बच्चों को आयरन सिरप और 521 बच्चों को अल्बेंडाजोल की गोली दी गई। वहीं 63 बच्चों को मीजल्स का टीका लगाया गया। बीमारियों की रोकथाम के लिए गांवों में कीटनाशक छिड़काव, इंडोर-आउटडोर फॉगिंग और लार्वा सर्वे भी किया गया है।

नक्सल प्रभावित क्षेत्र में स्वास्थ्य व्यवस्था की नई चुनौती

बालाघाट में दशकों तक नक्सल गतिविधियों ने सरकारी सेवाओं की पहुंच को प्रभावित किया। अब सुरक्षा स्थिति में सुधार के बाद प्रशासन के सामने अगली बड़ी चुनौती इन इलाकों में स्वास्थ्य, शिक्षा और दूसरी सरकारी सुविधाओं को स्थायी रूप से पहुंचाना है। स्वास्थ्य विभाग का यह अभियान इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। घर-घर सर्वे, मोबाइल मेडिकल यूनिट और अस्पतालों में भर्ती की व्यवस्था से उन परिवारों तक भी इलाज पहुंच रहा है, जो लंबे समय तक स्वास्थ्य सेवाओं से दूर रहे।

बीमारी की पहचान से इलाज तक बदली व्यवस्था

बालाघाट की चुनौती केवल बीमारी का इलाज करना नहीं है, बल्कि ऐसे इलाकों में लोगों का भरोसा जीतना भी है जहां दशकों तक सरकारी व्यवस्था की पहुंच सीमित रही। स्वास्थ्य विभाग की टीमें लगातार ग्रामीणों से संपर्क कर उन्हें समय पर अस्पताल पहुंचने और बीमारी को छिपाने के बजाय उसका इलाज कराने के लिए जागरूक कर रही हैं। बालाघाट में चुनौती बड़ी है, लेकिन अब बदलाव की तस्वीर भी दिखाई दे रही है। जिस इलाके में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच कभी सबसे बड़ी समस्या थी, वहां आज डॉक्टर, मोबाइल मेडिकल यूनिट और स्वास्थ्यकर्मी घर-घर पहुंचकर बच्चों की जांच और इलाज कर रहे हैं।
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