पशुपालक सावधान! छोटी-छोटी गलतियां पशुओं को कर सकती हैं बीमार

The CSR Journal Magazine

पशुपालन में लापरवाही का खामियाजा

पशुपालन एक संवेदनशील क्षेत्र है जहां छोटी-छोटी लापरवाहियां बड़े आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती हैं। पशुओं के स्वास्थ्य और दूध उत्पादन पर सीधा असर डालने वाली कई गलतियां होती हैं। जैसे कि अचानक आहार में बदलाव, पर्याप्त पानी न देना, समय पर कीड़े मारने की दवा न देना, और नवजात बछड़े को समय पर खीस (पहला दूध) न पिलाना। पशु चिकित्सकों का कहना है कि यदि पशुपालक कुछ सामान्य नियमों का पालन करें, तो पशुओं को लंबे समय तक स्वस्थ रखा जा सकता है और दूध उत्पादन में भी वृद्धि हो सकती है।

आहार में बदलाव से बचें

पशु चिकित्सक विशाल प्रजापति के अनुसार, पशुओं का चारा या दाना एकदम बदल देना सबसे बड़ी गलती है। इससे पशुओं में आफरा, पेट फूलना और दस्त जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए जब भी दाना या चारा बदलना हो, तो इसे धीरे-धीरे 7 से 10 दिनों में बदलें। शुरुआत में पुराने चारे में केवल 10 से 20 प्रतिशत नया दाना मिलाएं और फिर प्रतिदिन उसकी मात्रा बढ़ाते जाएं। इससे पशु का पाचन तंत्र नए आहार के अनुरूप आसानी से ढल जाता है।

पानी का महत्व

दूध का लगभग 87 प्रतिशत हिस्सा पानी होता है। ऐसे में यदि पशु को पर्याप्त पानी नहीं मिलेगा, तो दूध उत्पादन स्वतः कम हो जाएगा। कई पशुपालक दिन में केवल सुबह और शाम ही पानी पिलाते हैं, जबकि पशु को जब भी प्यास लगे, उसे पानी उपलब्ध होना चाहिए। इसलिए पानी की खेली या टंकी हमेशा पशु की पहुंच में रखनी चाहिए, ताकि वह दिनभर अपनी जरूरत के अनुसार पानी पी सके।

कृमिनाशक दवा का नियमित प्रयोग

पशुओं को स्वस्थ रखने के लिए नियमित रूप से कृमिनाशक दवा देना भी जरूरी है। विशाल प्रजापति बताते हैं कि बड़े पशुओं को हर 3 से 4 महीने में कीड़े मारने की दवा जरूर दी जानी चाहिए। वहीं, गाभिन पशुओं को किसी भी प्रकार की दवा देने से पहले पशु चिकित्सक की सलाह लेना आवश्यक है, ताकि गर्भस्थ शिशु पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

पशुशाला की साफ-सफाई

पशुशाला की साफ-सफाई और फर्श की स्थिति भी पशुओं के स्वास्थ्य में अहम भूमिका निभाती है। यदि पशु लगातार गीले या चिकने फर्श पर बैठते हैं, तो थनों में बैक्टीरिया प्रवेश कर सकते हैं, जिससे थनैला (मैस्टाइटिस) रोग होने का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, फिसलन वाले फर्श पर पशु चोटिल भी हो सकते हैं। इसलिए बैठने की जगह हमेशा सूखी रखें। पक्के फर्श पर रबर मैट बिछाएं या सूखी रेत एवं मिट्टी का उपयोग करें और इसे नियमित रूप से बदलते रहें।

नवजात बछड़े की देखभाल

विशाल प्रजापति ने नवजात बछड़ों को लेकर फैली एक गलत धारणा को भी दूर किया। कई पशुपालक जेर गिरने तक बछड़े को दूध नहीं पिलाते, जबकि यह सही नहीं है। जन्म के एक से दो घंटे के भीतर नवजात को मां का पहला दूध यानी खीस जरूर पिलाना चाहिए। यह प्राकृतिक टीके की तरह काम करता है और बछड़े की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है।

स्वास्थ्य पर ध्यान दें

पशुपालकों को चाहिए कि वे अपने पशुओं के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दें। सही आहार, पर्याप्त पानी, नियमित दवा और साफ-सफाई से न केवल पशुओं की सेहत में सुधार होगा, बल्कि दूध उत्पादन में भी वृद्धि होगी। पशुपालकों को इन बुनियादी बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि उनके पशु स्वस्थ रहें और आर्थिक लाभ भी हो सके।

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