कर्नाटक की ऋतु थारे पहल: अब रजोनिवृत्ति पर चुप्पी नहीं, घर-घर जांच और सरकारी इलाज की तैयारी

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कर्नाटक में महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर बड़ा कदम: ‘ऋतु थारे’ नीति में मासिक धर्म से लेकर रजोनिवृत्ति तक मिलेगी सरकारी स्वास्थ्य सेवा

रजोनिवृत्ति को ‘सामान्य उम्र का हिस्सा’ कहकर नजरअंदाज करने के बजाय अब जांच, परामर्श और उपचार पर जोर; आशा कार्यकर्ताओं के जरिए घर-घर पहुंचेगी जागरूकता! महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर कर्नाटक सरकार एक ऐसी व्यापक नीति तैयार कर रही है, जो महिलाओं के जीवन के उस दौर को सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा बनाने की कोशिश है, जिसे अब तक अक्सर निजी परेशानी या उम्र बढ़ने का स्वाभाविक असर मानकर नजरअंदाज किया जाता रहा है। प्रस्तावित ‘ऋतु थारे’ कार्यक्रम के तहत मासिक धर्म स्वास्थ्य, मासिक धर्म बंद होने से पहले का संक्रमणकाल और रजोनिवृत्ति के बाद की स्वास्थ्य जरूरतों को सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ने की योजना है। राज्य सरकार ने इसे देश में अपनी तरह की पहली व्यापक महिला स्वास्थ्य नीति के रूप में प्रस्तुत किया है।
कर्नाटक के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री यू.टी. खादर ने अगस्त 2026 में बेंगलुरु में आयोजित ‘स्वस्थ रजोनिवृत्ति, स्वस्थ महिला, स्वस्थ परिवार’ विषयक बैठक में इस पहल की घोषणा की थी। प्रस्तावित नीति में जागरूकता अभियान, शुरुआती स्तर पर लक्षणों की पहचान, जांच, परामर्श, जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ चिकित्सकीय सहायता और विशेष महिला स्वास्थ्य केंद्रों की व्यवस्था शामिल करने की योजना बताई गई है।

क्या है ‘ऋतु थारे’?

‘ऋतु थारे’ कर्नाटक सरकार की प्रस्तावित महिला स्वास्थ्य पहल है, जिसका प्रमुख उद्देश्य महिलाओं को उनके जीवन के मध्य और बाद के चरणों में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूक करना और समय पर चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना है। सरकार की योजना केवल अस्पतालों में इलाज उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहने की है। इसके तहत समुदाय के स्तर पर महिलाओं तक पहुंचने, उन्हें लक्षणों की जानकारी देने और जरूरत पड़ने पर स्वास्थ्य केंद्र तक भेजने की व्यवस्था विकसित करने की बात कही गई है। इस कार्यक्रम में आशा कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तावित है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से घर-घर जाकर महिलाओं से बातचीत, स्वास्थ्य संबंधी जानकारी जुटाने, रजोनिवृत्ति से पहले और बाद की अवस्था के बारे में समझाने तथा चिकित्सा सहायता की जरूरत वाली महिलाओं की शुरुआती पहचान करने की योजना है।

रजोनिवृत्ति आखिर है क्या?

रजोनिवृत्ति महिलाओं के जीवन की एक स्वाभाविक जैविक अवस्था है। सामान्य तौर पर जब लगातार 12 महीनों तक मासिक धर्म नहीं होता और इसका कोई अन्य चिकित्सकीय कारण नहीं होता, तब इसे रजोनिवृत्ति माना जाता है। हालांकि इसके पहले आने वाला संक्रमणकाल कई वर्षों तक चल सकता है। इस दौरान मासिक धर्म अनियमित होना, अचानक गर्मी महसूस होना, रात में पसीना आना, नींद में परेशानी, थकान, चिड़चिड़ापन, मनोदशा में बदलाव और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। कई महिलाएं इन लक्षणों को बीमारी न मानकर केवल उम्र बढ़ने का हिस्सा समझती हैं। यही वजह है कि समस्या होने के बावजूद वे चिकित्सकीय सलाह नहीं लेतीं। प्रस्तावित नीति का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य इसी चुप्पी और जानकारी की कमी को दूर करना है।

घर-घर पहुंचेंगी आशा कार्यकर्ता

‘ऋतु थारे’ की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक समुदाय आधारित स्वास्थ्य पहुंच है। योजना के अनुसार आशा कार्यकर्ताओं को इस विषय पर प्रशिक्षण दिया जाएगा और वे महिलाओं तक स्थानीय स्तर पर जानकारी पहुंचाने में मदद करेंगी। रिपोर्टों के मुताबिक आने वाले चरण में आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से घर-घर जाकर महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी जुटाने तथा शुरुआती पहचान के लिए एक निर्धारित प्रश्नावली या जांच सूची का इस्तेमाल करने की योजना है। इससे खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों की उन महिलाओं तक पहुंच बन सकती है, जो निजी अस्पतालों तक आसानी से नहीं पहुंच पातीं या जिनके लिए रजोनिवृत्ति से जुड़े लक्षणों को लेकर डॉक्टर से बात करना सामाजिक रूप से सहज नहीं होता। हालांकि आशा कार्यकर्ताओं का काम बीमारी का अंतिम निदान करना नहीं होगा। उनका मुख्य काम जागरूकता, शुरुआती पहचान और जरूरत पड़ने पर उचित स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाना होना चाहिए।

विशेष ‘मध्य आयु महिला स्वास्थ्य क्लीनिक’ की योजना

कर्नाटक सरकार ने महिलाओं के लिए विशेष मध्य आयु स्वास्थ्य क्लीनिक स्थापित करने की भी योजना बताई है। इन केंद्रों का उद्देश्य रजोनिवृत्ति से जुड़ी समस्याओं को केवल स्त्री रोग तक सीमित न रखते हुए महिला के समग्र स्वास्थ्य पर ध्यान देना होगा। इसमें जीवनशैली, पोषण, नींद, मानसिक स्वास्थ्य, हड्डियों के स्वास्थ्य और उम्र के साथ बढ़ने वाले अन्य स्वास्थ्य जोखिमों पर परामर्श की जरूरत पड़ सकती है। गंभीर या जटिल मामलों को जिला अस्पतालों तथा उच्च स्तरीय सरकारी चिकित्सा संस्थानों में भेजने के लिए संदर्भ व्यवस्था विकसित करना भी महत्वपूर्ण होगा।

महिलाओं को सिर्फ ‘सहन करने’ की सलाह से आगे बढ़ना होगा

रजोनिवृत्ति को लेकर समाज में एक पुरानी धारणा रही है कि यह हर महिला के जीवन में आने वाली सामान्य अवस्था है, इसलिए इससे जुड़ी परेशानियों के लिए चिकित्सा की जरूरत नहीं होती। यही सोच कई बार महिलाओं को उपचार से दूर कर देती है। विशेषज्ञों ने भी इस बात पर जोर दिया है कि रजोनिवृत्ति के दौरान दिखाई देने वाले लक्षणों को स्वतः ही सामान्य उम्र बढ़ने का हिस्सा मानकर छोड़ना उचित नहीं है। कर्नाटक सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति का नेतृत्व स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. ज्योत्सना मिरले कर रही हैं, जो रजोनिवृत्ति और मध्य आयु की महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी विशेषज्ञता रखती हैं। समिति से कार्यक्रम के लिए वैज्ञानिक दिशा-निर्देश तैयार करने की अपेक्षा है।

नींद और मानसिक स्वास्थ्य पर भी होगा जोर

रजोनिवृत्ति को केवल मासिक धर्म बंद होने की प्रक्रिया के रूप में देखना अधूरा दृष्टिकोण होगा। इस दौरान कई महिलाओं को नींद की समस्या, थकान, चिंता, मनोदशा में बदलाव और एकाग्रता से संबंधित परेशानी हो सकती है। इसीलिए प्रस्तावित नीति में मानसिक स्वास्थ्य और स्वस्थ जीवनशैली को भी शामिल किए जाने की बात सामने आई है। महिलाओं को पर्याप्त नींद, संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि और स्वयं की देखभाल के बारे में जानकारी देने की योजना है। इसका महत्व इसलिए भी है क्योंकि मध्य आयु के दौरान महिलाओं में कई गैर-संचारी रोगों से जुड़े जोखिम भी सामने आ सकते हैं। इसलिए रजोनिवृत्ति देखभाल को व्यापक महिला स्वास्थ्य कार्यक्रम से जोड़ना अधिक उपयोगी हो सकता है।

नीति बनाने के लिए विशेषज्ञ समिति

कर्नाटक सरकार ने इस पहल को वैज्ञानिक आधार देने के लिए विशेषज्ञ समिति गठित की है। समिति की अध्यक्षता डॉ. ज्योत्सना मिरले को दी गई है। समिति का उद्देश्य कार्यक्रम के लिए वैज्ञानिक सिफारिशें और स्वास्थ्य संबंधी दिशा-निर्देश तैयार करना है। यह पहल महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि रजोनिवृत्ति से जुड़ी हर समस्या का इलाज एक जैसा नहीं हो सकता। किसी महिला को केवल जीवनशैली में बदलाव और परामर्श की आवश्यकता हो सकती है, जबकि दूसरी महिला को चिकित्सकीय जांच और विशेषज्ञ उपचार की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए अंतिम नीति में यह स्पष्ट करना जरूरी होगा कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से लेकर विशेषज्ञ अस्पताल तक मरीजों की जांच और उपचार की पूरी व्यवस्था कैसे काम करेगी।

अभिनेत्री रम्या होंगी जागरूकता अभियान का चेहरा

कर्नाटक सरकार ने अभिनेत्री और पूर्व सांसद रम्या को इस अभियान का ब्रांड एंबेसडर भी बनाया है। उनका इस्तेमाल व्यापक जन-जागरूकता अभियान के लिए किए जाने की योजना है। सरकार और अभियान से जुड़े लोगों का मानना है कि रजोनिवृत्ति के बारे में सार्वजनिक चर्चा बढ़ाना जरूरी है। शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में जागरूकता कार्यक्रम चलाने की योजना बताई गई है। किसी लोकप्रिय सार्वजनिक चेहरे को अभियान से जोड़ने का उद्देश्य यह हो सकता है कि महिलाएं इस विषय पर बिना झिझक बात करें और स्वास्थ्य सेवाओं का इस्तेमाल करने को लेकर संकोच कम हो।

महिला स्वास्थ्य का मतलब सिर्फ गर्भावस्था और मातृत्व नहीं

कर्नाटक की प्रस्तावित नीति एक बड़े बदलाव की ओर संकेत करती है। भारत में महिला स्वास्थ्य कार्यक्रमों का बड़ा हिस्सा लंबे समय तक मासिक धर्म, गर्भनिरोध, गर्भावस्था, प्रसव और मातृ स्वास्थ्य के आसपास केंद्रित रहा है। ये सभी अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं, लेकिन महिला के जीवन का बड़ा हिस्सा इन अवस्थाओं के बाहर भी होता है। मध्य आयु और रजोनिवृत्ति के बाद भी महिलाओं को लगातार स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत होती है। प्रस्तावित ‘ऋतु थारे’ इसी खाली जगह को भरने की कोशिश है।

क्या यह वास्तव में देश की पहली ऐसी नीति होगी?

कर्नाटक सरकार ने इसे देश में अपनी तरह की पहली व्यापक महिला स्वास्थ्य नीति के रूप में पेश किया है, जिसमें रजोनिवृत्ति पर विशेष ध्यान है। हालांकि इसे सावधानी से समझना जरूरी है। अन्य राज्यों में भी रजोनिवृत्ति से जुड़ी सरकारी सेवाओं और नीतिगत पहलों की शुरुआत हुई है। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु ने भी 2026 में रजोनिवृत्ति से पहले की अवस्था और उससे जुड़ी स्वास्थ्य जरूरतों के लिए नीति संबंधी घोषणा की है। इसलिए कर्नाटक की खासियत केवल रजोनिवृत्ति पर बात करना नहीं, बल्कि सामुदायिक पहुंच, शुरुआती पहचान, स्वास्थ्य केंद्रों और विशेषज्ञ देखभाल को एक व्यापक महिला स्वास्थ्य ढांचे में जोड़ने की प्रस्तावित कोशिश हो सकती है।

नीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी क्रियान्वयन

घोषणा महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी भी स्वास्थ्य नीति की असली सफलता उसके जमीन पर लागू होने से तय होती है। ‘ऋतु थारे’ को प्रभावी बनाने के लिए केवल जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं होगा। सबसे पहले स्वास्थ्यकर्मियों को उचित प्रशिक्षण देना होगा। आशा कार्यकर्ताओं को यह स्पष्ट रूप से समझना होगा कि किन लक्षणों पर महिला को चिकित्सक के पास भेजना है और किन परिस्थितियों में तत्काल चिकित्सा सहायता जरूरी है। दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा होगा बजट। जांच, परामर्श, दवाइयां, विशेषज्ञ डॉक्टर, प्रशिक्षण और विशेष क्लीनिकों के लिए पर्याप्त धन की जरूरत होगी। तीसरी चुनौती होगी ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ सेवाओं की उपलब्धता। यदि किसी गांव में शुरुआती पहचान तो हो जाए लेकिन आगे जांच या उपचार के लिए महिला को बहुत दूर जाना पड़े, तो पूरी व्यवस्था का लाभ सीमित हो सकता है।

महिलाओं की निजता भी होगी अहम

घर-घर जाकर स्वास्थ्य संबंधी जानकारी जुटाने की योजना में महिलाओं की निजता और सम्मान का विशेष ध्यान रखना होगा। रजोनिवृत्ति, मासिक धर्म और मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषय कई महिलाओं के लिए निजी होते हैं। इसलिए स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षित करते समय केवल चिकित्सकीय जानकारी नहीं बल्कि गोपनीयता, संवेदनशील बातचीत और महिला की सहमति के सिद्धांतों पर भी जोर देना होगा।

कर्नाटक की पहल क्यों महत्वपूर्ण है?

इस नीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि रजोनिवृत्ति को निजी समस्या से निकालकर सार्वजनिक स्वास्थ्य के मुद्दे के रूप में देखने की कोशिश की जा रही है। अगर यह योजना प्रभावी ढंग से लागू होती है तो किसी महिला को अपने लक्षणों को वर्षों तक सहने के बजाय शुरुआती स्तर पर जानकारी और सलाह मिल सकती है। ग्रामीण इलाकों में आशा कार्यकर्ता जागरूकता की पहली कड़ी बन सकती हैं और जरूरत पड़ने पर महिला को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, जिला अस्पताल या विशेषज्ञ केंद्र तक पहुंचाया जा सकता है। लेकिन फिलहाल यह याद रखना जरूरी है कि ‘ऋतु थारे’ अभी प्रस्तावित नीति और कार्यक्रम के चरण में है।अंतिम नीति दस्तावेज में इसके बजट, समयसीमा, जिलेवार क्रियान्वयन, जांच व्यवस्था, उपचार सुविधाओं और निगरानी तंत्र की स्पष्ट जानकारी सामने आना बाकी है।

महिला स्वास्थ्य की दिशा में महत्त्वपूर्ण बदलाव

कर्नाटक की ‘ऋतु थारे’ पहल अगर घोषित ढांचे के अनुसार जमीन पर उतरती है, तो यह महिलाओं के स्वास्थ्य को देखने के तरीके में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती है। संदेश स्पष्ट है- महिला स्वास्थ्य केवल किशोरावस्था, मासिक धर्म, गर्भावस्था और मातृत्व तक सीमित नहीं है। रजोनिवृत्ति और उसके बाद का जीवन भी सार्वजनिक स्वास्थ्य की जिम्मेदारी का हिस्सा है। अब असली परीक्षा घोषणा की नहीं, बल्कि क्रियान्वयन की होगी। यदि आशा कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को संसाधन, विशेषज्ञ अस्पतालों को पर्याप्त क्षमता और महिलाओं को सम्मानजनक एवं गोपनीय उपचार मिल सका, तो ‘ऋतु थारे’ देश में मध्य आयु की महिलाओं की स्वास्थ्य जरूरतों को मुख्यधारा में लाने वाला महत्वपूर्ण मॉडल बन सकता है।

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