भीषण गर्मी से निपटने के लिए हीट एक्शन प्लान अधूरा, 2025 में बढ़ सकते हैं केस

The CSR Journal Magazine
देश के 20 प्रमुख शहरों में से केवल अहमदाबाद में ही सही तरीके से हीट एक्शन प्लान लागू है। बाकी शहरों में केवल प्याऊ और एडवाइजरी देने तक सीमित रह गया है। 2016 में केंद्र सरकार ने इस योजना की शुरुआत की थी, लेकिन इसका असर ज्यादातर स्थानों पर न के बराबर है। कूल रूफ और ग्रीन कवर को बढ़ाने के उपाय अधिकांश शहरों में नजर नहीं आते।

स्वास्थ्य में उभरते खतरे

गर्मी के चलते स्वास्थ्य के आंकड़े चिंताजनक हैं। 2024 में हीट स्ट्रोक के 25,000 मामले सामने आए थे, जिनमें 56 लोगों की मौत हुई। 2025 में यह संख्या बढ़कर 40,000 तक पहुँच गई है, जिसमें 110 मौतें शामिल हैं। महाराष्ट्र में अकेले इस साल अब तक 236 मामले और 6 मौतें दर्ज की जा चुकी हैं।

लू के मानकों में बदलाव

गर्मी और अल नीनो के चलते भारतीय मौसम विभाग लू घोषित करने के मानकों में बदलाव की तैयारी कर रहा है। मौजूदा मानक सिर्फ तापमान पर आधारित हैं, जो तटीय राज्यों जैसे केरल के लिए सही नहीं माने जाते। नए मानकों में उमस और हीट स्ट्रेस को भी सम्मिलित किया जाएगा। इससे चिंताजनक क्षेत्रों में चेतावनी देना संभव हो सकेगा।

शहरों की अलग-अलग तैयारियां

अहमदाबाद ने हीट एक्शन के लिए बेहतरीन मॉडल तैयार किया है जबकि अन्य शहरों का कार्य अधूरा रह गया है। उदाहरण के लिए, दिल्ली ने 11,000 कूलिंग पॉइंट्स बनाने का लक्ष्य रखा था परंतु इसकी संख्या बेहद कम रही। ऐसे ही भोपाल में न तो कूल रूफ बने, न ही विस्तृत योजना लागू हुआ। इंदौर में कुछ सुधार हुए लेकिन एयर कूलिंग शेड्स का निर्माण नहीं किया गया।

दिल्ली की हालत

दिल्ली ने इस वर्ष 11,000 ‘कूलिंग पॉइंट्स’ का प्रावधान किया, लेकिन कूलिंग सेंटर्स की संख्या बहुत कम है। मेट्रो स्टेशनों और बस स्टॉप पर छबीलें लगाई गई हैं, मगर कूल रूफ बनाने का काम सुस्त है।

भोपाल की स्थिति

भोपाल में स्वास्थ्य विभाग ने अस्पतालों में ‘लू वार्ड’ बनाने के आदेश दिए हैं। लेकिन अन्य जरूरी कार्य जैसे कूल रूफ, शेड या खास पौधरोपण नहीं किया गया है। ग्रीन कवर भी घटकर सिर्फ 6% रह गया है।

इंदौर का प्रयास

इंदौर ने 12 अस्पतालों में लू केंद्र बनाए और ट्रैफिक सिग्नल पर रेड लाइट का समय कम किया है। परंतु संवेदनशील क्षेत्रों में कूलिंग शेड्स लगाने का कोई ध्यान नहीं दिया गया है। ग्रीन कवर 1990 में 33% था, लेकिन अब यह घटकर 10% रह गया है।

जयपुर की चुनौतियाँ

जयपुर ने अस्पतालों में विशेष वार्ड और ओआरएस कॉर्नर बनाए हैं, लेकिन श्रमिकों के लिए कोई उचित शेल्टर एवं सार्वजनिक कूलिंग स्टेशन नहीं बने हैं। निर्माण कार्य के घंटों में बदलाव की सलाह दी गई है, लेकिन ठोस कदम उठाने की कमी है।

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