बर्गर-पिज्जा ही नहीं, आपके शहर की हवा भी बढ़ा रही है बच्चों का वजन

The CSR Journal Magazine

जंक फूड से दूर वायु प्रदूषण से भी बच्चे हो सकते हैं मोटापे का शिकार

जब भी किसी बच्चे का वजन असामान्य रूप से बढ़ता है, तो अमूमन माता-पिता की डाइट, चॉकलेट, बर्गर, पिज्जा या उनके स्क्रीन टाइम को इसका जिम्मेदार ठहराया जाता है। लेकिन चिकित्सा विज्ञान और वैश्विक पर्यावरण शोधों ने एक ऐसा चौंकाने वाला खुलासा किया है, जिसने इस पूरी धारणा को बदल कर रख दिया है। दुनिया के शीर्ष वैज्ञानिकों और बाल रोग विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों में मोटापे (Childhood Obesity) की सबसे मुख्य और घातक वजह केवल जंक फूड का सेवन नहीं है, बल्कि वह हवा है जिसमें वे हर पल सांस ले रहे हैं।

बड़ी हेल्थ इमरजेंसी

हाल ही में अमेरिका के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान ‘माउंट सिनाई’ (Mount Sinai) और ब्रिटेन के प्रमुख मीडिया संगठन ‘द गार्जियन’ द्वारा जारी वैश्विक शोध रिपोर्टों ने यह साबित किया है कि वायु प्रदूषण सीधे तौर पर बच्चों के शरीर में वसा (Fats) के संचय और उनके मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को नियंत्रित कर रहा है। यह स्थिति भारत जैसे विकासशील देशों के लिए एक बड़े ‘हेल्थ इमरजेंसी’ की तरह है, जहां के कई शहरों का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) अक्सर खतरनाक स्तर पर रहता है।

आखिर हवा कैसे बढ़ा रही है वजन?

इस शोध के सबसे डरावने पहलू बच्चों के शुरुआती जीवन से जुड़े हैं। वैज्ञानिकों ने पाया कि जब कोई बच्चा अपने जीवन के पहले वर्ष (Infancy) में अत्यधिक प्रदूषित हवा, विशेषकर PM2.5 (महीन कण जो सांस के जरिए फेफड़ों और खून में घुल जाते हैं) के संपर्क में आता है, तो उसके शरीर की प्राकृतिक बनावट में स्थायी बदलाव होने लगते हैं।

मस्तिष्क का ‘इम्पल्स कंट्रोल’ (आवेग नियंत्रण) हो रहा है खत्म

रिपोर्ट के मुताबिक, जहरीली हवा में मौजूद अल्ट्राफाइन कण बच्चों के रक्त-मस्तिष्क अवरोध (Blood-Brain Barrier) को पार करके सीधे उनके सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर हमला करते हैं। इससे मस्तिष्क का वह हिस्सा प्रभावित होता है जो इच्छाओं, आदतों और आवेगों (Impulse Control) को नियंत्रित करता है।

व्यावहारिक असर

जब बच्चों का इम्पल्स कंट्रोल कमजोर हो जाता है, तो वे भूख न होने पर भी अनहेल्दी खाना खाने से खुद को रोक नहीं पाते। उनके भीतर मीठा, तला-भुना और जंक फूड खाने की तीव्र इच्छा जागती है। यानी, जंक फूड खाना मोटापे का सीधा कारण नहीं है, बल्कि प्रदूषण बच्चों को जंक फूड खाने के लिए मजबूर कर रहा है।

‘ओबेसोजेन्स’ (Obesogens) का अदृश्य हमला

हवा में केवल धूल के कण नहीं होते, बल्कि गाड़ियों के धुएं और फैक्ट्रियों से निकलने वाले हानिकारक रसायनों का मिश्रण होता है। इन्हें वैज्ञानिक भाषा में ‘ओबेसोजेन्स’ कहा जाता है। ये ऐसे रासायनिक तत्व हैं जो मानव शरीर के एंडोक्राइन (हॉर्मोनल) सिस्टम को पूरी तरह से हैक कर लेते हैं। ये रसायन शरीर में जाकर इंसुलिन के स्तर को बिगाड़ते हैं और लेप्टिन (भूख को शांत करने वाला हॉर्मोन) के सिग्नल को ब्लॉक कर देते हैं। नतीजा यह होता है कि बच्चे का पेट भरा होने पर भी उसका दिमाग उसे ‘भूखा’ होने का संकेत भेजता रहता है।

मेटाबॉलिज्म का कबाड़ा

कैलोरी बर्न करने की क्षमता का घटनालंग केयर फाउंडेशन (Lung Care Foundation) द्वारा भारत के स्कूली बच्चों पर किए गए एक पुराने लेकिन प्रासंगिक अध्ययन में भी यह देखा गया था कि दिल्ली और इसके आस-पास के प्रदूषित इलाकों में रहने वाले बच्चों का बॉडी मास इंडेक्स (BMI) साफ हवा में रहने वाले बच्चों की तुलना में काफी अधिक था। वैज्ञानिकों का कहना है कि जब PM2.5 के सूक्ष्म कण फेफड़ों के रास्ते रक्तप्रवाह में पहुंचते हैं, तो वे पूरे शरीर में ‘सिस्टेमिक इन्फ्लेमेशन’ (आंतरिक सूजन) पैदा करते हैं। यह सूजन सीधे तौर पर बच्चे के मेटाबॉलिज्म (चयापचय दर) को धीमा कर देती है।

सरल शब्दों में समझें

यदि एक साफ हवा में रहने वाला बच्चा और एक प्रदूषित शहर में रहने वाला बच्चा दोनों एक जैसी डाइट लेते हैं और बराबर मात्रा में कैलोरी खाते हैं, तब भी प्रदूषित हवा में रहने वाले बच्चे का शरीर उस कैलोरी को फैट (वसा) के रूप में जमा करेगा, जबकि दूसरा बच्चा उसे आसानी से ऊर्जा में बदल देगा। प्रदूषण शरीर के ‘ब्राउन फैट’ (जो कैलोरी बर्न करता है) को ‘व्हाइट फैट’ (जो चर्बी बढ़ाता है) में बदलने की प्रक्रिया को तेज कर देता है।

जंक फूड बनाम वायु प्रदूषण

यह सच है कि खराब खान-पान वजन बढ़ाता है, लेकिन खान-पान को नियंत्रित किया जा सकता है। वायु प्रदूषण को लेकर स्थिति बिल्कुल अलग और बेकाबू है।

जंक फूड बनाम वायु प्रदूषण: क्यों ज्यादा खतरनाक है हवा?

यह सच है कि खराब खान-पान वजन बढ़ाता है, लेकिन खान-पान को नियंत्रित किया जा सकता है। वायु प्रदूषण को लेकर स्थिति बिल्कुल अलग और बेकाबू है।
व्यक्तिगत नियंत्रण– माता-पिता घर में जंक फूड का आना रोक सकते हैं, डाइट चार्ट बना सकते हैं लेकिन हवा पर किसी का नियंत्रण नहीं है। बच्चा सांस लेना बंद नहीं कर सकता।
असर की शुरुआत– जंक फूड आमतौर पर तब असर करता है जब बच्चा ठोस आहार और बाहरी खान-पान शुरू करता है लेकिन वायु प्रदूषण मां के गर्भ (Pregnancy) और शिशु के जन्म के पहले दिन से ही असर डालना शुरू कर देता है।
जैविक बदलाव– जंक फूड केवल अतिरिक्त कैलोरी देता है जिसे एक्सरसाइज से बर्न किया जा सकता है मगर वायु प्रदूषण शरीर की कैलोरी बर्न करने की जेनेटिक और हार्मोनल क्षमता को ही स्थाई रूप से डैमेज कर देता है।

दोहरी मार: ‘आउटडोर प्ले’ का खत्म होना और स्क्रीन टाइम

हवा की खराब गुणवत्ता केवल आंतरिक रूप से ही बच्चों को नुकसान नहीं पहुंचा रही, बल्कि उनके सामाजिक और शारीरिक व्यवहार को भी बदल रही है। भारत के उत्तर भारत के राज्यों में अक्टूबर से फरवरी के बीच स्मॉग (Smog) के कारण स्कूल बंद करने पड़ते हैं या बच्चों को घरों के अंदर रहने की सलाह दी जाती है। जब बच्चे बाहर पार्क में खेलने, दौड़ने या साइकिल चलाने नहीं जा पाते, तो उनकी शारीरिक सक्रियता शून्य हो जाती है। घरों में कैद रहने के कारण उनका स्क्रीन टाइम (टीवी, मोबाइल, वीडियो गेम्स) बढ़ जाता है। स्क्रीन टाइम बढ़ने से बच्चों में गतिहीन जीवनशैली विकसित होती है, जो वायु प्रदूषण से होने वाले आंतरिक मोटापे की रफ्तार को चार गुना बढ़ा देती है।

भारत के संदर्भ में यह रिपोर्ट कितनी खतरनाक?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में भारत के कई शहर शीर्ष पर हैं। भारतीय बच्चों में टाइप-2 डायबिटीज, बचपन में ही फैटी लीवर होना, और कम उम्र में हाई ब्लड प्रेशर की शिकायतें तेजी से बढ़ी हैं।चिकित्सकों का कहना है कि पहले जो बीमारियां 40 से 50 वर्ष की उम्र के वयस्कों में देखी जाती थीं, वे अब 12 से 15 साल के बच्चों में मिल रही हैं। इस मोटापे को केवल जिम भेजने या क्रैश डाइट कराने से ठीक नहीं किया जा सकता, क्योंकि समस्या की जड़ उनके पर्यावरण में है।

इस अदृश्य दुश्मन से बच्चों को कैसे बचाएं?

चूंकि वायु प्रदूषण एक सामूहिक और सरकारी स्तर की समस्या है, लेकिन माता-पिता अपने स्तर पर कुछ बेहद महत्वपूर्ण कदम उठाकर अपने बच्चों को इस खतरे से सुरक्षित रख सकते हैं।
शिशु अवस्था में विशेष देखभाल: गर्भवती महिलाओं और एक वर्ष से छोटे बच्चों को अत्यधिक वायु प्रदूषण वाले दिनों में बाहर निकालने से बचें। उनके कमरों में HEPA फिल्टर वाले उच्च गुणवत्ता के एयर प्यूरीफायर का उपयोग करें।
इनडोर एक्टिविटीज को बढ़ावा: जब बाहर का AQI 200 से ऊपर हो, तो बच्चों को बाहर भेजने के बजाय घर के अंदर ही योग, जंपिंग जैक, या इनडोर डांस जैसी गतिविधियों में व्यस्त रखें ताकि कैलोरी बर्न होती रहे।
एंटीऑक्सीडेंट थेरेपी (डाइट में बदलाव): प्रदूषण से होने वाली आंतरिक सूजन (Inflammation) को काटने के लिए बच्चों को विटामिन-सी, विटामिन-ई और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर खाद्य पदार्थ दें। आंवला, संतरा, नींबू, अखरोट और हरी पत्तेदार सब्जियां शरीर के भीतर प्रदूषण के टॉक्सिन्स से लड़ने की क्षमता बढ़ाती हैं।
अर्ली मॉर्निंग वॉक से बचें: सर्दियों या भारी स्मॉग के दिनों में बच्चों को सुबह जल्दी पार्क में न ले जाएं, क्योंकि उस समय प्रदूषित कण जमीन के सबसे नजदीक और बेहद घने होते हैं। धूप निकलने के बाद ही उन्हें बाहर भेजें।

अब नजरिया बदलने का समय

यह शोध पूरी दुनिया के नीति निर्माताओं, डॉक्टरों और माता-पिता की आंखें खोलने वाला है। बच्चों का मोटापा अब केवल एक ‘लापरवाह जीवनशैली’ या ‘अमीर घर के बच्चों की बीमारी’ नहीं रह गया है, बल्कि यह एक पर्यावरणीय त्रासदी है। यदि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को बीमारियों के इस जाल से बचाना चाहते हैं, तो हमें प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई को केवल फेफड़ों की बीमारी या अस्थमा तक सीमित न रखकर, इसे बच्चों के संपूर्ण मानसिक और शारीरिक विकास से जोड़कर देखना होगा। साफ हवा अब सिर्फ एक लग्जरी नहीं, बल्कि हमारे बच्चों को फिट रखने की पहली बुनियादी जरूरत बन चुकी है।

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