अग्निपथ योजना पर नेपाल में भड़का आक्रोश: पूर्व गोरखा सैनिकों ने भर्ती शुरू करने के लिए सरकार पर बनाया दबाव

The CSR Journal Magazine

नेपाल-भारत के रिश्तों में नया मोड़: अग्निपथ की वजह से भर्ती में देरी! गोरखा सैनिकों का बढ़ता दवाब

भारतीय सेना की ‘अग्निपथ योजना’ के तहत गोरखा सैनिकों की भर्ती पर लगे गतिरोध को तोड़ने के लिए नेपाल के पूर्व गोरखा सैनिकों और युवाओं ने अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। नेपाल के प्रमुख शहर पोखरा में सैकड़ों पूर्व सैनिकों और सैन्य सेवा के इच्छुक युवाओं ने सड़कों पर उतरकर काठमांडू की बालेंद्र ‘बालेन’ शाह सरकार पर भर्ती प्रक्रिया को तत्काल हरी झंडी देने का भारी दबाव बनाया है। यह विरोध प्रदर्शन ऐसे समय में हुआ है जब भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ नेपाल की पांच दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर काठमांडू पहुंचे हैं। आंदोलनकारियों का स्पष्ट कहना है कि राजनीतिक हठधर्मिता के कारण पिछले चार वर्षों से बंद पड़ी यह भर्ती नेपाल के युवाओं को आर्थिक संकट में धकेल रही है।

पोखरा की सड़कों पर गूंजी मांग, सरकार को अल्टीमेटम

पश्चिमी नेपाल के पर्यटन केंद्र पोखरा में ‘इंडियन एक्स-सर्विसमैन गोरखा ब्रिगेड नेपाल’ के बैनर तले एक विशाल मार्च निकाला गया। पोखरा स्टेडियम से शुरू होकर कास्की के जिला प्रशासन कार्यालय तक पहुंचे इस मार्च में पूर्व सैनिकों ने अपनी नाराजगी जाहिर की। आंदोलनकारियों ने नेपाल सरकार को दो सूत्रीय ज्ञापन सौंपा, जिसमें भारतीय सेना में अग्निपथ योजना के तहत नेपाली युवाओं की भर्ती तुरंत शुरू करने की मांग की गई है। प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व कर रहे ब्रिगेड के अध्यक्ष कर्नल (सेवानिवृत्त) कृष्ण बहादुर खत्री ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने जल्द ही सकारात्मक निर्णय नहीं लिया, तो वे पूरे देश में और उग्र आंदोलन शुरू करेंगे। उन्होंने कहा, “हम अपनी ताकत का प्रदर्शन कर चुके हैं और सरकार को यह हमारी अंतिम चेतावनी है। युवाओं के भविष्य के साथ अब और खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”

सुगौली संधि और त्रिपक्षीय समझौते की दुहाई

पूर्व सैनिकों ने याद दिलाया कि भारतीय सेना में नेपाली युवाओं की भर्ती का इतिहास 200 वर्षों से भी अधिक पुराना है, जिसकी जड़ें 1816 की सुगौली संधि से जुड़ी हैं। इसके बाद, भारत की स्वतंत्रता के समय 9 नवंबर 1947 को भारत, नेपाल और ब्रिटेन के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ था, जिसके तहत गोरखा रेजिमेंट में भर्ती को नियमित अधिकार मिला। कर्नल खत्री ने कहा कि दो शताब्दियों से चली आ रही इस ऐतिहासिक और गौरवशाली परंपरा को नेपाल सरकार विभिन्न बहाने बनाकर खत्म करने पर तुली है, जिससे हजारों परिवारों का चूल्हा बुझने की कगार पर है।

खाड़ी देशों की ‘नरक’ जैसी नौकरी से बेहतर ‘अग्निवीर’

नेपाल सरकार के उस तर्क पर पूर्व सैनिकों ने तीखा प्रहार किया है जिसमें कहा गया था कि 4 साल की संविदा (कांट्रैक्ट) नौकरी के बाद युवाओं का भविष्य असुरक्षित हो जाएगा। कर्नल खत्री और कैप्टन (सेवानिवृत्त) रुद्र थापा ने नेपाल की आर्थिक वास्तविकताओं का हवाला देते हुए कहा कि देश के भीतर रोजगार के कोई अवसर नहीं हैं। ऐसे में सरकार युवाओं को खाड़ी देशों (Gulf Countries) में 50 डिग्री सेल्सियस के खौफनाक तापमान में न्यूनतम मजदूरी पर कठिन शारीरिक श्रम करने के लिए मजबूर कर रही है। पूर्व सैनिकों के अनुसार, खाड़ी देशों के शोषण से बेहतर है कि युवा भारतीय सेना में ‘अग्निवीर’ बनें। उन्होंने गणना साझा करते हुए बताया कि एक अग्निवीर 4 वर्षों की सेवा के दौरान वेतन, भत्तों और सेवानिवृत्ति के समय मिलने वाले ‘सेवा निधि’ पैकेज को मिलाकर लगभग 45 से 50 लाख नेपाली रुपये कमा सकता है। यदि 25 प्रतिशत युवाओं को भारतीय सेना में स्थायी सेवा (परमानेंट रिटेंशन) मिल जाती है, तो उनका भविष्य संवर जाएगा और बाकी बचे 75 प्रतिशत युवा इस बड़ी पूंजी और सैन्य अनुभव के साथ दुनिया के किसी भी देश में बेहतर रोजगार पा सकेंगे।

क्या है विवाद और नेपाल सरकार का रुख?

भारत सरकार ने जून 2022 में सैन्य भर्ती में आमूलचूल बदलाव करते हुए अग्निपथ योजना की शुरुआत की थी। इसके तहत सैनिकों को केवल 4 वर्षों के लिए अनुबंधित किया जाता है और सेवा काल समाप्त होने पर अधिकतम 25 प्रतिशत सैनिकों को ही सेना में नियमित किया जाता है, जबकि शेष को एकमुश्त राशि देकर कार्यमुक्त कर दिया जाता है। कोविड-19 महामारी के कारण वर्ष 2020 से ही गोरखा भर्ती रुकी हुई थी। जब 2022 में भारत ने नई नीति लागू की, तो तत्कालीन नेपाली सरकार ने यह कहते हुए भर्ती पर रोक लगा दी कि अग्निपथ योजना के नियम 1947 के त्रिपक्षीय समझौते की भावना के अनुकूल नहीं हैं। नेपाल का मानना था कि पेंशन और दीर्घकालिक सेवा की सुरक्षा के बिना नेपाली युवाओं को विदेशी सेना में भेजना उनके राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा चिंताओं के खिलाफ हो सकता है। तब से लेकर आज तक नेपाल के गृह क्षेत्र (डोमिसाइल) वाले गोरखाओं की एक भी भर्ती भारतीय सेना में नहीं हो सकी है।

भारत का स्पष्ट रुख: “नियम सबके लिए समान होंगे”

इस विवाद पर भारत की ओर से हमेशा स्पष्ट संकेत दिए गए हैं। भारत के पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने हाल ही में अपने एक बयान में साफ किया था कि भारतीय सेना में गोरखाओं की भर्ती केवल और केवल ‘अग्निपथ योजना’ के माध्यम से ही संभव है। जनरल चौहान ने दोटूक शब्दों में कहा था, “अब गेंद पूरी तरह से काठमांडू के पाले में है। भारत अपने नागरिकों के लिए एक नियम और नेपाल के नागरिकों के लिए दूसरा नियम नहीं रख सकता। सेवा की शर्तें सभी के लिए समान होंगी।” उल्लेखनीय है कि जनरल चौहान और उनके पूर्ववर्ती दिवंगत जनरल बिपिन रावत दोनों ने अपने सैन्य करियर की शुरुआत 11वीं गोरखा राइफल्स से की थी, जिससे इस रेजीमेंट के साथ भारतीय सैन्य नेतृत्व का गहरा भावनात्मक जुड़ाव रहा है।

बालेन शाह सरकार के सामने ‘गोरखा टेस्ट’ और बड़ा धर्मसंकट

काठमांडू में मेयर और देश की राजनीति में एक प्रभावी युवा चेहरे के रूप में उभरने वाले बालेंद्र ‘बालेन’ शाह और मौजूदा नेपाली नेतृत्व के सामने इस समय भारी असमंजस की स्थिति है। नेपाल के वामपंथी दल और राष्ट्रवादी धड़ा यह तर्क देते हैं कि नेपाली नागरिकों को विदेशी सेनाओं में ‘भाड़े के सैनिकों’ (Mercenaries) की तरह नहीं भेजा जाना चाहिए, खासकर तब जब उन्हें पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा न मिल रही हो।

आर्थिक और सामाजिक जमीनी हकीकत

इसके विपरीत, पूर्व सैनिक और युवा इसे पूरी तरह से अपनी आजीविका का साधन मानते हैं। भारतीय सेना में वर्तमान में लगभग 32,000 से 35,000 नेपाली गोरखा सेवारत हैं और नेपाल में लगभग 1.32 लाख पूर्व पेंशनभोगी सैनिक रहते हैं। हर साल भारतीय सेना से पेंशन और वेतन के रूप में नेपाल की अर्थव्यवस्था में अरबों रुपये का प्रेषण (Remittance) आता है, जो नेपाल के ग्रामीण इलाकों की रीढ़ है। भर्ती बंद होने से यह आर्थिक चक्र पूरी तरह ठप हो रहा है।

रूस-यूक्रेन युद्ध का खतरनाक विकल्प

पूर्व सैनिकों ने नेपाल सरकार की आंखें खोलने के लिए एक और गंभीर मुद्दा उठाया है। रोजगार के अभाव और भारतीय सेना के रास्ते बंद होने के कारण नेपाल के सैकड़ों गुमराह युवा अवैध रास्तों से रूस-यूक्रेन युद्ध में रूसी सेना में शामिल होने के लिए चले गए हैं। नेपाल सरकार खुद स्वीकार कर चुकी है कि उसके 200 से अधिक नागरिक रूसी सेना का हिस्सा बन चुके हैं, जिनमें से कई की मौत की खबरें भी आई हैं। पूर्व सैनिकों का तर्क है कि यदि सरकार ने भारतीय सेना में वैध और सुरक्षित तरीके से जाने का रास्ता नहीं खोला, तो नेपाली युवा इसी तरह वैश्विक युद्धों में अपनी जान गंवाते रहेंगे।

सेना प्रमुख की यात्रा और भविष्य की उम्मीदें

भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ की इस नेपाल यात्रा के दौरान जहां परंपरा के अनुसार नेपाल के राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल उन्हें ‘नेपाली सेना के मानद जनरल’ की उपाधि से सम्मानित करेंगे, वहीं सैन्य स्तर पर अग्निपथ के गतिरोध को सुलझाने के लिए अनौपचारिक बातचीत की भी प्रबल संभावना है। यद्यपि आधिकारिक बयानों में अग्निपथ का सीधा जिक्र नहीं किया गया है, लेकिन पोखरा में भड़का यह जनांदोलन काठमांडू के नीति-निर्माताओं को अपनी जिद छोड़ने पर मजबूर कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि दो देशों के बीच केवल सैन्य संबंध ही नहीं, बल्कि ‘रोटी-बेटी’ और जन-जन का रिश्ता (People-to-People ties) मजबूत रखने में गोरखा भर्ती एक सेतु का काम करती है। पूर्व सैनिकों के इस बढ़ते दबाव के बाद अब देखना होगा कि बालेन शाह सरकार इस ‘गोरखा टेस्ट’ को कैसे पार करती है और क्या नेपाली युवाओं के लिए भारतीय सेना की वर्दी पहनने का सपना दोबारा सच हो पाता है।

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