2026 की जनगणना में जाति का विवरण, अमित शाह ने संसद में दी स्पष्टता
भारतीय लोकतंत्र में समावेशी विकास और समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए जनगणना एक आधारभूत प्रक्रिया है। आगामी 2026 की जनगणना इस मायने में ऐतिहासिक है क्योंकि यह भारत की पहली डिजिटल जनगणना होगी, जिसमें ‘जातिगत जनगणना’ (Caste Census) की दशकों पुरानी मांग को पूरा किया जा रहा है। इसके साथ ही, यह जनगणना महिलाओं के लिए संसद और विधानसभाओं में 33% आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को प्रभावी ढंग से लागू करने की दिशा में पहला कदम है।
महिलाओं के लिए आरक्षण की नई राह
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में लोकसभा में एक महत्वपूर्ण घोषणा की। उन्होंने बताया कि 2026 में होने वाली जनगणना के साथ जाति का विवरण भी शामिल किया जाएगा। यह फैसला कई सांसदों द्वारा उठाई गई आशंकाओं का जवाब देने के लिए किया गया। शाह ने कहा कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत 2026 के बाद होने वाले परिसीमन में महिलाओं के लिए विशेष आरक्षण का प्रावधान होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह कदम महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए अहम है।
जातिगत जनगणना
जाति का कॉलम: सरकार ने कैबिनेट निर्णय के माध्यम से आगामी जनगणना में जाति आधारित गणना को मंजूरी दे दी है।
महत्व: इसके जरिए सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC) और अन्य समुदायों की सटीक आबादी का पता चलेगा, जिससे कल्याणकारी योजनाओं के बेहतर लक्ष्यीकरण में मदद मिलेगी।
ऐतिहासिक कदम: आजादी के बाद यह पहली बार होगा जब व्यापक स्तर पर जातिगत डेटा एकत्र किया जाएगा।
महिला आरक्षण (Women’s Reservation)
नारी शक्ति वंदन अधिनियम: संसद ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई (33%) सीटें आरक्षित करने का कानून पहले ही पारित कर दिया है। इस आरक्षण को लागू करने के लिए 2026 के बाद होने वाली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन (Delimitation) की शर्त रखी गई है। सरकार का लक्ष्य है कि इस जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद, 2029 के लोकसभा चुनावों से महिला आरक्षण को पूरी तरह से लागू किया जा सके। यह जनगणना मोबाइल ऐप और डिजिटल उपकरणों के माध्यम से की जाएगी, जिसमें लगभग 35 लाख कर्मचारी शामिल होंगे। पहला चरण (मकान सूचीकरण) अप्रैल 2026 से शुरू होकर सितंबर 2026 तक चलेगा, जबकि दूसरा चरण (जनसंख्या गणना) मार्च 2027 से शुरू होगा।
परिसीमन पर उठे सवाल
अमित शाह ने सदन में कहा कि कई सदस्यों ने परिसीमन के समय की वैधता पर प्रश्न उठाए थे। वे यह जानना चाह रहे थे कि अभी परिसीमन लाने की आवश्यकता क्यों महसूस की गई। शाह ने बताया कि 1971 में इंदिरा गांधी की सरकार ने सीटों को फ्रीज कर दिया था और अब इस स्थिति को बदलने का समय आ गया है। उन्होंने इसे उचित ठहराया और कहा कि महिलाओं के नेतृत्व में बदलाव लाने से देश में एक नई दिशा मिलेगी।
इतिहास में झलक
गृह मंत्री ने आगे बताया कि 1972 में परिसीमन विधेयक लाकर सीटों की संख्या 525 से बढ़ाकर 545 की गई थी। लेकिन उसके बाद 1976 में आपातकाल के दौरान इसका कार्यान्वयन रोक दिया गया। कांग्रेस पार्टी पर निशाना साधते हुए शाह ने कहा कि विपक्षी दल इस बार भी देश की जनता को परिसीमन से वंचित रखने का कार्य कर रहे हैं, जो लोकतंत्र के लिए सही नहीं है।
आबादी के अनुसार प्रतिनिधित्व
अमित शाह ने सदन में उपस्थिति सांसदों को याद दिलाया कि भारत की जनसंख्या 1976 में 56.79 करोड़ थी, जबकि अब यह संख्या बढ़कर 140 करोड़ हो गई है। उन्होंने कहा कि ऐसे में वर्तमान सांसदों की संख्या को भी इसी हिसाब से बढ़ाना चाहिए। शाह ने आरोप लगाया कि विपक्ष इस संवैधानिक अधिकार को रोकने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहा कि इन तीन बिलों का उद्देश्य संविधान को मजबूती से लागू करना है।
संविधान के मूल सिद्धांत
गृह मंत्री ने कहा कि “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” का सिद्धांत हमारे संविधान की आत्मा है, जिसे लागू करना अनिवार्य है। शाह ने विश्वास जताया कि यदि महिलाएं सशक्त होंगी, तो देश में एक नया परिवर्तन आएगा। उन्होंने कहा कि यह केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक सामाजिक परिवर्तन की दिशा में भी कदम होगा।
राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का नया अध्याय
उनकी घोषणा के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ और समीक्षाएँ तेज हो गई हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों ने इस फैसले पर अपनी राय रखी है, जिससे कि आगामी चुनावों में प्रतिस्पर्धा और भी बढ़ेगी। शाह का यह दाज़-बाज़ी से भरा ऐलान न केवल महिलाओं के लिए, बल्कि सम्पूर्ण देश के लिए एक नयी दिशा दिखा सकता है। आने वाले समय में यह देखना होगा कि ये बदलाव किस तरह के परिणाम लेकर आते हैं।
जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी
2026 की जनगणना भारत की सामाजिक-राजनीतिक संरचना में एक बड़े बदलाव का सूत्रपात करेगी। जातिगत विवरण शामिल होने से जहाँ “जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी” के सिद्धांत को मजबूती मिलेगी, वहीं महिला आरक्षण के माध्यम से राजनीति में लैंगिक समानता सुनिश्चित होगी। यद्यपि परिसीमन के साथ इसके जुड़ाव पर राजनीतिक बहस जारी है, लेकिन यह स्पष्ट है कि ये दोनों प्रावधान भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी और पारदर्शी बनाने की दिशा में निर्णायक कदम हैं।
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