बंगाल में 50 हजार लोगों पर पॉक्सो लगाने की तैयारी, जानिए पूरा मामला!

The CSR Journal Magazine
पश्चिम बंगाल में हाल ही में सामने आए 60 हजार अंडरएज डिलीवरी के बाद सरकार ने बाल विवाह की जांच की योजना बनाई है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने ऐलान किया है कि राज्य में 18 साल से कम उम्र की लड़कियों की प्रेग्नेंसी के मामलों की गहरी जांच की जाएगी। इस मुहिम के लिए घर-घर जाकर बाल विवाह के मामलों की जाँच की जाएगी। अगर किसी भी परिवार में कानून का उल्लंघन मिला, तो पति, परिवार के सदस्य और शादी करवाने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

चौंकाने वाला आंकड़ा और उसकी गंभीरता

राज्य स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, 1 जनवरी से 30 जून 2026 के बीच करीब 60 हजार ऐसी डिलीवरी का मामला सामने आया, जिनमें मां की उम्र 18 साल से कम थी। इस आंकड़े के अनुसार, हर महीने औसतन 10 हजार और हर दिन लगभग 330 से ज्यादा नाबालिग लड़कियां मां बनीं। मुर्शिदाबाद में सबसे ज्यादा 12,847 अंडरएज डिलीवरी दर्ज किए गए, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाते हैं।

बाल विवाह: एक पुरानी समस्या

बंगाल में बाल विवाह की समस्या नई नहीं है। NFHS-5 के आंकड़ों के अनुसार, 20 से 24 साल की करीब 41.6 प्रतिशत महिलाओं की शादी 18 साल की उम्र से पहले हो चुकी है। ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़ा 48.1 प्रतिशत तक पहुंचता है। यह डेटा बाल विवाह और किशोर प्रेग्नेंसी की स्थिति को दर्शाता है, जो राज्य की सामाजिक समस्याओं में से एक है।

सरकार की रणनीति की नींव

सरकार की योजना केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर उन परिवारों की पहचान होगी, जहां नाबालिग लड़की मां बनी है। इसके बाद घर-घर जाकर यह जानकारी इकट्ठा की जाएगी कि लड़की की शादी हुई थी या नहीं, शादी के समय उनकी उम्र क्या थी, और शादी करवाने वालों की भूमिका क्या थी। पति को शो-कॉज नोटिस जारी किए जाएंगे और इसके आधार पर कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।

POCSO का महत्वपूर्ण पहलू

इस अभियान में POCSO Act का जुड़ना भी एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है। भारतीय कानून के अनुसार, 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा माना जाता है। जिससे यह स्पष्ट होता है कि नाबालिग के साथ यौन संबंध को केवल इसलिए वैध नहीं माना जा सकता क्योंकि वह शादी के दायरे में आया है।

क्या हर डिलीवरी बनेगी POCSO केस?

हालांकि, 60 हजार डिलीवरी का मतलब यह नहीं है कि हर मामला POCSO के तहत दर्ज होगा। हर मामले की अलग से जांच जरूरी होगी। यह सुनिश्चित करने के लिए कि किस मामले में क्या हुआ, और कब हुआ। इस प्रक्रिया का पालन करके ही सही कानूनी धाराएं लागू की जाएंगी। सरकार को 60 हजार डिलीवरी के आंकड़ों को ठोस कार्रवाई में बदलने के लिए गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ेगा।

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