मुखौटों में जीवंत होती हैं लोककथाएं, पुरुलिया छऊ की अनोखी परंपरा
पश्चिम बंगाल की लोकसंस्कृति में पुरुलिया छऊ केवल नृत्य नहीं, बल्कि नृत्य, रंगमंच, संगीत, मुखौटा कला और लोककथाओं का ऐसा संगम है, जिसमें बिना संवाद बोले भी कलाकार पूरी कहानी दर्शकों तक पहुंचा देते हैं। इसकी ऊर्जावान देहभंगिमाएं, विशाल मुखौटे, रंग-बिरंगी वेशभूषा और युद्ध जैसी गतियां इसे भारतीय लोकनाट्य परंपरा की विशिष्ट पहचान देती हैं। पुरुलिया छऊ, छऊ नृत्य की तीन प्रमुख शैलियों में से एक है और वर्ष 2010 में छऊ नृत्य को यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया था।
पश्चिम बंगाल के नृत्य, वीरता और लोककथाओं की जीवंत परंपरा
पुरुलिया। पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले की पहचान केवल अपनी लाल मिट्टी, पलाश के फूलों, पहाड़ियों और जनजातीय संस्कृति से नहीं है, बल्कि यहां की ऐसी लोककला से भी है, जिसने भारतीय पारंपरिक नृत्य को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है। इसी समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है पुरुलिया छऊ, जिसमें नृत्य, नाटकीय प्रस्तुति, संगीत, मुखौटा कला और पौराणिक कथाओं का अद्भुत मेल देखने को मिलता है। रंग-बिरंगे परिधानों और विशाल मुखौटों से सजे कलाकार जब खुले मंच पर उतरते हैं तो उनकी हर छलांग, हर घूमाव और हर भंगिमा कहानी का हिस्सा बन जाती है।
मूक शब्दों की अभिव्यक्ति
पुरुलिया छऊ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें कहानी कहने के लिए सामान्य रंगमंच की तरह संवादों पर निर्भरता नहीं होती। कलाकार अपने शरीर की गति, हाथ-पैर की मुद्राओं, चेहरे पर लगाए गए मुखौटे, छलांगों, घूमने की शैली और युद्ध जैसी भंगिमाओं के माध्यम से पात्रों और घटनाओं को प्रस्तुत करते हैं। इस कारण दर्शक कलाकारों की वाणी सुने बिना भी कथा को समझने और उसके भावों को महसूस करने लगते हैं। पौराणिक और लोककथाओं के पात्र जब मंच पर उतरते हैं तो उनके विशाल सिर पर सजे मुकुट, चमकीले परिधान और आकर्षक मुखौटे उन्हें दूर बैठे दर्शकों के बीच भी तुरंत पहचान दिलाते हैं।
छऊ की तीन प्रमुख शैलियों में पुरुलिया की अलग पहचान
छऊ पूर्वी भारत की एक विशिष्ट नृत्य परंपरा है, जिसकी तीन प्रमुख शैलियां पुरुलिया, सरायकेला और मयूरभंज से जुड़ी हैं। यूनेस्को के अनुसार छऊ की उत्पत्ति स्थानीय नृत्य परंपराओं और युद्धक कलाओं से जुड़ी मानी जाती है। इसके आंदोलनों में नकली युद्ध, पक्षियों और जानवरों की शैलीबद्ध चाल तथा दैनिक जीवन से प्रेरित कुछ गतियां भी दिखाई देती हैं। पुरुलिया और सरायकेला शैली में मुखौटों का विशेष महत्व है, जबकि छऊ की तीनों शैलियों की अपनी अलग प्रस्तुति शैली विकसित हुई है। पुरुलिया शैली को उसकी अत्यंत रंगीन और प्रभावशाली दृश्य प्रस्तुति के लिए विशेष रूप से पहचाना जाता है। यहां मुखौटा केवल चेहरे को ढकने वाला उपकरण नहीं होता, बल्कि वह पूरे चरित्र की पहचान बन जाता है। किसी देवता, राक्षस, योद्धा या अन्य पात्र का मुखौटा उसके स्वभाव, शक्ति और भूमिका को दर्शाने के लिए तैयार किया जाता है। मुखौटे के साथ सिर पर लगाया जाने वाला बड़ा और सजावटी मुकुट या सिर का अलंकरण पात्र की भव्यता को और बढ़ाता है।
रामायण और पुराणों से लेकर समकालीन कथाओं तक
पुरुलिया छऊ की कथावस्तु का संबंध लंबे समय से भारतीय महाकाव्यों और पौराणिक परंपराओं से रहा है। रामायण और पुराणों से जुड़े प्रसंगों को छऊ कलाकार अपनी विशिष्ट नृत्य शैली में प्रस्तुत करते रहे हैं। देवी-देवताओं, योद्धाओं, राक्षसों और अन्य पौराणिक पात्रों के बीच संघर्ष को कलाकार युद्ध जैसी गतियों और नाटकीय देहभंगिमाओं के माध्यम से मंच पर जीवंत करते हैं। पश्चिम बंगाल पर्यटन विभाग के अनुसार पुरुलिया में छऊ की कथाओं का आधार पहले मुख्य रूप से रामायण और पुराणों की कथाएं रहा, लेकिन समय के साथ समकालीन विषयों को भी इसकी प्रस्तुति में शामिल किया गया है। यही बदलाव इस लोककला को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण रहा है। पारंपरिक पात्रों और कथाओं के साथ नए विषयों को जोड़ने से छऊ केवल अतीत की स्मृति बनकर नहीं रह गया, बल्कि बदलते समाज के साथ संवाद करने वाला लोकमाध्यम भी बना। पश्चिम बंगाल पर्यटन विभाग ने पुरुलिया छऊ की आधुनिक प्रस्तुतियों में संथाल विद्रोह और कारगिल युद्ध जैसे विषयों के इस्तेमाल का भी उल्लेख किया है।
युद्धकला से जुड़ी देहभाषा
छऊ की गति और प्रस्तुति को देखकर इसमें युद्धकला की छाप आसानी से दिखाई देती है। कलाकारों की छलांग, तेज घूमाव, झुकाव, अचानक दिशा बदलना और प्रतिद्वंद्वी पर आक्रमण या बचाव जैसी मुद्राएं इसे सामान्य लोकनृत्य से अलग दृश्य प्रभाव देती हैं। यूनेस्को ने भी छऊ की उत्पत्ति को स्थानीय नृत्य और युद्धक परंपराओं से जोड़ते हुए इसकी गतिविधियों में नकली युद्ध तकनीकों का उल्लेख किया है। पुरुलिया की छऊ प्रस्तुति में कलाकारों को केवल नृत्य की ताल और लय पर नियंत्रण रखना ही नहीं होता, बल्कि भारी परिधान और मुखौटों के साथ संतुलन बनाए रखते हुए जटिल गतियां भी करनी पड़ती हैं। यही वजह है कि इस कला में शारीरिक शक्ति, लचक, फुर्ती और लंबे अभ्यास की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पश्चिम बंगाल पर्यटन विभाग भी इसे शारीरिक शक्ति और चुस्ती के कारण युद्धकला जैसी विशेषताओं वाला नृत्य बताता है।
मुखौटा बनता है पात्र की पहचान
पुरुलिया छऊ का उल्लेख मुखौटों के बिना अधूरा है। मुखौटे इस नृत्य की दृश्य पहचान हैं और इनके जरिए अलग-अलग पात्रों को दर्शकों के सामने विशिष्ट रूप दिया जाता है। आंखों, भौंहों, नाक, होंठों और चेहरे की बनावट से लेकर रंग और सजावट तक में कलाकारों की कल्पनाशीलता दिखाई देती है। इसके साथ रंगीन पोशाक, आभूषण और विशाल सिर की सजावट पूरी प्रस्तुति को भव्य बना देती है। पुरुलिया जिले का चारिडा गांव छऊ मुखौटा निर्माण के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। पश्चिम बंगाल पर्यटन विभाग के अनुसार यहां कई सौ परिवार छऊ मुखौटे बनाने से जुड़े हैं और गांव में छऊ संग्रहालय भी है, जहां इस कला और विरासत को प्रदर्शित किया जाता है। इस तरह छऊ केवल मंच पर होने वाला नृत्य नहीं, बल्कि उससे जुड़ी हस्तशिल्प परंपरा और स्थानीय आजीविका का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। मुखौटा बनाने की प्रक्रिया में कलाकारों की अपनी विशेष तकनीक और अनुभव काम आता है। एक मुखौटे के पीछे केवल रंग और सजावट नहीं होती, बल्कि उस पात्र की कल्पना, उसकी भूमिका और प्रस्तुति की जरूरतों को ध्यान में रखा जाता है। तैयार मुखौटे जब नर्तक के परिधान और सिर की भव्य सजावट के साथ जुड़ते हैं तो मंच पर पात्र की अलग पहचान उभरती है।
संगीत और ढोल की गूंज से बनता है माहौल
छऊ में नृत्य जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण उसका संगीत है। तेज और गूंजती ताल कलाकारों की गतिविधियों को गति देती है और प्रस्तुति के नाटकीय प्रभाव को बढ़ाती है। यूनेस्को के अनुसार छऊ की प्रस्तुतियां परंपरागत रूप से रात के समय खुले स्थान में की जाती रही हैं। इसमें मोहुरी और शहनाई जैसे वाद्ययंत्रों के साथ विभिन्न प्रकार के ढोल की गूंज प्रमुख भूमिका निभाती है। पुरुलिया की लोकपरंपरा में धुमसा, ढोल और अन्य ताल वाद्यों की गूंज वातावरण को ऊर्जावान बना देती है। जब कलाकार युद्ध का दृश्य प्रस्तुत करता है तो तेज ताल उसकी गतिविधियों के साथ तनाव और रोमांच पैदा करती है। इसके विपरीत किसी भावनात्मक या शांत प्रसंग में संगीत की गति और प्रस्तुति का स्वरूप बदल सकता है। इस प्रकार संगीत केवल पृष्ठभूमि नहीं रहता, बल्कि कहानी कहने की प्रक्रिया का सक्रिय हिस्सा बन जाता है।
पर्व-त्योहारों से गहरा संबंध
छऊ नृत्य का संबंध स्थानीय सामाजिक और धार्मिक जीवन से भी गहरा है। यूनेस्को के अनुसार यह परंपरा क्षेत्रीय त्योहारों, विशेषकर वसंत ऋतु के चैत्र पर्व, से निकटता से जुड़ी हुई है। पुरुलिया में छऊ स्थानीय उत्सवों और सामुदायिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। पुरुलिया की सांस्कृतिक पहचान में जनजातीय और ग्रामीण परंपराओं का विशेष योगदान है। पश्चिम बंगाल पर्यटन विभाग के अनुसार जिले में संथाल, कुर्मी, खेड़िया-सबर सहित विभिन्न समुदायों की सांस्कृतिक परंपराएं मौजूद हैं और गीत-संगीत तथा नृत्य स्थानीय जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। इसी सांस्कृतिक वातावरण में छऊ ने अपनी विशिष्ट पहचान विकसित की है।
पीढ़ियों से आगे बढ़ रही परंपरा
छऊ केवल मंच पर कलाकारों के प्रदर्शन का नाम नहीं है। इसके पीछे गुरु-शिष्य परंपरा, परिवारों की कलात्मक विरासत और स्थानीय समुदायों की भागीदारी जुड़ी है। यूनेस्को के अनुसार छऊ परंपरागत कलाकार परिवारों और स्थानीय समुदायों के पुरुष नर्तकों को सिखाया जाता रहा है। यह परंपरा अलग-अलग सामाजिक और जातीय समुदायों को जोड़ने का काम भी करती रही है।हालांकि आधुनिक समय में इस लोककला के सामने चुनौतियां भी हैं। यूनेस्को ने बढ़ते औद्योगीकरण, आर्थिक दबाव और नए माध्यमों के कारण समुदायों की सामूहिक भागीदारी में कमी की आशंका को दर्ज किया है। जब युवा पीढ़ी पारंपरिक कलाओं से दूर होती है तो केवल नृत्य की एक शैली नहीं, बल्कि उससे जुड़ी संगीत, मुखौटा निर्माण, वेशभूषा और मौखिक परंपराओं की पूरी श्रृंखला प्रभावित हो सकती है।
यूनेस्को की मान्यता ने बढ़ाई पहचान
छऊ नृत्य को वर्ष 2010 में यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया। इस मान्यता में छऊ की सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक जुड़ाव और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा को महत्वपूर्ण माना गया। इस अंतरराष्ट्रीय पहचान का महत्व इसलिए भी है क्योंकि छऊ किसी एक कलाकार या एक मंच तक सीमित कला नहीं है। इसके साथ स्थानीय समुदायों की सामाजिक स्मृतियां, धार्मिक विश्वास, लोककथाएं, संगीत, हस्तशिल्प और पारंपरिक प्रशिक्षण जुड़ा हुआ है। इसलिए इसका संरक्षण केवल कलाकारों को मंच देने तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी सांस्कृतिक व्यवस्था को मजबूत करने से जुड़ा विषय है।
कला, संस्कृति और आजीविका का संगम
पुरुलिया छऊ की खासियत यह है कि इससे कलाकारों के अलावा मुखौटा बनाने वाले कारीगर, वाद्ययंत्र कलाकार, पोशाक तैयार करने वाले लोग और स्थानीय सांस्कृतिक आयोजनों से जुड़े अनेक परिवार भी जुड़े हैं। चारिडा में मुखौटा निर्माण इसका प्रमुख उदाहरण है। पश्चिम बंगाल पर्यटन विभाग के अनुसार इस गांव में कई सौ परिवार इस परंपरा से जुड़े हैं। इस दृष्टि से छऊ को केवल मनोरंजन की कला मानना इसके व्यापक महत्व को सीमित करना होगा। यह स्थानीय पहचान, सामुदायिक जीवन और सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा है। पर्यटन के बढ़ते महत्व के साथ ऐसी लोककलाएं किसी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को देश-विदेश के दर्शकों तक पहुंचाने में भी भूमिका निभाती हैं।
रंग, लय और गति में दर्ज पुरुलिया की पहचान
पुरुलिया छऊ को देखते हुए सबसे पहले उसके रंग, मुखौटे और ऊर्जावान गतिविधियां ध्यान खींचती हैं, लेकिन इसके पीछे सदियों से विकसित एक गहरी सांस्कृतिक परंपरा काम करती है। यहां कथा केवल बोली नहीं जाती, उसे शरीर की गति में ढाला जाता है। पात्र अपना परिचय संवाद से नहीं, बल्कि मुखौटे, वेशभूषा, चाल, मुद्रा और नृत्य के माध्यम से देता है। संगीत उस कथा को लय देता है और मुखौटा उसे दृश्य पहचान प्रदान करता है। यही कारण है कि पुरुलिया छऊ आज भी भारतीय लोकनाट्य परंपरा की एक विशिष्ट मिसाल है। यह कला पुरानी कथाओं को नए दर्शकों तक पहुंचाने के साथ-साथ पुरुलिया की स्थानीय संस्कृति, सामुदायिक स्मृति और कारीगरों की परंपरा को भी जीवित रखती है। लाल मिट्टी और पलाश की धरती से निकली यह नृत्य-नाट्य परंपरा आज अपने मुखौटों, ढोल की गूंज और तेजस्वी देहभाषा के जरिए भारतीय सांस्कृतिक विरासत की एक अलग पहचान बन चुकी है।
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