ट्रांसजेंडर एक्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, महिलाओं के अधिकारों को लेकर उठे सवाल

The CSR Journal Magazine

महिला संगठन की चुनौती

क्या सर्जरी के बाद पुरुष बनकर महिलाएं अधिकारों का दावा कर सकती हैं? इस सवाल को लेकर एक महिला संगठन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। विमेंस डिक्लेरेशन इंटरनेशनल इंडिया ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 7 और नियम 7 को चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि यह प्रावधान बायोलॉजिकल पुरुषों को सर्जरी के बाद सरकारी दस्तावेजों में खुद को ‘महिला’ के तौर पर दर्ज कराने की अनुमति देता है।

जेंडर पहचान का मुद्दा

याचिका में 2014 के NALSA जजमेंट पर पुनर्विचार की मांग की गई है, जिसमें ट्रांसजेंडर लोगों को अपनी जेंडर पहचान की कानूनी मान्यता का अधिकार दिया गया था। सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि जन्म से पुरुष लेकिन महिला के रूप में पहचान रखने वाले ट्रांस व्यक्ति को बायोलॉजिकल महिला के समान दर्जा नहीं मिलना चाहिए। याचिकाकर्ता का कहना है कि सर्जरी से जैविक क्रोमोसोम और जेनेटिक्स नहीं बदलते।

संविधानिक अधिकारों का खतरा

महिला संगठन का कहना है कि जेंडर आइडेंटिटी के आधार पर जैविक महिलाओं के लिए बने संवैधानिक और कानूनी अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। मौजूदा व्यवस्था जेंडर आइडेंटिटी को जैविक सेक्स का आधार मानती है, जिससे जन्म के समय पुरुष दर्ज व्यक्ति सरकारी दस्तावेजों में महिला पहचान हासिल कर सकते हैं। याचिका में यह भी कहा गया है कि कोई भी मेडिकल या सर्जिकल प्रक्रिया व्यक्ति के जैविक सेक्स को नहीं बदलती।

सुनवाई में क्या हुआ?

याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट अमित सिबल पेश हुए। उन्होंने कहा कि यह याचिका खासतौर पर जैविक महिलाओं के अधिकारों की बात करती है। सिबल ने जोर देकर कहा कि ये लाभ बने रहने चाहिए और इनमें दखल नहीं होना चाहिए। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मुख्य याचिकाओं के समूह में जवाब तैयार किया जा रहा है।

विधायिका का निर्णय

जस्टिस बागची ने कहा कि विधायिका ने इस मुद्दे पर फैसला नहीं किया है। ट्रांस व्यक्ति बच्चे को जन्म नहीं दे सकता, लेकिन जैविक महिला बच्चे को जन्म दे सकती है। जस्टिस मोहना ने कहा कि ट्रांसजेंडर बच्चे को जन्म दे सकते हैं। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने स्पष्ट किया कि महिला के रूप में पहचान रखने वाले ट्रांसजेंडर बच्चे को जन्म नहीं दे सकते।

खेलों में भागीदारी का मुद्दा

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि जैविक पुरुष, जिसके शरीर में पुरुषों जैसी सभी शारीरिक विशेषताएं हैं, खुद को महिला बताकर खेल प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का अधिकार मांग सकता है। कुछ अदालतों ने ऐसे मामलों में आदेश दिए हैं, जिसके बाद जैविक पुरुष महिला खिलाड़ियों के साथ खेल सकता है।

महिला आरक्षण और अन्य मामले

याचिका में महिला आरक्षण, सेक्स-विशेष पदों पर भर्ती, खेलों में भागीदारी और अलग-अलग जेंडर के लिए बने स्थानों के इस्तेमाल से जुड़े कई फैसलों का हवाला दिया गया है। अंजलि गुरु संजना जान बनाम महाराष्ट्र सरकार मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था कि जन्म के समय पुरुष दर्ज और खुद को महिला मानने वाला व्यक्ति महिलाओं के लिए आरक्षित पंचायत सीट से चुनाव लड़ सकता है।

केरल के फैसले का जिक्र

याचिका में केरल स्टेट इलेक्शन कमीशन के नवंबर 2025 के फैसले का भी जिक्र है, जिसमें दो ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को महिलाओं के लिए आरक्षित स्थानीय निकाय सीटों से चुनाव लड़ने की अनुमति दी गई थी। इसके अलावा, केरल हाईकोर्ट ने एक ट्रांस महिला को नेशनल कैडेट कोर में शामिल करने की अनुमति दी थी।

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