झारखंड और लोकसभा चुनाव में अपने लक्ष्य से चूकने के बाद, भारतीय जनता पार्टी (NDA) ने बिहार विधानसभा चुनाव के लिए भी अपना टार्गेट घटा दिया है. पिछले कुछ महीनों से एनडीए के नेता 225 सीटें जीतने की बात कर रहे थे, लेकिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अब लक्ष्य को 160 सीटों पर संशोधित कर दिया है. राजनीतिक गलियारों में इसे तेजस्वी यादव के लिए बड़ी खुशखबरी के रूप में देखा जा रहा है. यह बदलाव साफ दर्शाता है कि NDA ने चुनाव से पहले ही 83 सीटों पर हार स्वीकार कर ली है, जो तेजस्वी यादव और महागठबंधन के लिए अनुकूल स्थिति पैदा करता है. विश्लेषकों का मानना है कि इस बार मुकाबला 2020 से भी ज्यादा कड़ा है.
तेजस्वी यादव पहले से ही बढ़ते अपराध और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर नीतीश कुमार सरकार को घेर रहे हैं और लुभावने वादों से जनता के बीच अपनी पैठ बना रहे हैं. राहुल गांधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ से भी उन्हें नैतिक बल मिला है.
Lok Poll सर्वे: CM बनेंगे तेजस्वी! लालू यादव अति उत्साहित, पर राह में बड़ी बाधा
लोक पोल के ताजा सर्वे ने महागठबंधन को बड़ी बढ़त दिखाई है, जिसमें उन्हें 118-126 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि NDA को 105-114 सीटें मिलती दिख रही हैं. अगर यह सर्वे सच साबित होता है, तो 20 साल तक बिहार पर शासन करने वाले नीतीश कुमार के लिए यह एक बड़ा झटका होगा. यह उनका आखिरी चुनाव हो सकता है, और सीएम की कुर्सी पर अब तेजस्वी यादव की दावेदारी मजबूत दिख रही है.
इस सर्वे से लालू यादव बेहद गदगद हैं. स्वास्थ्य चुनौतियों के बावजूद, वह बेटे तेजस्वी की सभाओं में जोश भरने पहुंच रहे हैं. उन्होंने जातीय समीकरण को साधने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं. खासकर कुशवाहा (लव-कुश) समाज में सेंध लगाने के लिए RJD ने लोकसभा चुनाव में कई कुशवाहा नेताओं को टिकट दिए और उन्हें सफलता भी मिली. इसके अलावा, मंगनी लाल मंडल को RJD का अध्यक्ष बनाकर लालू ने नीतीश कुमार के ईबीसी वोटरों पर पकड़ ढीली करने की कोशिश की है.
तेजस्वी के ताज के लिए लालू का बड़ा ‘त्याग’: बेटा-बेटी से क्यों ले लिया पंगा?
तेजस्वी के राजनीतिक करियर को दाग से बचाने के लिए लालू परिवार में बड़ा घमासान मचा हुआ है. बेटे तेज प्रताप यादव को पार्टी और परिवार से बाहर करने की मुनादी हो गई, और बेटी रोहिणी आचार्य ने भी अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए सोशल मीडिया पर फैमिली और पार्टी के नेताओं को अनफॉलो कर दिया. इन सभी अनबन के पीछे तेजस्वी के राजनीतिक सलाहकार संजय यादव को मुख्य कारण बताया जा रहा है.
सूत्रों के अनुसार, संजय यादव ने तेजस्वी को परिवारवाद की राजनीति से बाहर निकलने की सलाह दी है. तेज प्रताप को बाहर का रास्ता दिखाना और रोहिणी व मीसा भारती का किसी करीबी के लिए या खुद के लिए टिकट मांगना, परिवारवाद के ठप्पे को और मजबूत कर सकता है, जिससे बचने के लिए संजय यादव उन्हें बाहर रखने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. रोहिणी और मीसा को संजय यादव की बढ़ती राजनीतिक पैठ अब नहीं सुहा रही है.
गृह-कलह और गठबंधन की उलझन: क्या तेजस्वी सर्वे को हकीकत में बदल पाएंगे?
सर्वे रिपोर्ट तेजस्वी के पक्ष में होने के बावजूद, उनकी राह में कई बड़ी बाधाएं हैं. सबसे पहले उन्हें परिवार में मचे आंतरिक कलह को शांत करना होगा. ‘घर फूटे, गंवार लूटे’ की कहावत के अनुसार, तेज प्रताप की नई पार्टी और रोहिणी की भावनात्मक अपील उन्हें नुकसान पहुंचा सकती है.
इसके अलावा, महागठबंधन के सहयोगियों में अभी भी सीट शेयरिंग को लेकर उलझन है. कांग्रेस का रुख स्पष्ट नहीं है, और वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी उप-मुख्यमंत्री पद सुनिश्चित करने के लिए बेचैन हैं. कांग्रेस भी डिप्टी सीएम का पद चाहती है. ऐसे में, पारिवारिक उलझन और गठबंधन के सहयोगियों को साथ लेकर चलना तेजस्वी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है, जिस पर उनका सीएम बनना निर्भर करेगा.
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