NEET प्रदर्शनकारियों को सुप्रीम राहत! Article 142 से FIR रद्द, जानें क्या है पूर्ण न्याय की यह विशेष शक्ति

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 NEET प्रदर्शनकारियों पर दर्ज FIR सुप्रीम कोर्ट ने विशेष शक्तियों से किया खत्म; जानिए क्या है संविधान का अनुच्छेद 142 और कब होता है इसका इस्तेमाल

NEET परीक्षा और कथित पेपर लीक के मुद्दे पर हुए छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए देशभर में दर्ज संबंधित FIR को रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए यह आदेश दिया। अदालत के फैसले के बाद छात्र आंदोलन और पुलिस कार्रवाई से जुड़े मामलों में बड़ी राहत मिली है, वहीं देशभर में एक बार फिर यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर Article 142 यानी अनुच्छेद 142 क्या है और सुप्रीम कोर्ट को इससे कितनी विशेष शक्ति मिलती है।

कई राज्यों मे FIR रद्द

1 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामलों पर सुनवाई करते हुए अनुच्छेद 142 का प्रयोग किया। रिपोर्टों के अनुसार, केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस समेत संबंधित राज्यों की ओर से मामलों को समाप्त करने की मांग की गई थी। अदालत ने दिल्ली, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम समेत विभिन्न स्थानों पर दर्ज संबंधित मामलों को लेकर व्यापक आदेश पारित किया।

क्या है पूरा मामला?

NEET परीक्षा से जुड़े पेपर लीक विवाद के बाद देश के कई हिस्सों में छात्रों और युवाओं ने विरोध प्रदर्शन किए थे। दिल्ली के जंतर-मंतर और अन्य स्थानों पर भी प्रदर्शन हुए। जुलाई 2026 में हुए आंदोलन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव तथा झड़प की घटनाएं सामने आईं। इन घटनाओं के बाद दिल्ली और अन्य राज्यों में कई FIR दर्ज की गईं। प्रदर्शनकारियों की ओर से आरोप लगाया गया कि छात्रों के खिलाफ कार्रवाई की गई और पुलिस बल का अत्यधिक इस्तेमाल हुआ। दूसरी ओर, प्रशासन की तरफ से कानून-व्यवस्था और हिंसा की घटनाओं को लेकर कार्रवाई की गई। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी इस मामले में सुनवाई करते हुए छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों और पुलिस कार्रवाई से जुड़े मुद्दों पर विचार किया था। अदालत ने शुरुआती चरण में यह स्पष्ट किया था कि शांतिपूर्ण और कानूनी विरोध को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है, हालांकि गंभीर और जघन्य अपराधों के आरोप वाले मामलों को अलग दृष्टि से देखा जा सकता है।

केंद्र और दिल्ली पुलिस ने की FIR खत्म करने की मांग

मामले में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए प्रदर्शन से जुड़े मामलों को समाप्त करने की मांग की। दिल्ली पुलिस ने भी शीर्ष अदालत को बताया कि वह कुछ FIR को आगे नहीं बढ़ाना चाहती और इसके लिए अनुच्छेद 142 के तहत विशेष शक्तियों के इस्तेमाल का आग्रह किया गया। रिपोर्टों के अनुसार, केंद्र सरकार और संबंधित प्रशासन ने यह भी कहा कि छात्र प्रदर्शनकारियों को अनावश्यक रूप से निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए व्यापक राहत का आदेश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 का किया इस्तेमाल

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए संबंधित FIR को रद्द करने का आदेश दिया। रिपोर्ट के अनुसार, शीर्ष अदालत ने 20 से 25 जुलाई के बीच हुए छात्र प्रदर्शनों से संबंधित मामलों को लेकर व्यापक आदेश दिया और कहा कि ऐसे मामलों को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि संबंधित अवधि के प्रदर्शनों को लेकर नई FIR दर्ज नहीं की जाए। अदालत ने दिल्ली, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और असम में दर्ज कई मामलों को समाप्त किया और अन्य राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में इसी प्रकार के मामलों को भी आगे न बढ़ाने का निर्देश दिया।

आखिर क्या है अनुच्छेद 142?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को विशेष शक्ति प्रदान करता है। इस अनुच्छेद का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सुप्रीम कोर्ट के सामने लंबित किसी मामले में “पूर्ण न्याय” यानी Complete Justice किया जा सके। सरल शब्दों में समझें तो कई बार किसी मामले में सामान्य कानूनी प्रक्रिया, अलग-अलग कानूनों की सीमाएं या तकनीकी प्रक्रियाएं ऐसी स्थिति पैदा कर सकती हैं, जहां अदालत को लगता है कि केवल सामान्य प्रक्रिया का पालन करने से न्याय अधूरा रह सकता है। ऐसी असाधारण परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत आवश्यक आदेश जारी कर सकता है।

‘Complete Justice’ का क्या मतलब है?

अनुच्छेद 142 की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा है—Complete Justice यानी पूर्ण न्याय। इसका अर्थ यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट किसी भी कानून को सामान्य रूप से नजरअंदाज कर सकता है। बल्कि इसका उद्देश्य विशेष परिस्थितियों में ऐसा न्यायिक समाधान उपलब्ध कराना है, जिससे मामले में वास्तविक और प्रभावी न्याय सुनिश्चित हो सके। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी मामले में कई राज्यों में अलग-अलग कानूनी कार्रवाई चल रही हो, सामान्य प्रक्रिया से न्याय में अत्यधिक देरी हो रही हो, तकनीकी कानूनी बाधाओं के कारण न्याय अधूरा रह रहा हो, या किसी असाधारण परिस्थिति में व्यापक न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी हो तो सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के इस्तेमाल पर विचार कर सकता है। NEET प्रदर्शन से जुड़े मामलों में भी शीर्ष अदालत ने व्यापक परिस्थितियों को देखते हुए अपनी विशेष शक्ति का इस्तेमाल किया।

अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को क्या शक्ति देता है?

अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट किसी लंबित मामले में ऐसा आदेश या डिक्री जारी कर सकता है, जो पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक हो। इस अनुच्छेद के तहत पारित आदेशों की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वे पूरे भारत में प्रभावी हो सकते हैं। यही कारण है कि अनुच्छेद 142 को भारतीय न्यायपालिका की सबसे महत्वपूर्ण असाधारण शक्तियों में से एक माना जाता है। हालांकि यह शक्ति असीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने विभिन्न फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल न्याय के हित में और असाधारण परिस्थितियों में किया जाना चाहिए।

क्या अनुच्छेद 142 हर मामले में इस्तेमाल होता है?

नहीं। अनुच्छेद 142 कोई सामान्य कानूनी उपाय नहीं है। सुप्रीम कोर्ट इसका इस्तेमाल हर मामले में नहीं करता। यह एक विशेष संवैधानिक शक्ति है, जिसका प्रयोग अदालत मामले की परिस्थितियों और न्याय की आवश्यकता को देखते हुए करती है। सामान्य मामलों में अदालतें—
  • भारतीय दंड संहिता या संबंधित आपराधिक कानून,
  • सिविल कानून,
  • संवैधानिक प्रावधान,
  • प्रक्रिया संबंधी कानून,
के तहत निर्णय देती हैं। लेकिन जब किसी मामले में असाधारण परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं और सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि पूर्ण न्याय के लिए विशेष आदेश आवश्यक है, तभी अनुच्छेद 142 महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

NEET मामले में अनुच्छेद 142 क्यों बना अहम?

NEET प्रदर्शन से जुड़े मामले केवल एक शहर या एक राज्य तक सीमित नहीं थे। आंदोलन का प्रभाव कई राज्यों तक पहुंचा और अलग-अलग स्थानों पर पुलिस मामले दर्ज हुए। ऐसी स्थिति में हर छात्र या प्रदर्शनकारी को अलग-अलग राज्यों में लंबी कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ सकता था। इसी पृष्ठभूमि में केंद्र और संबंधित प्रशासन की ओर से शीर्ष अदालत से व्यापक समाधान का आग्रह किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के जरिए एक साथ व्यापक आदेश पारित कर मामले को समाप्त करने का रास्ता अपनाया।इस फैसले को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे अलग-अलग स्थानों पर चल रहे समान प्रकृति के मामलों को लेकर एक समान न्यायिक समाधान सामने आया।

क्या सभी प्रकार के आरोप अपने आप खत्म हो जाते हैं?

यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट की पहले की सुनवाई में अदालत ने यह संकेत दिया था कि प्रदर्शन में शामिल छात्रों और गंभीर या जघन्य अपराधों के आरोप वाले व्यक्तियों के मामलों को एक जैसा नहीं देखा जा सकता। अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि “criminal antecedents” के संदर्भ में गंभीर और जघन्य अपराधों को अलग श्रेणी में रखा जाएगा। इसलिए अनुच्छेद 142 के तहत राहत की सीमा और प्रत्येक श्रेणी के मामले की कानूनी स्थिति को अदालत के आदेश और संबंधित परिस्थितियों के आधार पर समझना जरूरी है।

जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान क्या हुआ था?

दिल्ली के जंतर-मंतर और संसद की ओर जाने वाले आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में छात्र और प्रदर्शनकारी एकत्र हुए थे। प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई, लाठीचार्ज और झड़प की घटनाओं को लेकर विवाद पैदा हुआ। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगाए, जबकि प्रशासन की ओर से कानून-व्यवस्था बिगड़ने और हिंसा की घटनाओं का मुद्दा उठाया गया। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद अदालत ने घटनाओं से संबंधित कई महत्वपूर्ण रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के निर्देश भी दिए थे। इनमें CCTV फुटेज, ड्रोन रिकॉर्डिंग, बॉडी कैमरा रिकॉर्डिंग और अन्य वीडियो सामग्री शामिल थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने हिंसा और घटनाओं की स्वतंत्र जांच के लिए एक उच्च स्तरीय जांच समिति के गठन का भी आदेश दिया था।

FIR रद्द होने के बाद क्या बदला?

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद छात्र आंदोलन से जुड़े मामलों में बड़ी राहत मिली है। इस फैसले का सबसे बड़ा असर उन छात्रों और युवाओं पर पड़ सकता है, जिनके खिलाफ केवल प्रदर्शन में शामिल होने या संबंधित आंदोलन के कारण मामले दर्ज हुए थे। रिपोर्टों के अनुसार, फैसले के बाद प्रस्तावित आगे के आंदोलन को लेकर भी बदलाव देखने को मिला और CJP ने 5 सितंबर के प्रस्तावित मार्च को वापस लेने की घोषणा की।

अनुच्छेद 142: न्यायपालिका का असाधारण संवैधानिक हथियार

भारतीय लोकतंत्र में विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है और न्यायपालिका कानून तथा संविधान की व्याख्या करते हुए न्याय सुनिश्चित करती है। अनुच्छेद 142 इसी न्यायिक व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट को एक विशेष भूमिका देता है। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि जब सामान्य कानूनी प्रक्रिया किसी असाधारण मामले में पर्याप्त समाधान नहीं दे पा रही हो, तब सुप्रीम कोर्ट पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए विशेष आदेश दे सकता है। लेकिन यह शक्ति केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि यह व्यापक है, बल्कि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका इस्तेमाल न्यायिक विवेक, संवैधानिक सिद्धांतों और मामले की विशेष परिस्थितियों के आधार पर किया जाता है।

नागरिकों के लिए क्यों जरूरी है अनुच्छेद 142 को समझना?

अक्सर सुप्रीम कोर्ट के बड़े फैसलों में अनुच्छेद 142 का नाम सामने आता है और आम लोगों के मन में सवाल उठता है कि आखिर यह प्रावधान इतना महत्वपूर्ण क्यों है। NEET प्रदर्शन से जुड़े ताजा फैसले ने एक बार फिर यह दिखाया है कि भारतीय संविधान ने सुप्रीम कोर्ट को केवल विवादों का फैसला करने की ही नहीं, बल्कि विशेष परिस्थितियों में पूर्ण और प्रभावी न्याय सुनिश्चित करने की संवैधानिक शक्ति भी दी है।

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