शामली की सानिया बनीं ‘गोल्डन गर्ल’, विदेश में सिल्वर-ब्रॉन्ज के बाद देश में जीता गोल्ड

The CSR Journal Magazine
उत्तर प्रदेश के छोटे से जिले शामली की बेटी सानिया खान ने अपनी मेहनत और खेल प्रतिभा के दम पर देशभर में पहचान बनाई है। ताइक्वांडो के मैदान में लगातार शानदार प्रदर्शन कर रहीं सानिया ने अब राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक अपने नाम किया है। CISF की ओर से खेलते हुए उन्होंने यह उपलब्धि हासिल की। पुणे के महालुंगे में 16 से 21 अगस्त तक आयोजित पांचवीं इंडियन ताइक्वांडो क्योरुगी नेशनल चैंपियनशिप 2026-27 में सानिया ने अंडर-62 किलोग्राम भार वर्ग में हिस्सा लिया और शानदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल जीता।

महज सात महीने में राष्ट्रीय चैंपियन

सानिया के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि वह 24 जनवरी 2026 को CISF की ताइक्वांडो टीम में शामिल हुई थीं। टीम का हिस्सा बनने के महज सात महीने के भीतर उन्होंने राष्ट्रीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीत लिया। सानिया का जन्म 11 सितंबर 2005 को शामली जिले में हुआ। वह ग्राम राजढ़, डाक गढ़ी पुख्ता निवासी साजिद खान की बेटी हैं। CISF टीम में चयन के बाद उन्होंने महिपालपुर स्थित बल के प्रशिक्षण केंद्र में नियमित अभ्यास शुरू किया। लगातार अभ्यास, अनुशासन और कड़ी मेहनत ने उन्हें कुछ ही महीनों में राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर दिया।

विदेश में भी दिखा सानिया का दम

राष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीतने से पहले सानिया अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुकी हैं। उन्होंने केन्या के नेरोबी में आयोजित अंडर-21 वर्ल्ड ताइक्वांडो चैंपियनशिप 2026 में हिस्सा लिया। इसके बाद वियतनाम ओपन ताइक्वांडो चैंपियनशिप 2026 में सानिया ने रजत पदक जीता। वहीं, 8वीं एशियन ताइक्वांडो इंडोनेशियन ओपन चैंपियनशिप 2026 में उन्होंने कांस्य पदक अपने नाम किया। यानी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सिल्वर और ब्रॉन्ज जीतने के बाद अब सानिया ने अपने देश में सबसे चमकदार गोल्ड मेडल हासिल किया है।

गांव से अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने की कहानी

सानिया की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने किसी बड़े खेल शहर से शुरुआत नहीं की। शामली जैसे जिले से निकलकर ताइक्वांडो में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचना उनकी मेहनत का नतीजा है। उनकी सफलता उन खिलाड़ियों के लिए भी उम्मीद जगाती है, जो छोटे शहरों और सीमित संसाधनों से खेल की दुनिया में आगे बढ़ने का सपना देखते हैं। सानिया ने साबित किया है कि सही प्रशिक्षण, अनुशासन और लगातार मेहनत के दम पर बड़े मंच तक पहुंचा जा सकता है।

CISF ने भी उपलब्धि पर जताया गर्व

सानिया की इस सफलता पर CISF के महानिदेशक ने भी उनकी उपलब्धि की सराहना की। उन्होंने कहा कि प्रतिभा किसी बड़े शहर या बड़े मंच की मोहताज नहीं होती। खिलाड़ी को अगर सही अवसर और सुविधाएं मिलें तो वह अपनी मेहनत से आगे का रास्ता खुद बना सकता है। सानिया की उपलब्धि को CISF ने भी गर्व का विषय बताया है। महज कुछ महीनों में राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण जीतना उनके लिए बड़ी उपलब्धि है और आने वाले समय में उनसे अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही है।

बेटियों के लिए बनीं मिसाल

सानिया खान की कहानी सिर्फ एक पदक जीतने की कहानी नहीं है। यह उस मेहनत की कहानी है, जिसमें एक छोटे जिले की बेटी ने खेल के मैदान में अपनी पहचान बनाई और अब देश के लिए पदक जीत रही है। उनका सफर खास तौर पर उन बेटियों के लिए प्रेरणा है, जो खेलों में आगे बढ़ने का सपना देखती हैं। शामली की सानिया ने दिखा दिया है कि सपने छोटे शहरों में भी बड़े देखे जा सकते हैं और उन्हें मेहनत से हकीकत में बदला जा सकता है।
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