1965 की वो एक चूक, और जन्मी R&AW! मिशन बांग्लादेश से मिशन मोसाद: R&AW के 58 गौरवशाली वर्ष

The CSR Journal Magazine

58 साल की R&AW: 1965 की खुफिया चूक से जन्मी एजेंसी, 1971 में बांग्लादेश युद्ध तक पहुंचा असर; अब Mossad के साथ सहयोग का नया दौर

भारत की बाहरी खुफिया एजेंसी Research and Analysis Wing यानी R&AW ने 21 सितंबर 2026 को अपने गठन के 58 वर्ष पूरे किए। 21 सितंबर 1968 को अस्तित्व में आई इस एजेंसी की स्थापना ऐसे समय हुई थी, जब 1962 के चीन युद्ध और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के अनुभवों ने भारत की बाहरी खुफिया व्यवस्था में गंभीर कमियों को उजागर किया था। R&AW का मूल उद्देश्य ऐसा स्वतंत्र तंत्र तैयार करना था, जो देश के बाहर होने वाले राजनीतिक, सैन्य और रणनीतिक घटनाक्रमों की जानकारी जुटाकर सरकार को संभावित खतरों के बारे में समय रहते सचेत कर सके।
R&AW के पहले प्रमुख रमेश्वर नाथ काओ (R.N. Kao) थे। उनके नेतृत्व में तैयार की गई इस नई संस्था ने शुरुआती वर्षों में पाकिस्तान और चीन से जुड़े सुरक्षा मामलों पर अपना ध्यान केंद्रित किया। इसके गठन के केवल तीन वर्ष बाद 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ, जिसमें पूर्वी पाकिस्तान में भारतीय खुफिया प्रयासों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी युद्ध के बाद बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया। हालांकि 1971 की जीत केवल किसी एक संस्था की उपलब्धि नहीं थी, बल्कि भारतीय सैन्य कार्रवाई, राजनीतिक नेतृत्व, कूटनीति, स्थानीय प्रतिरोध और विभिन्न खुफिया सूचनाओं के संयुक्त प्रभाव का परिणाम थी।

1965 के बाद क्यों महसूस हुई अलग बाहरी खुफिया एजेंसी की जरूरत?

भारत की स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक देश की प्रमुख खुफिया संस्था Intelligence Bureau (IB) ही आंतरिक और बाहरी दोनों प्रकार की खुफिया जरूरतों से जुड़ी रही। लेकिन 1962 के चीन युद्ध और फिर 1965 के पाकिस्तान के साथ युद्ध ने यह सवाल उठाया कि बाहरी सुरक्षा और विदेशी देशों से जुड़ी रणनीतिक जानकारी जुटाने के लिए अलग विशेषज्ञ संस्था की आवश्यकता है। इसी पृष्ठभूमि में R&AW को स्थापित किया गया। हालांकि इसकी स्थापना के पीछे के विस्तृत सरकारी दस्तावेज आज भी पूरी तरह सार्वजनिक नहीं हैं। R.N. Kao के शुरुआती नोट और एजेंसी के गठन से संबंधित कई महत्वपूर्ण रिकॉर्ड अब भी गोपनीय माने जाते हैं। इसलिए R&AW की स्थापना के कारणों के बारे में सार्वजनिक स्रोतों में अलग-अलग व्याख्याएं मिलती हैं। नई संस्था को विदेशों में राजनीतिक गतिविधियों, सैन्य तैयारियों, हथियारों के प्रसार और भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले घटनाक्रमों पर जानकारी जुटाने की जिम्मेदारी मिली। समय के साथ इसका दायरा आतंकवाद, सीमा-पार नेटवर्क, रणनीतिक हथियारों और पड़ोसी देशों में होने वाले राजनीतिक बदलावों तक बढ़ता गया।

1971 का युद्ध और बांग्लादेश का निर्माण

R&AW के शुरुआती इतिहास में 1971 का युद्ध सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक माना जाता है। उस समय पूर्वी पाकिस्तान में राजनीतिक और सैन्य संकट तेजी से बढ़ रहा था। पाकिस्तान की सेना और बंगाली आबादी के बीच संघर्ष ने बड़े पैमाने पर मानवीय संकट पैदा किया और लाखों शरणार्थी भारत पहुंचे। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान भारत को पूर्वी पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य हालात की लगातार जानकारी की आवश्यकता थी। R&AW ने मुक्ति बाहिनी से जुड़े नेटवर्क और क्षेत्रीय परिस्थितियों से संबंधित खुफिया जानकारी जुटाने में भूमिका निभाई। भारतीय सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व के लिए यह जानकारी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण थी। 1971 के युद्ध से पहले और उसके दौरान भारतीय खुफिया तंत्र को पाकिस्तान की सैन्य योजनाओं से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी भी मिली। हालिया रिपोर्ट के अनुसार नवंबर 1971 में पाकिस्तान के संभावित हवाई हमले की सूचना भारतीय खुफिया तंत्र तक पहुंची थी। इसके बाद भारतीय वायुसेना को तैयारी का अवसर मिला। 3 दिसंबर को पाकिस्तान ने हवाई हमले किए और भारत पहले से तैयार था। 16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण के साथ युद्ध निर्णायक रूप से समाप्त हुआ और बांग्लादेश का जन्म हुआ।

R&AW और Mossad के रिश्ते की शुरुआत

R&AW के इतिहास का एक महत्वपूर्ण और अपेक्षाकृत कम सार्वजनिक हिस्सा उसके इजरायल की खुफिया एजेंसी Mossad के साथ संबंधों से जुड़ा है। The Times of Israel में 22 सितंबर 2026 को प्रकाशित अपने लेख में फॉरेन पॉलिसी एनालिस्ट Vaasu Sharma ने दावा किया है कि R&AW और Mossad के बीच संपर्क R&AW के गठन के आसपास ही शुरू हो गया था। उनके अनुसार दोनों पक्षों के बीच सहयोग का एक कारण पाकिस्तान, चीन और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ते सुरक्षा संबंधों को लेकर चिंता थी। भारत और इजरायल के बीच उस समय औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं थे। इसके बावजूद दोनों देशों की खुफिया संस्थाओं के बीच संपर्क के चैनल विकसित हुए। अमेरिका के Council on Foreign Relations की R&AW पर पृष्ठभूमि रिपोर्ट भी शुरुआती दौर में R&AW और Mossad के बीच गुप्त संपर्क का उल्लेख करती है और बताती है कि भारत इजरायल की पश्चिम एशिया तथा उत्तर अफ्रीका संबंधी विशेषज्ञता और आतंकवाद-रोधी अनुभव से लाभ लेना चाहता था। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। R&AW और Mossad के बीच सहयोग का उल्लेख कई सार्वजनिक स्रोतों में मिलता है, लेकिन खुफिया एजेंसियों के अधिकांश वास्तविक अभियानों और सूचनाओं को सार्वजनिक नहीं किया जाता। इसलिए किसी विशेष ऑपरेशन, सूचना या संयुक्त कार्रवाई के बारे में किए गए सभी दावों को आधिकारिक रूप से सत्यापित तथ्य मानना उचित नहीं होगा।

1977 का Kahuta प्रकरण

R&AW-Mossad संबंधों के इतिहास में 1977 का Kahuta प्रकरण सबसे चर्चित घटनाओं में गिना जाता है। Vaasu Sharma के लेख के अनुसार उस समय भारतीय खुफिया तंत्र को जानकारी थी कि पाकिस्तान के Kahuta परमाणु प्रतिष्ठान में हथियार-स्तर के यूरेनियम उत्पादन की दिशा में काम हो रहा है। इसी दौरान इजरायल के तत्कालीन रक्षा मंत्री Ezer Weizman की भारत यात्रा और पाकिस्तान के Kahuta प्रतिष्ठान पर संभावित कार्रवाई से संबंधित चर्चा का उल्लेख मिलता है। लेख के अनुसार इजरायल ने भारत के सामने संभावित हवाई कार्रवाई के विकल्पों पर चर्चा की थी। इनमें भारतीय क्षेत्र से ईंधन भरने या भारतीय भूभाग के रास्ते पाकिस्तानी रडार से बचते हुए उड़ान जैसे विकल्प बताए गए हैं। हालांकि तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने सैन्य कार्रवाई का समर्थन नहीं किया। यह योजना कभी अमल में नहीं आई। इस घटना की खासियत यह है कि इससे यह संकेत मिलता है कि दोनों खुफिया तंत्रों के बीच संपर्क केवल सूचनाओं के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं था, बल्कि संवेदनशील रणनीतिक मुद्दों पर भी बातचीत होती थी। हालांकि इस पूरे प्रकरण के कई विवरण सार्वजनिक स्रोतों और लेखकों के दावों पर आधारित हैं, इसलिए इन्हें आधिकारिक रूप से पुष्ट अभियान के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

1980 और 1990 के दशक में बढ़ा संपर्क

समय के साथ भारत और इजरायल के बीच खुफिया संपर्क और अधिक व्यवस्थित होने की बात सामने आती है। Vaasu Sharma के अनुसार 1980 के दशक के अंत तक R&AW और Mossad के बीच संपर्क के लिए ऐसे माध्यम बनाए गए, जिनका इस्तेमाल खुफिया अधिकारियों के बीच संवाद और परिचालन सहयोग के लिए किया जाता था। उन्होंने 1988-89 में दिल्ली में कथित रूप से Mossad के एक अधिकारी की मौजूदगी और भारतीय अधिकारियों के साथ उसके संपर्क का भी उल्लेख किया है। 1991 में जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट द्वारा एक इजरायली पर्यटक के अपहरण का मामला भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया जाता है। Sharma के अनुसार इस मामले में Mossad अधिकारी और दिल्ली में मौजूद इजरायली राजनयिक ने बातचीत में भूमिका निभाई थी। हालांकि ऐसे संवेदनशील मामलों के सभी परिचालन विवरण सार्वजनिक रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं हैं। भारत और इजरायल के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध अंततः 1992 में स्थापित हुए। इसके बाद दोनों देशों के सुरक्षा और रक्षा संबंध खुले तौर पर विकसित होने लगे। इससे पहले के दशकों में जो संपर्क गोपनीय या अनौपचारिक चैनलों के माध्यम से चलता था, उसके लिए आगे चलकर औपचारिक सरकारी ढांचे भी तैयार हुए।

कारगिल युद्ध बना बड़ा मोड़

1999 का कारगिल युद्ध भारत-इजरायल सुरक्षा संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। उस समय भारत को युद्ध के बीच तेजी से सैन्य उपकरण और क्षमताओं की जरूरत थी। इजरायल ने भारत को Litening targeting pods और laser-guided munitions सहित महत्वपूर्ण रक्षा सामग्री उपलब्ध कराई। इन प्रणालियों ने भारतीय Mirage-2000 विमानों की लक्ष्य पहचान और सटीक हमले की क्षमता को मजबूत किया। कारगिल के बाद दोनों देशों का सुरक्षा सहयोग केवल खुफिया सूचनाओं तक सीमित नहीं रहा। आतंकवाद-रोधी सहयोग, रक्षा तकनीक, निगरानी, सीमा सुरक्षा और सैन्य उपकरणों के क्षेत्र में संबंध तेजी से बढ़े। वर्ष 2000 में भारत और इजरायल ने Joint Working Group on Counterterrorism की स्थापना की। इसके माध्यम से खुफिया जानकारी साझा करने, आतंकवाद-रोधी उपायों, homeland security, कानूनी सहयोग और classified information की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर संस्थागत सहयोग का ढांचा तैयार हुआ।

1992 के बाद बदला पूरा रिश्ता

भारत और इजरायल के रिश्ते को केवल R&AW और Mossad के नजरिए से देखना अधूरा होगा। 1992 में राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद यह संबंध रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन, साइबर सुरक्षा, तकनीक और व्यापार तक विस्तारित हुआ। सुरक्षा क्षेत्र में दोनों देशों की साझी चिंता आतंकवाद और सीमा-पार हिंसा से जुड़ी रही है। भारत के लिए पाकिस्तान और बाद में अन्य अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी नेटवर्क प्रमुख सुरक्षा चिंताओं में रहे, जबकि इजरायल लंबे समय से पश्चिम एशिया में आतंकवादी संगठनों और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों का सामना करता रहा है। इसी कारण दोनों देशों की सुरक्षा एजेंसियों के बीच अनुभव और सूचनाओं के आदान-प्रदान की उपयोगिता बढ़ी।

आज R&AW के सामने पहले से कहीं ज्यादा जटिल चुनौती

58 वर्ष पहले जब R&AW की स्थापना हुई थी, तब भारत की बाहरी सुरक्षा चुनौतियां मुख्यतः पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देशों की सैन्य गतिविधियों तथा क्षेत्रीय राजनीतिक घटनाक्रमों से जुड़ी थीं। आज स्थिति कहीं अधिक जटिल है। आतंकवादी संगठन अब केवल एक देश की सीमा तक सीमित नहीं रहते। हथियारों की तस्करी, आतंकवादी वित्तपोषण, साइबर नेटवर्क, ड्रोन, डिजिटल प्रचार, संगठित अपराध और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय नेटवर्क एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं। पश्चिम एशिया में होने वाली कोई घटना भारत के ऊर्जा आयात, समुद्री व्यापार और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है। Vaasu Sharma ने अपने लेख में इसी बदलते माहौल को R&AW-Mossad संबंधों के संदर्भ में रखा है। उनका तर्क है कि वर्तमान समय में आतंकवाद, हथियारों की आवाजाही, वित्तीय नेटवर्क और राज्य-समर्थित नेटवर्क अलग-अलग क्षेत्रों में जुड़े हुए हैं। ऐसे में केवल पारंपरिक द्विपक्षीय खुफिया संपर्क पर्याप्त होंगे या सहयोग को अधिक संस्थागत स्वरूप दिया जाना चाहिए—यह आने वाले समय की एक महत्वपूर्ण रणनीतिक चुनौती है।

Mossad के साथ सहयोग कितना महत्वपूर्ण?

भारत के लिए इजरायल का महत्व केवल खुफिया सहयोग तक सीमित नहीं है। इजरायल ने आतंकवाद-रोधी अभियानों, सीमा सुरक्षा, ड्रोन और निगरानी तकनीक, मिसाइल रक्षा तथा अन्य रक्षा प्रणालियों में लंबा अनुभव विकसित किया है। दूसरी ओर भारत के पास दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र की अपनी रणनीतिक समझ तथा विस्तृत क्षेत्रीय नेटवर्क है। इसी कारण दोनों देशों के सुरक्षा तंत्र के बीच सहयोग एक-दूसरे के अनुभवों से लाभ लेने का माध्यम बन सकता है। लेकिन खुफिया एजेंसियों के बीच वास्तविक सहयोग का कितना हिस्सा सार्वजनिक है और कितना गोपनीय, इसका पूरा आकलन खुले स्रोतों से करना संभव नहीं है।

R&AW का सफर: 1968 से 2026 तक

R&AW का 58 वर्ष का इतिहास भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था में हुए बड़े बदलावों को भी दर्शाता है। 1968 में इसका मूल फोकस बाहरी खुफिया जानकारी जुटाने और पाकिस्तान-चीन से संबंधित रणनीतिक चुनौतियों पर था। 1971 में एजेंसी को पूर्वी पाकिस्तान के घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का अवसर मिला। इसके बाद परमाणु प्रसार, आतंकवाद, दक्षिण एशिया की राजनीति और वैश्विक सुरक्षा नेटवर्क इसके काम के महत्वपूर्ण हिस्से बनते गए। 1990 के दशक में आतंकवाद के बढ़ते खतरे और 1999 के Kargil युद्ध के बाद भारत-इजरायल सुरक्षा संबंधों में तेजी आई। 2000 के दशक में आतंकवाद-रोधी सहयोग को संस्थागत आधार मिला। आज R&AW के सामने पारंपरिक सैन्य खतरों के साथ-साथ गैर-राज्यीय नेटवर्क, साइबर क्षेत्र, समुद्री सुरक्षा, ड्रोन और अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी वित्तपोषण जैसी बहुस्तरीय चुनौतियां हैं।
इस लिहाज से R&AW की 58वीं वर्षगांठ केवल एक खुफिया एजेंसी की स्थापना की तारीख नहीं है। यह भारत की उस सुरक्षा व्यवस्था के विकास की कहानी भी है, जिसने 1960 के दशक की खुफिया कमियों से शुरुआत कर वैश्विक स्तर पर विभिन्न देशों और एजेंसियों के साथ संपर्क का एक व्यापक नेटवर्क विकसित किया। R&AW और Mossad के बीच लंबे समय से चले आ रहे संबंध इसी व्यापक सुरक्षा बदलाव का एक महत्वपूर्ण, लेकिन काफी हद तक गोपनीय, अध्याय हैं।

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