जनरल एम.एम. नरवणे की पुस्तक Four Stars of Destiny को लेकर संसद से लेकर प्रशासन तक उठा विवाद यह सवाल खड़ा करता है कि सैन्य अनुभवों की सार्वजनिक अभिव्यक्ति की सीमा क्या होनी चाहिए और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर गोपनीयता कहां तक उचित है।
पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की किताब Four Stars of Destiny पर सवाल-बवाल!
भारत की राजधानी में रक्षा और राजनीति दोनों ही रंग में आज एक ऐसी किताब ने हलचल मचा दी है, जिसे अब तक आधिकारिक रूप से प्रकाशित भी नहीं किया गया है, लेकिन वही किताब संसद में उद्धृत होकर विवाद की ज्वाला बन चुकी है। यह किताब है जनरल मनोज मुकुंद नरवणे (सेवानिवृत्त) की लिखी आत्मकथा-संस्मरण Four Stars of Destiny, जिसे लेकर लगातार राजनीतिक, प्रशासनिक और संवैधानिक बहस जारी है।
किताब क्या है और क्यों चर्चा का केंद्र बनी?
Four Stars of Destiny जनरल नरवणे की लगभग चार दशक की सैन्य सेवा और अनुभवों पर आधारित एक विस्तृत संस्मरण है, जिसमें उन्होंने भारत-चीन सीमा विवाद, डोकलाम, गलवान घाटी, तथा रक्षा नीति जैसे संवेदनशील मुद्दों के अलावा नेतृत्व, रणनीति और सेना-सरकार के बीच बातचीत का विवरण दिया है। यह किताब मूलतः अप्रैल 2024 में प्रकाशित होने वाली थी, लेकिन तब से मोदी सरकार के रक्षा मंत्रालय (MoD) के पास सुरक्षा मंजूरी के लिए लंबित है, जिसके कारण यह अब तक प्रकाशित नहीं हो पाई है। सरकार के नियमों के अनुसार, सेना या खुफिया सेवाओं के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा संवेदनशील विषयों पर लिखी गई किताबों को MoD की पूर्व मंजूरी आवश्यक है। ऐसा न होने पर इसे प्रकाशित नहीं किया जाता है। यही कारण है कि नरवणे की किताब आज तक बाजार में नहीं आई है और प्रमुख ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्मों से भी गायब है।
संसद में हंगामा: उद्धृत या उद्धृत नहीं?
यह विवाद तब उभर कर सामने आया जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने लोकसभा में अपने भाषण के दौरान इसी किताब के तथाकथित अंशों का हवाला दिया, जो एक मैगज़ीन रिपोर्ट की प्रतिलिपि थी और उसमें कथित तौर पर लिखा गया था कि 2020 में सीमा पर तनाव के दौरान सरकार ने नरवणे को “जो उचित समझो करो” कहा था, जबकि चीन के टैंक्स की संभावना का उल्लेख भी था। लेकिन विपक्ष के इस व्यवहार पर सरकार ने तीखा विरोध जताया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह व स्पीकर ओम बिरला ने कहा कि पाकिस्तान में किसी भी अवैध या अप्रकाशित स्रोत को संसद में उद्धृत करना नियमों के खिलाफ है और यह राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में भी नहीं है। इसी के कारण राहुल गांधी को संसद में बोलने से रोका गया और सत्र में गंभीर विवाद उत्पन्न हुआ और इसी बहस के बीच पुस्तक की स्थिति को लेकर एक अनोखी घटना भी हुई ! राहुल गांधी ने संसद परिसर में एक मुद्रित प्रति हाथ में पकड़े हुए दिखाते हुए यह दावा किया कि “यह किताब मौजूद है, जिसे सरकार नहीं मानना चाहती।”
क्या यह पुस्तक सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है?
वर्तमान समय में Four Stars of Destiny भारत में किसी भी प्रमुख ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर उपलब्ध नहीं है- चाहे वह Amazon India हो, Flipkart हो या Penguin Random House India के बिज़नेस लिस्टिंग। खोज में इसका पेज “Unavailable” या “Not Found” दिखा, जिसका अर्थ यह है कि न तो यह प्रकाशित है और न ही बिक्री के लिए उपलब्ध। कई रिपोर्टों का कहना है कि यह किताब अब भी MoD के पास समीक्षा के लिए लंबित है, और पब्लिशर तथा MoD के बीच संवाद जारी है। किसी भी आधिकारिक घोषणा में यह साफ नहीं बताया गया है कि किताब पर प्रतिबंध लगाया गया है, लेकिन इसका प्रकाशन मंजूर नहीं किया गया है।
नरवणे खुद क्या कहते हैं?
जनरल नरवणे ने पहले स्वयं कहा था कि उनका काम केवल किताब लिखना था, और उन्होंने यह किताब लिखकर पब्लिशर को सौंप दी थी, अब पब्लिशर को MoD से मंजूरी लेनी है। नरवणे ने इसे एक सामान्य प्रक्रिया बताया और कहा कि किताब जब मंज़ूर होगी, तभी प्रकाशित होगी। उन्होंने इसके बारे में स्पष्ट कहा: “मेरी जिम्मेदारी खत्म हो गई है, अब गेंद MoD और पब्लिशर के पाले में है।”
राजनीतिक और संवैधानिक बहस
इस मुद्दे ने केवल रक्षा नीति या किताब के प्रकाशन तक सीमित बात नहीं छोड़ी। यह अब एक बड़ा राजनीतिक युद्ध बन गया है। विपक्ष इसे सरकार पर पारदर्शिता के अभाव का आरोप लगाते हुए इस्तेमाल कर रहा है, वहीं सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और संसदीय नियमों का पालन बताया जा रहा है। राजनीतिक विशेषज्ञ देखते हैं कि इस तरह के संवेदनशील विषयों की सार्वजनिक चर्चा में यह महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुभव कब तक सार्वजनिक होने चाहिए, और कब तक गोपनीय रहने चाहिए?
19 वर्ष पुराने RAW मुक़दमे की पृष्ठभूमि
इस किताब के मुद्दे के साथ ही एक संदर्भ बार-बार उभर रहा है। पिछले 19 वर्षों से जारी एक लंबित मुक़दमा जिसमें एक सेवानिवृत्त अधिकारी की किताब पर RAW (रॉ- भारतीय खुफ़िया एजेंसी) की कथित संवेदनशील जानकारी के खुलासे को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई चल रही है। यह मामला यह दिखाता है कि भारत में ख़ुफ़िया और रक्षा मामलों से जुड़ी किसी भी लिखित संस्मरण या जानकारी पर सुरक्षा की दृष्टि से कितने गहरे मानदंड लागू होते हैं, और अदालतों के समक्ष भी इसे व्यापक संवेदनशीलता से देखा जाता रहा है। यह मुक़दमा यह संकेत देता है कि RAW और सेना की संवेदनशीलता से जुड़ी किताबें सिर्फ़ बदलाव या समीक्षा नहीं बल्कि वर्षों तक कानूनी चुनौतियों का सामना कर सकती हैं, खासकर जब उनमें संगठन की आंतरिक बातचीत, खुफ़िया गतिविधियों या रणनीतिक फैसलों का खुलासा हो।
प्रकाशित होने से पहले बनी राजनीतिक, प्रशासनिक, सैन्य सुरक्षा बहस का केंद्रबिंदु
जनरल नरवणे की किताब Four Stars of Destiny अब तक प्रकाशित नहीं हुई है, लेकिन वही किताब आज भारत के राजनीतिक, प्रशासनिक और सैन्य-सुरक्षा बहस का केंद्र बिंदु बन चुकी है। संसद में उद्धृत होने की कोशिश, पुस्तक की ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्मों से गायब होना, MoD द्वारा समीक्षा में लंबित रहना, और एक 19 वर्ष पुराने RAW-संबंधित मुक़दमे जैसा संदर्भ, इन सभी ने मिलकर इसे सिर्फ़ एक किताब से कहीं बड़ा मुद्दा बना दिया है। इस बहस का अंतिम परिणाम चाहे जो भी हो, इससे एक बात स्पष्ट होती है- भारत में रक्षा-सुरक्षा, सैन्य अनुभवों की सार्वजनिक चर्चा और राज्य की पारदर्शिता के बीच संतुलन बनाना अब पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है।
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